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चुनाव के बाद हालात और हल


यू.पी. चुनाव में मिले भाजपा को प्रचंड बहुमत के कारण आज मुसलमान सकते की हालत में हैं। क्योंकि मुसलमानों ने वोट भाजपा को हराने के लिए दिया था, मगर हुआ उल्टा भाजपा को हराना तो दूर उल्टे यू.पी. विधान सभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व भी कम हो गया। उलेमा और बुद्धिजीवियों की सारी अपीलें बेकार हो गई और मुसलमानों का वोट तकरीबन हर मुस्लिम बाहुल सीट पर और अन्य सीटों पर दो जगह या की कहीं कहीं तीन जगह बंट गया।
मुसलमानों की संख्या भारत में 20 प्रतिशत के आस पास है जिसमें पश्चिमी यू0पी0 में तकरीबन 35 प्रतिशत के करीब है। मगर वहां भी मुसलमानों को कोई ज्यादा फायदा नही मिला।
सपा व बसपा दो पार्टियों ने यूपी मंे बारी-बारी सरकार बनाई लेकिन आज की तारीख में सपा के पास मुसलमानों और 5- 7 प्रतिशत यादवों के अलावा कोई दूसरा वोट बैंक नही है। इसी तरह बसपा के पास जाटवों के अलावा कोई वोट बैंक नही बचा। कांग्रेस तो है ही डूबता जाहज़।
मायावती ने पिछली बार अपनी हार का कारण मुसलमानों की गददारी बताया था इस बार वो ईवीएम मशीन को दोष दे रहीं हैं।
सपा व कांग्रेस ने मुसलमानों को दोष नही दिया लेकिन सुगबुगाहट उसमे भी है। लेकिन अगर हम देखें तो मालूम होगा कि सपा ने अपने 5 साल के कार्यकाल में मुसलमानों को कितना दिया है तो मालूम होगा कि सबसे ज्यादा दंगे फसाद और कब्रिस्तान की दीवारें, थोड़े उर्दू टीचर और थोड़ी बहुत पेंशन। प्रदेश में पिछली कुछ सरकारों के मुकाबले इस बार कुछ ज्यादा विकास भी हुआ मगर मुसलमानों की मूल समस्याएं जस की तस ही हैं। मुसलमानों से किया 18 प्रतिशत आरक्षण का वादा तो पूरा हो ही नही सका और न ही जेल में बंद बेकसूर मुसलमान ही छूट सके। फिर भी मुसलमानों ने सपा को अपना भरपूर वोट दिया।
आज भी मुसलमानों के इलाकों में स्कूल कालिज और बैंक से ज्यादा पुलिस चैकी मिलती हंै। लेकिन पक्षपात के नाम पर प्रदेश में हिन्दु वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ और भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। इस कारण मुसलमानों को भी अपना व्यवहार बदलना होगा।
आज जब हम देखते हैं कि आजाद को 70 वर्ष के करीब हो चुके हैं और मुसलमान आज भी उसी हालत में है जो आजादी के समय में था। मुसलमानों ने समय समय पर कांग्रेस को अपना पूरा समर्थन दिया मगर कांग्रेस ने मुसलमानों को न कुछ देना था और न ही कुछ दिया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट इस बात की गवाह है। कांग्रेस ने बड़े सुनियोजित तरीके से मुसलमानों के खिलाफ काम किया और साम्प्रदायिक तत्वों से डराकर मुसलमानों का वोट भी लेती रही। यही हालत तकरीबन सभी कथित सेक्यूलर दलों की रही। इन दलों ने मुसलमानों को
संघ से डराया और खूब वोट लिया और देश में अधिकतर समय सरकार बनाई।
समय समय पर मुसलमानों को मन्त्रालय भी दिए गये लेकिन सभी मुसलमान मंत्री कठपुतली ही थे और न तो सरकार ने, न मुस्लिम मंत्रियांे ने मुसलमानों के लिए कुछ किया। इस सबसे पता चलता है कि मुसलमानों को किसी राजनैतिक क्रान्ति की जरूरत नही है क्योंकि आज तक राजनीति से कुछ हासिल ही न हो सका। अब मुसलमानों को शैक्षिक आन्दोलन या सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है जिससे मुसलमान अपना जीवन स्तर सुधार सकें। मुसलमानों को इतिहास से सबक लेते हुए आगे बढना चाहिए आजादी के आन्दोलन के समय भी अंगे्रजी भाषा और व्यवस्था का बायकाट के कारण मुसलमानों को एक बड़े नुकसान से गुजरना पड़़ा जिसका खामियाजा हम आज तक भुगत रहे हंै। अब हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि हम इतिहास न दोहराए और मोदी सरकार एवं संघ आदि का विरोध न करें। मुसलमानों को राजनीति के अलावा देश में दूसरे मौके ढूढने चाहिए। इसके अलावा मुसलमानों को इस्लाम की सही जानकारी दूसरे धर्म के लोगों को देनी चाहिए ताकि साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा फैलाई गई इस्लाम के प्रति भ्रांतियों को दूर किया जा सके। इन भ्रांतियों के कारण ही हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति नफरत बढ़ रही है और वे मुसलमानों से दूर हो रहे हैं। इस लिए यह आज की सबसे बड़ी जरूरत भी है कि मुसलमान इस्लाम को खुद भी समझे और दूसरे देशवासियों को भी समझाए। इससे आपस में प्यार मुहब्बत भी बढेगा सारी समस्याएं जज्बात में आकर ही हल करने की न साचे, प्यार मोहब्बत बड़़ी चीज है उसी से हल करने का प्रयास करें।
सोर्सपश्चिमी उजाला मासिक

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आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ट्रेजडी क्वीन अभिनेत्री के संग लेखिका नाज को नमन करती ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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