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Showing posts from March, 2017

चुनाव के बाद हालात और हल

यू.पी. चुनाव में मिले भाजपा को प्रचंड बहुमत के कारण आज मुसलमान सकते की हालत में हैं। क्योंकि मुसलमानों ने वोट भाजपा को हराने के लिए दिया था, मगर हुआ उल्टा भाजपा को हराना तो दूर उल्टे यू.पी. विधान सभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व भी कम हो गया। उलेमा और बुद्धिजीवियों की सारी अपीलें बेकार हो गई और मुसलमानों का वोट तकरीबन हर मुस्लिम बाहुल सीट पर और अन्य सीटों पर दो जगह या की कहीं कहीं तीन जगह बंट गया।
मुसलमानों की संख्या भारत में 20 प्रतिशत के आस पास है जिसमें पश्चिमी यू0पी0 में तकरीबन 35 प्रतिशत के करीब है। मगर वहां भी मुसलमानों को कोई ज्यादा फायदा नही मिला।
सपा व बसपा दो पार्टियों ने यूपी मंे बारी-बारी सरकार बनाई लेकिन आज की तारीख में सपा के पास मुसलमानों और 5- 7 प्रतिशत यादवों के अलावा कोई दूसरा वोट बैंक नही है। इसी तरह बसपा के पास जाटवों के अलावा कोई वोट बैंक नही बचा। कांग्रेस तो है ही डूबता जाहज़।
मायावती ने पिछली बार अपनी हार का कारण मुसलमानों की गददारी बताया था इस बार वो ईवीएम मशीन को दोष दे रहीं हैं।
सपा व कांग्रेस ने मुसलमानों को दोष नही दिया लेकिन सुगबुगाहट उसमे भी है। लेकिन अगर हम…

नास्तिक और आस्तिक :साजिद हसन

संसार में देखने में दो तरह के लोग मिलते हैं, आस्तिक और नास्तिक। नास्तिक का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट होता है। वह कहता है नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है। वह उसी दृष्टिकोण से संसार में कार्य भी करता है। हांलाकि समय-समय पर ईश्वर  की सत्ता का उसे आभास भी होता है। परन्तु नास्तिक इन आभासों को संयोग या अपवाद का नाम देकर अपनी आस्था और दृष्टिकोण पर टिका रहता है। वह अपना एक दृष्टिकोण रखता है कि ईश्वर नहीं है।
जबकि  आस्तिक यह कहता है कि मालिक है। यही नहीं वह दिल से यह मानता है कि मालिक एक है। परन्तु जैसे ही वह ज़िन्दगी के मुश्किल हालातों से दो चार होता है। आस्था बदलने लगती है। अपनी कठिनाईयों और कष्टों को दूर करने के लिए उसे जहां जो हल नज़र आता है, वह वहां दौड़ पड़ता है। यह बिखरा हुआ मनुष्य बहुत से मालिकों को मानने लगता है। उसकी जो समस्या जहां से दूर हो, वही उसका देवता, उसका मालिक बन जाता है। ऐसे मनुष्य एक से हटकर बहुत से मालिकों की तरफ चला जाता है और यह क्रम बढ़ता हुआ, उसके करीब के लोगों को भी प्रभाव में ले लेता है। कुछ सामाजिक प्रभाव ऐसे होते हैं जो धर्म को, सत्य को भी तोड़-मरोड़ डालते हैं।
धर्म का स्…

अपने- अपने नारे

                                          केवल यही दुआ है दिल से, सबका घर आबाद रहे 
                                          बटन दबाने से पहले सबको बगांल कैराना याद रहे
चुनाव के दिनो में बहुत सारे नारे सुनने को मिले आजकल सोशल मिडिया के दौरे में नारों का आदान प्रदान बहुत आसान हो गया है लोग सोषल मिडिया से ही पार्टी और प्रत्याशी  का प्रचार कर रहें है ऊपर लिखा नारा हमरे एक निकटतम दोस्त ने भेजा जो की धर्म से हिन्दु है लेकिन हमारी दोस्ती के बीच धर्म आडे नही आता इस नारे से जहा एक ओर दुआ दी गई है दुसरी और भाजपा द्वारा उठाए गए पलायन के ;कैरानाद्ध मुद्दे को भी दर्शाया गया। साफ है कि यह नारा भाजपा के पक्ष में है इसमे बहुसंख्यको को अल्पसख्ंयको से डराया गया है और उन्हें एहसास दिलाया गया है कि देश मे हिन्दु खतरे में है और अगर हमे वोट न दिया तो सारे देश में ही हिन्दुओ का पलायन होगा इसी तरह का माहौल पिछले दिनों बनया गया था जब भी कोई चुनाव आता है तो इस तरह के नारे सिर्फ एक पक्ष की और से ही नही दिये जाते है अपुति ऐसे नारे तो सभी पार्टियाँ वोटरो को अपनी ओर करने के लिए देती है आज के दौर जब किसी बात या अफव…