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देखते हैं कि प्रवीन जी की तरफ़ से क्या जवाब आता है ?


अच्छे बहस मुबाहिसे ब्लॉगिस्तान में कम देखने में आ रहे हैं। हम भी अपने काम में मशग़ूल हो गए हैं। दीन यही कहता है कि दुनिया की ज़िंदगी इम्तेहान है। दूसरों का भला करना सबसे बड़ी नेकी है। यह हरेक इंसान का फ़र्ज़ है, चाहे वह वर्दी में हो या न हो। इस फ़र्ज़ को अदा करने में जान चली जाए तो यह शहादत कहलाती है। इसलाम में शहादत का दर्जा पाना कामयाबी की बात है। दूसरे धर्मों में भी इसे अच्छा माना जाता है और मरने के बाद की ज़िंदगी में राहत और ऐश मिलना बताया जाता है। इससे फ़र्ज़ की राह में मरना आसान हो जाता है और उसके बाद के रिश्तेदारों के दिलों को भी तसल्ली मिलती है कि हमारा आदमी अच्छे हाल में है।
दहरिये यानि नास्तिक लोग तो यही बताते हैं कि मरने के बाद ऐसी कोई ज़िंदगी नहीं है। लिहाज़ा कोई समझदार तब तक अपना फ़र्ज़ अदा करेगा जब तक कि उसकी ज़िंदगी को ख़तरा न हो। अपने ऊपर ख़तरा पड़ते देखते ही वह भाग खड़ा होगा। साईंस भी इसे नेचुरल बताती है।
वक्ती मसले पर एक गर्मागर्म बहस :
ज़िया उल हक़ सीओ की हत्या के संदर्भ में नास्तिक दार्शनिकों और आम नागरिकों की थ्योरी और प्रैक्टिकल का एक विश्लेषण
by 
  • DR. ANWER JAMAL


  • Comments

    रविकर said…
    आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    Aziz Jaunpuri said…
    bilkul sahi kaha hai aapne
    .
    .
    .
    मैंने लिखा था...

    पूरण खन्डेलवाल जी सही कहते हैं कि 'भगौड़ों का नास्तिकता और आस्तिकता से कोई संबंध नहीं बल्कि उनके जमीर से इसका संबध है !!'... ज़मीर माने conscience = motivation deriving logically from ethical or moral principles that govern a person's thoughts and actions.

    पर मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप ऊपर लिखा ज़मीर का सही अर्थ कभी नहीं समझ पायेंगे क्योंकि आप उसे समझने की काबलियत ही नहीं रखते, धर्म ने आपके आँख-कान-दिमाग और सोच को बंद किया हुआ है... आप तो इन्सान के किये हर काम का बदला (ईनाम) चाहते हैं हमेशा के लिए स्वर्ग का सुख, जन्नत की राहत के रूप में... जबकि जमीर धर्म-मजहब से बिल्कुल जुदा चीज है...


    और मेरा सोचना सही था... आप अपने ज़मीर के कारण कर्तव्य की राह पर जान देने वाले का जज्बा नहीं समझे... और अयाज अहमद साहब ने 'सोने में सुहागा' पर मेरे जवाब का इंतजार शुरू कर दिया और आप अपने नवभारत टाइम्स ब्लॉग 'बुनियाद' पर खुद ही गाने लगे 'आखि़र नास्तिकों को निरूत्तर होना ही पड़ा'... अब आप ही देखिये 'बुनियाद' पर पहली टीप क्या है...

    Ganesh Kumar का कहना है:
    March 07,2013 at 07:04 PM IST
    डाक्टर साहब,
    आस्तिकता और नास्तिकता को शहादत से जोड़ कर देखना ठीक नही. लोग कहते हैं भगत सिंह एक नास्तिक थे लेकिन उनसे बड़ी श्‍हादत किसी ने नही दी. न ही उन्होने अपने किसी फायदे के लिये श्‍हादत दी. कितने आस्तिक मैदान छोड़ कर भाग गये थे उस समय. शहादत मनुष्य की अपनी बुद्धि विवेक का मामला है.
    किसी फायदे नुकसान का लोभ कर के की गयी शहादत को शहादत नही सौदा कहेंगे.


    मेरी बात पहले भी स्पष्ट थी दोबारा फिर दोहरा देता हूँ... ' कर्तव्य की राह पर बलिदान कोई भी आदमी अपने ज़मीर के चलते करता है और यही होना भी चाहिये, किसी अन्देखे-अनजाने की बनायी एक दूसरी काल्पनिक दुनिया में जम कर ऐशोआराम के लालच/फायदे के चलते तो कोई बलिदान की सोचना एक किस्म का सौदा होगा और सौदा करने वाला एक लालची इंसान भी... ऐसे लालची को बेवक्त जान गंवाने की बजाय कुछ दिन उपवास करना और दिन में कुछ बार प्रार्थना कर लेना एक बेहतर तरीका लगेगा स्वर्ग में सीट पक्की करने का ... :)

    अब लगे हाथों दोनों सवालों के जवाब भी लीजिये...

    1- ज़िया उल हक़ को अपनी जान देकर क्या फ़ायदा हुआ ?

    कोई फायदा नहीं हुआ, उन्होंने अपने ज़मीर और जज्बे के चलते कर्तव्य की राह पकड़ी, कोई सौदा नहीं किया... इतना जरूर है कि वह मुझ जैसे अनेकों की आँखें नम कर गये और भविष्य की नस्लें उनकी मिसाल देंगी...

    2- उनके भगोड़े साथियों को जान बचाकर भागने से क्या नुक्सान हुआ ?

    अभी तक तो कुछ खास नुक्सान नहीं हुआ... यदि वह फौज में होते और ज़मीर रखने वाला उनका कमांडर होता तो उनको आर्मी एक्ट के तहत सजा-ए-मौत देता... मैंने अपनी पोस्ट में कम से कम उनकी वर्दी उतरवाने (बर्खास्तगी) की मांग की थी... उन्हें वर्दी की इज्जत तार-तार कर जान बचा भागने की सजा हमारे तंत्र को ही देनी होगी... यहाँ पर भी हम किसी ऊपर वाले के इंसाफ का भरोसा और इंतजार नहीं कर सकते... क्या पता वे भी कुछ ज्यादा उपासना, उपवास और तीर्थयात्राऐं कर किसी अन्देखे-अनजाने की बनायी एक दूसरी काल्पनिक दुनिया में जम कर ऐशोआराम के काबिल बना लें खुद को... :)

    अभी भी कुछ शक-शुबहा रह गये हों तो मेरी नयी पोस्ट में स्वागत है आपका... :)



    ...
    रविकर said…
    कृपया मेरी टिप्पणी,

    इस गंभीर विषय पर -

    हलके -फुल्के अंदाज में पढ़ें

    सादर-

    आला आशिक आस्तिक, आत्मिक आद्योपांत ।

    आत्म-विस्मरित आत्मरति, रहे हमेशा शांत ।

    रहे हमेशा शांत, ईष्ट से लौ लग जाए ।

    उधर नास्तिक देह, स्वयं को केवल भाये ।

    कह के मिथ्या जगत, नकारे खुदा, शिवाला ।

    भटके बिन आलम्ब, जला के प्रेम-पुआला ॥
    रविकर said…
    आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।
    DR. ANWER JAMAL said…
    अच्छे बहस मुबाहिसे ब्लॉगिस्तान में कम देखने में आ रहे हैं।

    achche log kam hain to achhi charchayen bhi kam hi hongi.

    Shukriya.
    बिल्कुल सही कहा आपने .बेह्तरीन अभिव्यक्ति.शुभकामनायें.
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena69.blogspot.in/
    DR. ANWER JAMAL said…
    @ प्रिय प्रवीण जी ! गणेश कुमार जी को हमने यह जवाब दिया है। बराय करम आप भी मुलाहिज़ा फ़रमा लें-

    # गणेश कुमार जी ! आपने कहा है कि
    ‘किसी फ़ायदे नुक्सान का लोभ करके दी गई शहादत को शहादत नहीं बल्कि सौदा कहेंगे।‘
    हां, बिल्कुल इसे सौदा ही कहेंगे और सौदा अर्थात व्यापार करना कोई बुरी बात नहीं है। अगर सबको यह नफ़े का सौदा नज़र आने लगे तो फिर सच्चाई के लिए शहादत देने वालों की तादाद बढ़ सकती है और अगर लोगों को शहादत नुक्सान का सौदा लगने लगे तो फिर लोग शहादत के मौक़े से भाग खड़े होंगे जैसे कि ज़िया उल हक़ के साथी भाग खड़े हुए।
    कोई एकाध आदमी नफ़े नुक्सान के ख़याल से ऊपर उठकर अपनी जान दे देता है। यह एक बड़े ऊंचे दर्जे की बात है। यह एक अच्छी बात है बल्कि बहुत अच्छी बात है। यह तो मरने वाले के अंदरूनी जज़्बात थे। जो उसकी मौत के साथ ही रूख़सत हो गए। नास्तिक कहते हैं कि मरने के बाद किसी भी रूप में कोई जीवन नहीं है। उनकी थ्योरी के मुताबिक़ मरने के बाद शहीद को कोई नफ़ा नहीं होता। वह ख़त्म हो जाता है।
    यह ठीक है कि शहीद ने कोई सौदा नहीं किया। उसने किसी लाभ के लिए शहादत नहीं दी लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि उसकी शहादत उसके लिए नुक्सान का सौदा साबित हुई ?
    हमारा सवाल यही है।

    हर साल 26 जनवरी को बहादुर बच्चों को उनकी बहादुरी के लिए ईनाम दिया जाता है। उन्होंने ये बहादुरी के काम किसी ईनाम के लालच में नहीं किए थे। इसके बावजूद उन्हें ईनाम दिए जाते हैं। उन्हें हर तरफ़ सराहना मिलती है। हरेक उन्हें इज़्ज़त देता है और वे इससे ख़ुश भी होते हैं।
    ...क्योंकि समाज मानता है कि अच्छे लोगों को उनकी बहादुरी के बदले में उनके न चाहते हुए भी कुछ ज़रूर मिलना चाहिए। मर चुके लोगों को समाज कुछ भी देने में मजबूर है। तब समाज ईश्वर से उन्हें दूसरी दुनिया में उनकी शहादत का अच्छा बदला देने की प्रार्थना करता है।
    ...क्योंकि समाज चाहता है कि शहीदों के दिल में भले ही किसी ईनाम की ख्वाहिश न हो तो भी उनके लिए शहादत नुक्सान का सौदा न बने।
    व्यक्ति ‘सौदे‘ की भावना से ऊपर उठ सकता है, पूरा समाज नहीं। सौदे की भावना बुरी है भी नहीं। हरेक समाज में सौदा करना एक अच्छी बात है। नुक्सान का सौदा करना बुरी बात है और नफ़े का सौदा करना अक्लमंदी की बात है। यही वजह है कि शहीद होने वाले सैनिक और सिपाही भी अपनी शहादत से पहले हर महीने बाक़ायदा अपनी सैलरी वसूल करते हैं और अपनी सर्विस बुक में यह तक दर्ज करते हैं कि उनकी मौत के बाद मिलने वाले लाभ उनके परिवार में किस किस को मिलने चाहिएं ?

    शहीदों का अमल अपनी शहादत से पहले यह होता है। सियाचिन की ड्यूटी पर भेजे जाने वाले सैनिकों को दूसरे सैनिकों से कुछ ज़्यादा लाभ दिया जाता है। उनकी तरक्क़ी करके भी उन्हें नफ़ा पहुंचाया जाता है। रिटायरमेंट के बाद वे पेंशन भी लेते हैं। नास्तिक भी लेते हैं और उनका ज़मीर उन्हें ज़रा नहीं कचोटता क्योंकि सौदा कोई बुरी चीज़ नहीं है। इसीलिए तो समाज देश की सेवा करने वालों को और शहीदों के परिवारों को दौलत और इज़्ज़त से नवाज़ता है। फ़ायदे का सौदा देखकर ही लोग इनकी तरफ़ लपकते हैं। बुद्धि और विवेक नफ़ा नुक्सान देखकर ही फ़ैसला करते हैं।
    यह तो हुई सौदे की बात।

    देश के लिए क़ुरबानी देने वाले भगत सिंह अकेले नहीं थे। यह तय करना बड़ा मुश्किल है कि भगत की क़ुरबानी ज़्यादा बड़ी है या रानी लक्ष्मीबाई की या फिर किसी और की ?

    Read entire story on this link:
    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/ziya-ul-haq
    DR. ANWER JAMAL said…
    धर्म से आशा और नास्तिकता से सिर्फ़ निराशा मिलती है
    @ प्रिय प्रवीण जी ! आपने दोहराया है कि
    ' कर्तव्य की राह पर बलिदान कोई भी आदमी अपने ज़मीर के चलते करता है और यही होना भी चाहिये, किसी अन्देखे-अनजाने की बनायी एक दूसरी काल्पनिक दुनिया में जम कर ऐशोआराम के लालच/फायदे के चलते तो कोई बलिदान की सोचना एक किस्म का सौदा होगा और सौदा करने वाला एक लालची इंसान भी... ऐसे लालची को बेवक्त जान गंवाने की बजाय कुछ दिन उपवास करना और दिन में कुछ बार प्रार्थना कर लेना एक बेहतर तरीका लगेगा स्वर्ग में सीट पक्की करने का ... :)'

    आप शहादत को केवल ज़मीर से जोड़कर देख रहे हैं। कई बार आदमी इसलिए नहीं भाग पाता क्योंकि भगोड़ा बनने की सज़ा भी मौत ही होती है। ऐसे में वह मैदान में दुश्मन से लड़कर इज़्ज़त की मौत मरना पसंद करता है। सेना ने भगोड़े के लिए सज़ा ए मौत मुक़र्रर करके सैनिक को शहादत की मौत चुनने में ही भलाई समझाई है।
    सेना का क़ानून पुलिस में भी लगा दिया जाए तो भगोड़ों की तादाद बहुत कम हो जाएगी। ऐसा इसलिए नहीं होगा कि क़ानून की वजह से लोगों का ज़मीर जाग जाएगा। नहीं, बल्कि ऐसा इसलिए होगा कि अब मैदान से भागना नफ़े की बात है और तब मैदान से भागना नुक्सान की बात होगी।
    पता नहीं, आप इंसानी साइकोलॉजी की यह मामूली सी बात क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि इंसान उस काम से बचता है। जिसमें वह अपना नुक्सान देखता है और नुक्सान का काम करने वाला समाज में मूर्ख समझा जाता है।

    ज़मीर की आवाज़ पर काम करने वाले भी अपना नफ़ा देखकर ही काम करते हैं। वे अपने ज़मीर के खि़लाफ़ काम करते हैं तो उनके अंदर बेचैनी पैदा हो जाती है। अपने ज़मीर के मुताबिक़ काम करके उन्हें अपने अंदर बेपनाह ख़ुशी का अहसास होता है। बेचैनी से बचने के लिए और ख़ुशी महसूस करने के लिए ही वे ज़मीर की आवाज़ पर अपनी जान दे देते हैं। जिन्हें ज़मीर की आवाज़ पर क़ुरबानी देने के ख़याल से ही ख़ुशी महसूस होती है, वही शहादत की राह में ख़ुशी ख़ुशी क़दम बढ़ाते हैं।
    जिन्हें अपने अंदर यह ख़ुशी महसूस नहीं होती। वे दूसरे भौतिक लाभ पाने के लिए या सज़ा ए मौत और बदनामी से बचने के लिए अपनी जान देने के लिए खुद को मजबूर पाते हैं। जहां दूसरे भौतिक लाभ पर कोई आंच न आती हो और सज़ाए मौत या बदनामी भी न होती हो। वहां उन्हें उनकी अक्ल जान देने से रोकती है। वे अपने ज़मीर के बजाय अपनी अक्ल की बात मानते हैं और भाग खड़े होते हैं।

    ज़मीर की आवाज़ पर कम, बहुत कम लोग चलते हैं। ज़्यादातर लोग भौतिक नफ़े-नुक्सान का गणित देखकर फ़ैसला करते हैं। अक्ल सही हो तो मरना कोई भी न चाहेगा।
    आज समाज की रक्षा और सेवा वही लोग कर रहे हैं। जो अपने ज़मीर की आवाज़ पर काम कर रहे हैं। ये लोग बहुत कम हैं। इसीलिए न तो समाज की रक्षा ढंग से हो पा रही है और न ही उसकी सेवा। भौतिक नफ़े नुक्सान को सामने रखकर फ़ैसले करने वाले अक्सर लोगों को उनके फ़र्ज़ की अदायगी में शहादत के जज़्बे तक ले जाने से ही समाज की रक्षा व उसकी सेवा ढंग से हो पाएगी और ऐसा करने के लिए वे तभी तैयार होंगे जबकि उन्हें अपने फ़र्ज़ की अदायगी में नफ़ा और लापरवाही में सख्त सज़ा का नुक्सान नज़र आने लगेगा।
    सेना में यही नज़र आता है लेकिन दूसरे विभागों में भी यही नज़र आने की ज़रूरत है। सेना में भगोड़े के लिए सज़ा ए मौत की जानकारी ख़ुद आपने ही दी है। सेना में ड्यूटी की अदायगी और शहादत को सैनिकों के ज़मीर के भरोसे नहीं छोड़ा गया है क्योंकि किसी का कुछ भरोसा नहीं है कि वह ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका पालन करेगा या नहीं ?

    सैनिक अपने रिटायरमेंट के बाद कंपनियों को सिक्योरिटी गार्ड देने जैसा कोई न कोई काम कर लेते हैं। नास्तिक सैनिक भी यही करते हैं। अपने गुज़र बसर के लायक़ कमाने के बावजूद वे अपनी पेंशन भी लेते रहते हैं। नास्तिक भी पेंशन लेते रहते हैं।
    जो नास्तिक अपनी पेंशन के चंद रूपयों का लालच न छोड़ पाए। वह दूसरों को परलोक के बड़े ईनाम की चाहत पर लालची होने का दोष कैसे दे सकता है ?
    (जारी ...)
    DR. ANWER JAMAL said…
    ...धर्म में परलोक के जीवन की सफलता इसी बात में बताई गई है कि जिस वक्त इंसान के सिर पर जो फ़र्ज़ आयद हो, वह उसे ज़रूर अंजाम दे।
    वह बच्चा हो तो पढ़े और जब वह जवान हो जाए तो विवाह करे। माँ-बाप हों तो उनकी सेवा करे। अतिथि आ जाए तो उनकी भी करे और बच्चे हो जाएं तो उनकी परवरिश भी करे। नित्यकर्म के समय पर नित्यकर्म करे और उपासना के समय उपासना करे। भोजन के समय भोजन करे और उपवास के निश्चित काल में उपवास भी करे। ख़ुद शांति से खेती बाड़ी और दूसरे कारोबार करे और अगर दूसरे शांति व्यवस्था को भंग करें तो उन्हें बातचीत से या बल प्रयोग से रोके। फिर भी वे न मानें तो समूह का मुखिया जो कहे, उसे पूरा करे। वे हमला करें तो उनसे युद्ध करे।
    सभी फ़र्ज़ उम्र और हालात के साथ वाबस्ता हैं। शांतिकाल में हिंसा और युद्धक्षेत्र में अहिंसा धर्म नहीं सिखाता। प्रार्थना और उपवास के समय यही करना धर्म है और युद्ध अपरिहार्य हो जाए तो फिर युद्ध ही धर्म है। जो युद्ध से भाग जाए, उसे धर्म से भागा हुआ समझा जाता है और समाज में उसे जो अपयश मिलता है। वह न लड़ने वालों को भी धनुष उठाने पर मजबूर कर देता है।
    आप धर्म को ठीक से समझ लेते तो नास्तिक न होते।
    आपका नास्तिक होना, आपकी कोई उपलब्धि नहीं है बल्कि धर्म के सच्चे बोध की उपलब्धि से वंचित रह जाना है। अक्सर नास्तिकता के पीछे यही कारण होता है।
    धर्म इंसान के ज़मीर के साथ उसके बुद्धि विवेक को भी अपील करता है। वह बताता है कि ‘ऐ इंसान ! अगर तू लड़ने बाद भी ज़िंदा रहा तो दूसरों की तरह तू भी दुनिया के सुख भोगेगा और अगर मर गया तो तू उनसे ज़्यादा अच्छे सुख भोगेगा और हमेशा भोगेगा।‘
    धर्म मनुष्य को आशा का संबल देता और नास्तिकता उसे निराश करती है। नास्तिकता बताती है कि जो कुछ है, बस यही जीवन है। मौत के साथ ही तू हमेशा के लिए ख़त्म है। तेरा ज़मीर भी ख़त्म हो जाएगा। सब कुछ गवां देने का नाम है नास्तिकता है जबकि सब कुछ पा लेने की आशा का नाम धर्म है।
    सनातन काल से आज तक हरेक भाषा में यही धर्म है और नास्तिकता भी यही है।
    आपकी नज़र में ज़िया उल हक़ जैसे आदमी को कुछ नहीं मिला। आपका यह उत्तर लोगों को निराश ही करेगा।

    धन्यवाद !
    रविकर said…
    बहस का स्तर शानदार-
    बधाई आस्तिको - नास्तिकों
    दोनों को-
    Dr. Ayaz Ahmad said…
    मोहतरमा शालिनी कौशिक साहिबा, जनाब रविकर साहब, प्रवीन साहब और दीगर ब्लोगर्स का शुक्रिया।
    आपने इस बहस पर ध्यान दिया।
    डा. अनवर जमाल साहब का शुक्रिया , उनके जवाबों के लिए।
    हर शख्स के सोचने का एक अंदाज़ और एक पहलू हुआ करता है। आपस में बातचीत से इंसान की शख्सियत और उसकी सोच मुकम्मल होती है। इस बहस की मंशा भी यही है।
    अच्छे मुबाहिसे कम देखने में आते हैं और बिला शुब्हा यह उनमें उसे एक है।
    अच्छी सोच तरकक़ी करे और बुराई की जड़ें कमज़ोर हों, ख़ुदा करे कि ऐसा हो।

    आमीन ...

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