Tuesday, March 12, 2013

मुहब्बत और इश्क़ में थोड़ा सा फ़र्क़ है...

साभार बड़ा ब्लॉगर कैसे बनें ?

पुराने उर्दू फ़ारसी लिट्रेचर में मुहब्बत और इश्क़ में थोड़ा सा फ़र्क़ माना जाता है। मुहब्बत में अक्ल क़ायम रहती है और इश्क़ में जुनून होता है, दीवानगी होती है। उसमें अक्ल बाक़ी नहीं रहती। जिसमें अक्ल बाक़ी हो, समझो उसे इश्क़ नहीं हुआ और अगर वह बदनामी से डरता हो तो समझ लो उसे मुहब्बत भी नहीं हुई क्योंकि बदनामी इश्क़ में तो होती ही है, मुहब्बत खुल जाय तो उसमें भी हो जाती है।
बदनामी ने इसके दामन को कभी छुआ तक नहीं। अल्लाह का चर्चा करने के लिए जो दो एक ब्लॉगर बदनाम हैं। यह उनके पास तक नहीं फटकता।
इसीलिए हिंदी हिंदू ब्लॉगर्स से कमाने वाला यह अकेला ‘अल्लाह का आशिक़‘ है।
बड़े ब्लॉगर्स का एक रंग यह भी है। ये सदियों से चली आ रहे शब्दों के अर्थ बदल कर रख देते हैं।

3 comments:

रविकर said...

बहुत बढ़िया है आदरणीय -

नामी ब्लॉगर हो गया, पाया बड़े इनाम |
इश्क-मुहब्बत भूल के, करूँ काम ही काम |
करूँ काम ही काम, किताबें दस छपवाईं |
करे रुपैया नाम, कदाचित नहीं बुराई |
पर रविकर कंजूस, भरे रुपिया ना हामी |
पुस्त-प्रकाशन शून्य, हुआ ना अभी इनामी ||

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय रविकर जी ! बड़ा ब्लॉगर बिना पैसे दिए भी ईनाम झटक लेता है बल्कि ईनामदारों से रक़म भी झटक लेता है। यहां बड़े बड़े छल प्रपंच चल रहे हैं। आप हिंदी ब्लॉगिंग के गोल्डन काल के बाद आए हैं। आप ज़रा सा चूक गए हैं वर्ना आपको बड़े अदभुत नज़ारे देखने को मिले होते।
ख़ैर, आपको भी भाई लोग बिना ईनाम दिए छोड़ने वाले नहीं हैं।
:)

पेशगी शुभकामनाएं !
http://blogkikhabren.blogspot.com/2013/03/ishq.html

लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

 जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...