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ईश्वर की आलोचना कौन करता है ?

माल मन की मुराद है और उसे पाने के लिये कोई खुदा से दुआ मांग रहा है और कोई देवी देवता से प्रार्थना कर रहा है. धर्म पर चल कर अपनी आज़ादी कोई नहीं खोना चाहता. सच क्या है ?
सब जानते हैं. उसे मानें तो दुख पाएँ.
सच के लिये कष्ट कौन झेले ?
ऐसे लोग अपनी मर्ज़ी से किसी आदमी को ईश्वर मान लेते हैं या ईश्वर को आदमी मान लेते हैं या कोई जानवर या पेड़ पत्थर या कोई और चीज़ मान लेते हैं. उनके बारे में ख़याली कहानियाँ लिख लेते हैं और फिर उनकी आलोचना करते रहते हैं. 
उसने यूं क्यों किया ?
उसने यूं क्यों न किया ?
इस बातचीत का नाम वे धर्म और अध्यात्म रख लेते हैं. इसमें माल, मज़ा और आज़ादी सब है.
इसमें अहंकार का मौक़ा भी मिल जाता है कि देखो हम इतने बढिया हैं कि हम ईश्वर की आलोचना भी कर सकते हैं ? 
ईश्वर और धर्म को मानकर ये अहंकार न कर पाते . 
रूहानियत के नाम धंधेबाज़ी और पाखंड फैला हुआ है।
यही पाखंडी आज देश की आम जनता को भ्रमित कर रहे हैं।
मालिक को राज़ी करने की लगन सच्ची हो और साधक अपनी अक्ल खुली रखे तो ही आदमी इस तरह के भ्रम से बच सकता है।

Comments

रविकर said…
एक बात और -है डाक्टर साहब-
अपने को अधिक कट्टर हिन्दू या अधिक कट्टर मुसलमान दिखाने के लिए-
हम सब अपनी लेखन कला का दुरूपयोग भी कर बैठते हैं अनजाने में शायद उपरवाले की शान में गुस्ताखी भी-
सादर
वो जो अपने आपको ईश्वर बनाना चाहते हैं वो आलोचना करते और करवाते हैं
DR. ANWER JAMAL said…
आज आपने जो हमारी पोस्ट पर कहा है. उसी को हम यहाँ दोहरा देते हैं-
'दीन धर्म में ठगों का दाख़िला लोगों की लापरवाही की वजह से ही होता है.
आपने ख़बरदार किया, इसके लिए शुक्रिया.'
लिंक
मदरसे और मस्जिद के लिए चंदा के नाम पर फैल रहा है कमीशनख़ोरी और ठगी का धंधा
http://blogkikhabren.blogspot.in/2013/02/blog-post_28.html

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