Tuesday, March 19, 2013

सवाल ये है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है तो शादी/विवाह की उम्र को ही क्यों ना कम किया गया ?

पिछले कुछ वर्ष मे भारतीय समाज में आए खुलेपन, मीडिया और फिल्मों के प्रभाव के कारण युवाओं विशेषकर किशोरों मे सेक्स की प्रवृत्ति बढ़ी है.......
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 15 से 24 साल की उम्र में प्यार करने वाले लड़के-लड़कियों में से 42 फीसदी लड़कों और 26 फीसदी लड़कियों ने अपने साथी के साथ सेक्स किया होता है........
आज इंटरनेट और टीवी चैनलों के कारण युवाओं को सेक्स के बारे में जानकारियां पहले की अपेक्षा ज्यादा आसानी से मिल रही हैं. यही वजह है कि 18 की उम्र के पहले ही युवाओं में सेक्स का चलन बढ़ा है........
सरकार का मानना है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है........
पर प्रशन ये है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है तो शादी/विवाह की उम्र को ही क्यों ना कम किया गया......
विवाह पूर्व सेक्स की मान्यता देना कहाँ की बुद्धिमता है......
जब विवाह पूर्व सेक्स जायज़ कर दिए आप ने तो ये भी बता दीजिए के इस जायज़ सेक्स के बाद जन्मे नाजायज़ बच्चों का क्या होगा......??

Monday, March 18, 2013

'आओ मेरा बलात्कार करो’-पूर्वोत्तर की महिलाएं सुरक्षाबलों को क्यों ललकारती हैं ?


हमारे सैनिक वीर जवान हैं. वे बहुत मुश्किल हालात में रहते हैं. कभी कभी वे कुछ मुश्किलें खड़ी भी कर देते हैं. यह तब होता है जब उनमें से कुछ का जोश बाहर के दुश्मनों पर बरसने के बजाय अपने देश की माँ-बहनों पर ही ख़र्च होने लगे.
वेद प्रकाश पाठक जी ने अपनी एक पोस्ट में ऐसी पीड़ित औरतों का बयान करते हुए लिखा है कि
पूर्वोत्तर की उन पहाड़ियों से मिलता है जहां की बुजुर्ग महिलाएं सड़क पर उतरकर सुरक्षाबलों को ललकारती हैं कि ‘आओ मेरा बलात्कार करो....’। 
यह सही है कि कश्मीर हो या फिर पूर्वोत्तर, बगैर सुरक्षाबलों के हमारी राष्ट्रीय अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। वहां सैन्य ताकत चाहिए लेकिन हमारी मां-बहनों के बलात्कार की कीमत पर नहीं।
अतः ज़रूरतमंद सैनिकों के साथ उनकी पत्नियों के रहने का इंतेज़ाम किया जाना चाहिये. इससे 'फ़ौजी फ़ौज में, पड़ोसी मौज में' के हालात भी क़ाबू में रहेंगे और हमारे वीर जवान एकाग्र होकर मोर्चा संभाल सकेंगे.

Tuesday, March 12, 2013

मुहब्बत और इश्क़ में थोड़ा सा फ़र्क़ है...

साभार बड़ा ब्लॉगर कैसे बनें ?

पुराने उर्दू फ़ारसी लिट्रेचर में मुहब्बत और इश्क़ में थोड़ा सा फ़र्क़ माना जाता है। मुहब्बत में अक्ल क़ायम रहती है और इश्क़ में जुनून होता है, दीवानगी होती है। उसमें अक्ल बाक़ी नहीं रहती। जिसमें अक्ल बाक़ी हो, समझो उसे इश्क़ नहीं हुआ और अगर वह बदनामी से डरता हो तो समझ लो उसे मुहब्बत भी नहीं हुई क्योंकि बदनामी इश्क़ में तो होती ही है, मुहब्बत खुल जाय तो उसमें भी हो जाती है।
बदनामी ने इसके दामन को कभी छुआ तक नहीं। अल्लाह का चर्चा करने के लिए जो दो एक ब्लॉगर बदनाम हैं। यह उनके पास तक नहीं फटकता।
इसीलिए हिंदी हिंदू ब्लॉगर्स से कमाने वाला यह अकेला ‘अल्लाह का आशिक़‘ है।
बड़े ब्लॉगर्स का एक रंग यह भी है। ये सदियों से चली आ रहे शब्दों के अर्थ बदल कर रख देते हैं।

Sunday, March 10, 2013

औरतें अपने जैसी औरतों को अपना हमदर्द क्यों न बना सकीं ?

ब्लॉगिस्तान में बड़ी बड़ी बातें करने वालों की भीड़ है। बात हमेशा बड़ी ही करनी चाहिए। बड़ी बात करने का फ़ायदा यह है कि उसे कभी पूरा करना नहीं पड़ता और पूरा करो तो वह पूरी भी नहीं होती।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भी यही देखने में आया। किसी ने उम्मीद जताई और किसी ने अफ़सोस जता दिया। गुन्डे बदमाश उनकी बात पढ़ते नहीं और पढ़ने वाले मानते नहीं। औरतों को गुन्डों से ज़्यादा उसके अपने घर वाले सताते हैं। औरत को मर्दों से ज़्यादा औरतें सताती हैं। घर में और समाज में औरतें मर्दों से ज़्यादा औरतों के साथ रहती हैं। औरतें अपने जैसी औरतों को अपना हमदर्द न बना सकीं। घरों मे दिल को छीलने वाली बातें औरतें ही करती हैं। दहेज न लाने पर बहू को जली कटी कौन सुनाता है ? 

Friday, March 8, 2013

औरत की तरक्क़ी जारी है...


औरत ने तरक्क़ी की है। औरत आज हरेक मैदान में सरगर्म है। फिर सेहत और सुरक्षा के मामले में उसकी हालत अच्छी नहीं है। पिछले 40 सालों के दौरान औरतों के खि़लाफ़ होने वाले जरायम में 875 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसने औरत की तरक्क़ी की ख़ुशी को मद्धम कर दिया है।
सख्त क़ानून के बाद भी रेप और इसी क़िस्म के दूसरे जरायम कम होने के बजाय लगातार बढ़ रहे हैं। बहुत तरह के रहनुमा हैं और बहुत तरह की बातें हैं। कोई किस तरफ़ जाए ?
यह तय नहीं हो पा रहा है। इसलिए फ़िलहाल तो समाज अंग्रेज़ों के तरीक़े पर जी रहा है। वहां शादी से पहले जिन्सी ताल्लुक़ात आम बात हैं तो यहां भी हो चुके हैं।
औरत के शोषण का एक यह रूप जो नहीं था। यह भी तरक्क़ी के नाम पर चलन में आ चुका है।

अफ़सोस ! इस मैदान में भी औरत की तरक्क़ी जारी है।

Thursday, March 7, 2013

देखते हैं कि प्रवीन जी की तरफ़ से क्या जवाब आता है ?


अच्छे बहस मुबाहिसे ब्लॉगिस्तान में कम देखने में आ रहे हैं। हम भी अपने काम में मशग़ूल हो गए हैं। दीन यही कहता है कि दुनिया की ज़िंदगी इम्तेहान है। दूसरों का भला करना सबसे बड़ी नेकी है। यह हरेक इंसान का फ़र्ज़ है, चाहे वह वर्दी में हो या न हो। इस फ़र्ज़ को अदा करने में जान चली जाए तो यह शहादत कहलाती है। इसलाम में शहादत का दर्जा पाना कामयाबी की बात है। दूसरे धर्मों में भी इसे अच्छा माना जाता है और मरने के बाद की ज़िंदगी में राहत और ऐश मिलना बताया जाता है। इससे फ़र्ज़ की राह में मरना आसान हो जाता है और उसके बाद के रिश्तेदारों के दिलों को भी तसल्ली मिलती है कि हमारा आदमी अच्छे हाल में है।
दहरिये यानि नास्तिक लोग तो यही बताते हैं कि मरने के बाद ऐसी कोई ज़िंदगी नहीं है। लिहाज़ा कोई समझदार तब तक अपना फ़र्ज़ अदा करेगा जब तक कि उसकी ज़िंदगी को ख़तरा न हो। अपने ऊपर ख़तरा पड़ते देखते ही वह भाग खड़ा होगा। साईंस भी इसे नेचुरल बताती है।
वक्ती मसले पर एक गर्मागर्म बहस :
ज़िया उल हक़ सीओ की हत्या के संदर्भ में नास्तिक दार्शनिकों और आम नागरिकों की थ्योरी और प्रैक्टिकल का एक विश्लेषण
by 
  • DR. ANWER JAMAL


  • Monday, March 4, 2013

    पुलिस अधिकारी ज़िया व अन्य सैनिकों को शहीद का खि़ताब और सम्मान दिया जाय


    पुलिस अधिकारी ज़िया उल हक़ को पब्लिक ने उग्र होकर मार डाला या भीड़ को भड़का कर गुण्डा तत्वों ने मार डाला। बहरहाल एक ज़ांबाज़ अफ़सर मारा गया। हर साल ऐसे बहुत से अधिकारी और सिपाही अपनी ड्यूटी के दौरान मारे जाते हैं।
    इन्हें सैनिकों की तरह शहीद का खि़ताब और सम्मान नहीं दिया जाता।
    क्यों नहीं दिया जाता ?
    इस पर सोचना चाहिए।
    इस बात की व्यवस्था भी करनी चाहिए कि उनकी मौत के बाद उनके परिवार के लोगों का जीवन उसी स्तर पर चलता रहे जैसे कि उसकी मौजूदगी में चल रहा था।
    ऐसा नहीं किया जाता तो उनके काम करने के अंदाज़ पर उल्टा असर पड़ सकता है।
    गुण्डों को पकड़कर सख्त सज़ा देकर उनका मनोबल तोड़ना भी ज़रूरी है।
    हमें हिफ़ाज़त देने वालों की हिफ़ाज़त ख़तरे में नहीं रहनी चाहिए।

    Friday, March 1, 2013

    ईश्वर की आलोचना कौन करता है ?

    माल मन की मुराद है और उसे पाने के लिये कोई खुदा से दुआ मांग रहा है और कोई देवी देवता से प्रार्थना कर रहा है. धर्म पर चल कर अपनी आज़ादी कोई नहीं खोना चाहता. सच क्या है ?
    सब जानते हैं. उसे मानें तो दुख पाएँ.
    सच के लिये कष्ट कौन झेले ?
    ऐसे लोग अपनी मर्ज़ी से किसी आदमी को ईश्वर मान लेते हैं या ईश्वर को आदमी मान लेते हैं या कोई जानवर या पेड़ पत्थर या कोई और चीज़ मान लेते हैं. उनके बारे में ख़याली कहानियाँ लिख लेते हैं और फिर उनकी आलोचना करते रहते हैं. 
    उसने यूं क्यों किया ?
    उसने यूं क्यों न किया ?
    इस बातचीत का नाम वे धर्म और अध्यात्म रख लेते हैं. इसमें माल, मज़ा और आज़ादी सब है.
    इसमें अहंकार का मौक़ा भी मिल जाता है कि देखो हम इतने बढिया हैं कि हम ईश्वर की आलोचना भी कर सकते हैं ? 
    ईश्वर और धर्म को मानकर ये अहंकार न कर पाते . 
    रूहानियत के नाम धंधेबाज़ी और पाखंड फैला हुआ है।
    यही पाखंडी आज देश की आम जनता को भ्रमित कर रहे हैं।
    मालिक को राज़ी करने की लगन सच्ची हो और साधक अपनी अक्ल खुली रखे तो ही आदमी इस तरह के भ्रम से बच सकता है।

    लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

     जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...