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रूहानियत के नाम पर धंधेबाज़ी और पाखंड

आज भारत में हज़ारों ऐसे गुरू हैं जो अपने ईश्वर और ईश्वर का अंश होने का दावा करते हैं और भारत क़र्ज़ में दबा हुआ भी है और क्राइम का ग्राफ़ भी लगातार बढ़ता जा रहा है। अगर उनसे कहा जाए कि आप इतने सारे लोग साक्षात ईश्वर हैं तो भारत का क़र्ज़ ही उतार दीजिए या जुर्म का ख़ात्मा ही कर दीजिए।
तब वे ऐसा न कर पाएंगे।
वे सब मिलकर किसी एक मरी हुई मक्खी तक को ज़िंदा नहीं कर सकते।
इसके बावजूद न तो वे अपने दावे से बाज़ आते हैं और न ही उनके मानने वाले कभी यह सोचते हैं कि दवा खाने वाला यह आदमी ईश्वर-अल्लाह कैसे हो सकता है ?
रूहानियत के नाम धंधेबाज़ी और पाखंड फैला हुआ है।
यही पाखंडी आज साधकों को भ्रमित कर रहे हैं।
मालिक को राज़ी करने की लगन सच्ची हो और साधक अपनी अक्ल खुली रखे तो ही वह इस तरह के भ्रम से बच सकता है।


http://sufidarwesh.blogspot.in/2012/05/ruhani-haqiqat.html#comment-form

Comments

रविकर said…
अंधों की भरमार है, मार बिना चालाक |
सीधी राहों पर चलें, थामे अपनी नाक |
थामे अपनी नाक, नदी में रहे डूबते |
फिर भी है विश्वास, ठगी से नहीं ऊबते |
ढकोसलों की जीत, जीत है इन धंधों की |
भटके प्रभु को भूल, दुर्दशा है अंधों की ||
रविकर said…
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।
DR. ANWER JAMAL said…
badhiya upyog.

Thanks.
Shah Nawaz said…
सही कहा, जो एक मक्खी को जिंदा करने की ताकत नहीं रखते वोह पूरे ब्रहमाण्ड के पालनहार कैसे हो सकते हैं?
रविकर said…
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के चर्चा मंच पर ।।
बहुत अच्छी बात कही है !!
कैसे प्यारे देश की, बदलेगी तसबीर।
अपनी रोटी सेंकते, संत-महन्त-फकीर।।
समाज के किसी काम के नहीं हैं ये स्वयम घोषित भगवान .एक निर्मल जी थे ,एक आशाराम जी हैं जब तब सुर्ख़ियों में रहतें हैं अब मृतका निर्भया को सीख दे रहें हैं उसे कुसूरवार ठहरा रहें हैं पूछा जा

सकता है ये अंतर -यामी ,सर्वत्र व्यापी कण कण वासी उस समय क्या कर रहे थे .सरस्वती अखंड जाप करके बलात्कार की समस्या का समूल नाश क्यों नहीं कर देते .शाप क्यों नहीं दे देते .रोट

तोड़ते

राम सिंह जैसों को .?

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