Saturday, July 27, 2013

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द : महमूद मदनी

   जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि हजरत शेखुल हिंद की खिदमात और रेशमी रुमाल की तहरीक के सौ वर्ष पूरे होने पर जमीयत द्वारा देवबंद में विशाल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जाएगा।          

   मदनी मंजिल पर आयोजित जमीयत उलेमा-ए-हिंद की बैठक में बोलते हुए मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जंग-ए-आजादी में शेखुल हिंद द्वारा दिए गए योगदान को कभी नहीं भूलाया जा सकता। 
    तहरीक रेशमी रुमाल पर विस्तार से रोशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद की मजलिस ए आमला (वर्किंग कमेटी) द्वारा यह निर्णय लिया गया था कि शेखुल हिंद की सेवाओं को उजागर करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में 100 कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएगी। 
  जमीयत द्वारा 80 सफल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जा चुका है तथा रेशमी रुमाल की तहरीक के सौ वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आगामी नवंबर माह में 100वीं कॉन्फ्रेंस देवबंद में विशाल रूप में आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि इजलास में देश विदेश के प्रमुख उलेमा समेत करीब 10 लाख लोगाों के भाग लेने की संभावना है। 
  बैठक में 100वीं कॉन्फ्रेंस हेतू स्थान नियुक्त करने के लिए दस सदस्यीय कमेटी का गठन किया भी गया। बैठक की अध्यक्षता मौलाना महमूद मदनी व संचालन मौलाना हसीब सिद्दीकी ने किया। इस मौके पर चौ. सादिक, उमैर उस्मानी, हाजी खलील, अब्दुल सत्तार, मुल्ला अकरम कुरैशी, मौ. इनाम कुरैशी, हाजी मोहम्मद जैद, सदरुद्दीन अंसारी, मौलाना मोहम्मद मदनी, नौशाद प्रधान, साबिर अली प्रधान, सलीम उस्मानी, डॉ. अब्दुल रऊफ आदि मौजूद रहे।  

Thursday, July 18, 2013

The Essence of Fasting रोज़े का महत्व

रमजान के पवित्र महीने में रोज़े रखना धार्मिक काम है जो आत्मा को शुद्ध करता है और इंसान को खुदा के साथ एक स्थायी सम्बंध के लिए तैयार करता है जहां अल्लाह का खौफ़ हावी रहता है। अगर ईमानदारी और विश्वास के साथ रोज़ा रखा जाये तो रोज़ा सबसे बढ़कर एक अच्छा इंसान बनने में हमारी मदद करता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि सभी धर्मों ने इस तरह या दूसरे तरीके से रोज़ा रखने का हुक्म दिया है। ये आमतौर पर जाना जाता है कि रोज़ा इस्लाम के पांच स्तम्भों में से एक है (अन्य चार ईमान, नमाज़, हज और ज़कात हैं)।

रमज़ान का पवित्र महीना इबादत का महीना है, सदक़े (दान) का महीना है, परहेज़गारी (धर्मपरायणता) का महीना है, कुरान का महीना है और सबसे बढ़कर ये आत्मावलोकन और खुद के सुधार का महीना है। यही वो महीना है कि जिसमें मुसलमान सभी अच्छे काम, हर ज़रिए, हर तरीके, हर जगह और उन सभी लोगों के साथ करने की कोशिश करते हैं जिनके साथ वो कर सकते हैं। तमाम नेकियाँ करो' के मक़सद के साथ आज सभी मुसलमानों को एक अच्छा इंसान बनने के लिए सामूहिक प्रयास करने, नैतिकता में बेहतरी को हासिल करने, अपने सामान्य व्यवहार में सुधार करने, असाधारण शक्ति वाली नैतिक भावना पैदा करने और एक ऐसा विश्वास हासिल करना ज़रूरी है कि जिससे वो अच्छाई और बुराई में भेद कर सकें, हालांकि सच्चाई हमेशा जल्दी हासिल नहीं होती है। ये इस समय और इस पवित्र महीने की वास्तविक ज़रूरत है।

इस्लाम के बुनियादी नैतिक मूल्य ये हैं: करुणा, दया और शांति। हमारे दिल व दिमाग़ में अल्लाह के खौफ के साथ अपनी धार्मिकता के लिए जो कि रोज़े से पैदा होती है और इस्लाम के नैतिक मूल्यों से लैस मुसलमान दुनिया को साधने के लिए चमत्कार कर सकते हैं और अपने खोए हुए गौरव को हासिल कर सकते हैं। सबसे पहले जो बात दिमाग में आती है, करुणा है और किस तरह ये हमें अच्छा इंसान बना सकती है। हमदर्दी का उसूल सभी धर्मों, नैतिकताओं और आध्यात्मिक परंपराओं का प्रमुख हिस्सा होता है, जो कि हम दूसरों से ऐसे बर्ताव की अपेक्षा करते हैं जैसा कि हम अपने लिए दूसरों से चाहते हैं। सहानुभूति हमें हमारे साथी प्राणियों के दुखों का अंत करने के लिए अथक संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। हमे अपनी दुनिया के केंद्र से खुद को उतारने और उस जगह दूसरों को स्थापित करने की प्रेरणा देता है। और सभी इंसानों के आदर और सम्मान की प्रेरणा देता है। किसी अपवाद के बिना सभी के साथ पूर्ण न्याय, समानता और सम्मान के साथ पेश आने की प्रेरणा देता है। सार्वजनिक और निजी दोनों जीवन में निरंतर दूसरों को तकलीफ पहुँचाने से बचना ज़रूरी है। द्वेष करना, अंध देश-भक्ति या व्यक्तिगत लाभ के लिए हिंसक काम करना और किसी को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित करना और किसी को बदनाम करके नफ़रत भड़काना, यहां तक कि दुश्मन के साथ भी ऐसा बर्ताव करना- हमारी साझा मानवता से इन्कार है।

इस्लाम में प्रेम की परंपरा के बारे में अपना अध्ययन शुरू करने के लिए सबसे अच्छी जगह निश्चित रूप से कुरान और पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का जीवन है। मुसलमानों को दुनिया के सभी अजूबों में खुदा के कृपालू होने के लक्षण (आयतें) पर ग़ौर करना ज़रूरी है। क्योंकि अल्लाह की उदारता की वजह से व्यवस्था और उर्वरता है, जिसमें कि अराजकता और बंजरपन हो सकता था। जैसे उन्होंने खुदा के दया भाव की सराहना करना सीखा है। मुसलमानों के अंदर भी इसकी नकल करने का रूझान पैदा होगा। वो भी खुदा के पैदा किये सभी प्राणियों के साथ मोहब्बत से पेश आना चाहेंगे और मेहरबान और जिम्मेदारी के गुण को चरमोत्कर्ष पर ले जाते हुए, खासकर समाज के कमज़ोर और वंचित वर्ग के लिए स्नेह और नेकी के लबादे में खुद को ढालना चाहेंगे।

कुरान की तिलावत अल्लाह, रहमान और रहीम से एक दुआ के साथ शुरू होती है। कुरान का मूल संदेश व्यावहारिक दयालुता और सामाजिक न्याय के लिए एक निमंत्रण है। दौलत जमा करना गलत है और निष्पक्ष तरीके से अपने धन को खर्च करना अच्छा है, और एक ऐसे सभ्य समाज के निर्माण के लिए संघर्ष करना अच्छा है, जहां सबका सम्मान किया जाए। हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के मिशन की शुरुआत से ही गरीबों को ज़कात देने को मुसलमानों की ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। ईमान (विश्वास) सिर्फ खुदा के बारे में सिद्धांतों के संकलन को तार्किक रूप से स्वीकार करना नहीं है। कुरान की प्रारंभिक सूरतों में बार बार इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मोमिन मर्द या औरत वो हैं जिन्होंने "इंसाफ के आमाल (कार्यों)" (सालेहात) अंजाम दिए। सभी मुसलमान इसे जानते हैं लेकिन हमें इन बुनियादी हक़ीक़तों से खुद को आगाह करने के लिए एक सचेत प्रयास की ज़रूरत है। कुरान खुद ही एक याद दिलाने वाली किताब है। ये बार बार हमें इस बात को याद दिलाती है कि इंसान मूल रूप से बुरा नहीं है बल्कि वो सिर्फ भूल का शिकार है। एक बार उनके धार्मिक, नैतिक और सामाजिक जीवन के मूल भाग में हमदर्दी बहाल कर दी गई तो वो सभी विवादैस्पद मुद्दे जो ईमान वालों के बीच विवाद पैदा करते हैं, उन्हें उचित परिपेक्ष्य में देखा जा सकता है।

ख्वाजा मुहम्मद जुबैर एक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये लेख खलीज टाइम्स से लिया गया है।

स्रोत: http://www.nation.com.pk/pakistan-news-newspaper-daily-english-online/columns/21-Jul-2012/the-essence-of-fasting

URL for English article:

http://newageislam.com/islam-and-spiritualism/by-khwaja-mohammad-zubair/the-essence-of-fasting!/d/8040

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/the-essence-of-fasting--روزے-کی-معنویت/d/12543

URL for this article:

http://www.newageislam.com/hindi-section/khwaja-mohammad-zubair,-tr-new-age-islam/the-essence-of-fasting---रोज़े-का-महत्व/d/12589

Thursday, May 2, 2013

जो लोग मुस्लिम हितो की सियासत कर रहे हैं ...


झूठे सपने दिखाने वालों के पीछे चलने से कुछ हासिल नहीं होने वाला, ख़याली  पुलाव पकाने की आदत ने आज मुस्लिमो को देश के दलितों से भी दलित, पिछडो से भी पिछड़े वर्ग में ला कर खड़ा कर दिया हैं,

गरीबी, बेरोजगारी, अंधविश्वास, अशिक्षा ने मुस्लिम की विकासशील विचारधारा को पूरी तरह से समाप्त कर कर दिया हैं इनका कसूरवार कौन हैं मेरी नज़र पिछले 65 सालो से जो लोग मुस्लिम की सियासत कर रहे हैं मैं उन्हें सबसे ज्यादा इसका दोषी मानता हूँ, हाँ वो गुनाहगार हैं वर्ना राजनैतिक चेतना से आज देश में दलित क्रांति ने पिछडो और शुद्रो को न केवल एकीक्रत किया हैं अपितु उन्होंने अपने विकास को भी सुनिश्चित किया हैं और लगातार सामाझिक, राजनैतिक स्तर पर अपनी क्रांति को आगे लेकर जा रहे हैं

मगर मुस्लिमो की हालत अपने ही वतन में परदेशीयो जैसी हो गई हैं अफ़सोस जो राजनैतिक दल मुस्लिम हितो की बात करते हैं वो ही मुस्लिमो की इस हालत के दोषी भी हैं क्युकी वो ही आज़ादी के बाद लगातार सत्ता में रहे और उन्होंने ही मुस्लिमो को विकसित नहीं होने दिया।

जो वतन से चले गए वो मुहाजिर हो गए
हम तो हाज़िर रहके भी गैरहाज़िर हो गए

आज देश में बढती भिखारियों की संख्या पर नज़र डालिए आंकड़े चौकाने वाले हैं और अब भिखारियों पर नज़र डालिए उनमे मुस्लिम बहुसंख्यक हैं

हमें एक होकर अपने विकास की राजनीती को अपनाना होगा ...

(साभार)

Tuesday, April 30, 2013

इसलाम के विषय में 5 सवालों के जवाब और 205 कॉमेंट्स


जानिए अल्लाह, रसूल और इबादत के बारे में-Dr. Anwer Jamal



हमारे एक भाई ने इसलाम के विषय में 5 सवाल किए हैं। उनका जवाब इस प्रकार है।
प्रश्न 1- अल्लाह कौन है? उसके क्या गुण है और उस अल्लाह की क्या पहचान है? वह साकार है या निराकार?
उत्तर 1- अल्लाह रब्बुल-आलमीन है यानि वह सब लोकों का पैदा करने वाला और पालनहार है। वह इंसानों का ‘इलाह‘ है क्योंकि उसी ने इंसान को पैदा किया है। वही जानता है कि इंसान के लिए क्या करना फ़ायदेमंद है और क्या करना नुक्सानदेह है।
अल्लाह अजन्मा है। न उसने किसी से जन्म लिया है और न ही उससे किसी ने ऐसे जन्म लिया है जैसे कि मनुष्य अपने माता पिता से जन्म लेता है। कोई उसके बराबर नहीं है और न ही कोई चीज़ उसके जैसी है। वह अतुलनीय और अप्रतिम है। उसके रूप और आकार का निर्धारण करने में मनुष्य की बुद्धि अक्षम है। इसीलिए उसे अचिंत्य और अकल्पनीय कहा गया है।
क़ुरआन व हदीस में अल्लाह के चेहरा या हाथ आदि का अलंकारिक तात्पर्य होता है। जिसे उसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
देखिये-

जानिए अल्लाह, रसूल और इबादत के बारे में 



Saturday, April 27, 2013

टीचर, क्लास में दिखाओ पोर्न

आज यह अनहोनी जानकारी हुई है-
अपने देश से पढ लिख कर जो लोग अंग्रेज़ों की खिदमत करने पहुंचे थे. वे अब बड़े धर्म संकट से गुज़र रहे हैं. उनके मूल्य और संस्कृति जो भी हों लेकिन 
अगर सब कुछ सही रहा तो जल्द ही ब्रिटेन के स्कूलों में खुद टीचर क्लास में पोर्न फिल्म दिखाएंगे।

Saturday, April 20, 2013

5 वर्षीय बच्ची के साथ रेप, लोग अब क्या करेंगे ?


दिल्ली में एक 5 वर्षीय बच्ची के साथ रेप हुआ। उसे 4 दिनों से बंधक बनाकर रखा गया। उसके साथ रेप किया गया। उसके पेट से तेल की शीशी और मोमबत्ती निकली है। उसकी हालत गंभीर है। दिल्ली के बाहर के लोग दुखी हैं और दिल्ली के रहने वाले पुलिस से भिड़ रहे हैं। 3 अधिकारी निलंबित कर दिए गए हैं।
क्या इस बार लोग फिर सख्त क़ानून बनाने की मांग करेंगे ?
...लेकिन क़ानून तो पहले ही सख्त बनाया जा चुका है !
...तो फिर लोग अब क्या करेंगे ?
(एक मज़मून  से साभार)
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यह सचमुच एक बड़ा सवाल है। इसका हल कौन बताएगा ?
सोचना हम सबको ही है. 

Friday, April 19, 2013

निरामिष तड़पे ‘हलाल मीट‘ की लोकप्रियता देखकर

‘हलाल मीट‘   जर्मनी वालों को ख़ूब पसंद आया या यूं कहें कि बड़े शहरों में रहने वाले उनके एंकर  को ख़ूब भा गया। तभी उन्होंने आलू-केले के ब्लॉग को छोड़कर इसे चुन लिया।
‘हलाल मीट‘ जर्मनी के डायचे वेले ईनाम के लिए नामज़द किए गए ब्लॉगों में से एक है। यह अच्छा है। इसकी अच्छाई की एक वजह यह है कि इसके मजमूए में एक लेख मेरा भी है।
शाकाहार को बढ़ावा देने में नाकाम रहने वाले एक साहब को ‘हलाल मीट‘ शुरू से ही अखर रहा है। वह जगह जगह ऐसे तड़प कर बोल रहे हैं जैसे कि उनके गले में मछली का कांटा फंस गया हो, हालांकि वह मछली नहीं खाते. वह ‘निरामिष‘ हैं।


Thursday, April 18, 2013

नेपाली युवती के साथ गैंगरेप किया गया

क़ानून सख्त बन गया मगर औरत है आज भी नर्म निवाला :

नई दिल्ली।। आज सुबह साउथ दिल्ली के नानकपुरा गुरुद्वारे के पास फुटओवर ब्रिज के नीचे एक नेपाली युवती बदहवास हालत में पड़ी मिली। जिस्म पर अस्त-व्यस्त और थोड़े कपड़े। कई जगह चोट के निशान। करीब 20 साल की इस युवती को यूं पड़ा देख वहां राहगीरों का मजमा इकठ्ठा हो गया। लोगों ने पूछा तो युवती ने एक ईंट का टुकड़ा उठा कर सड़क पर लिखकर बताया कि उसके साथ 3 लोगों ने रेप किया है।
किसी ने पुलिस को कॉल करके इस सनसनीखेज मामले की सूचना दी। फौरन साउथ दिल्ली के कई सीनियर अफसर समेत लोकल पुलिस पहुंची। युवती ने बताया कि किडनैप करके उसके साथ गैंगरेप किया गया है। तुरंत युवती को अस्पताल ले जाया गया।

Tuesday, April 16, 2013

दूसरे ब्लोगों को बकवास कहना हिन्दी ब्लोगिंग को नुकसान पहुँचाना है


सब मिल-जुल कर किसी ढंग के ब्लोगर को जर्मनी भेजने पर इत्तेफ़ाक़ कर ले। अच्छा तो यही है.
ब्लोगिंग का माज़ी (इतिहास) लिखने वाले उसका वर्तमान ख़राब कर रहे हैं. यह देखना अच्छा नहीं लगता. 
शोहरत के लिए या किसी और मकसद के लिए आदमी वह सब कर गुज़रता है जो कि नहीं करना चाहिए.
रविन्द्र परभात जी किसी ब्लॉग को अच्छा कहें तो सही है लेकिन वे या उनके हमनवा दूसरे ब्लोगों को बकवास कहने का हक नहीं रखते. उन्हें भी बहुत लोग पसंद करते हैं। दूसरे ब्लोगों को बकवास कहना हिन्दी ब्लोगिंग को नुकसान पहुँचाना है .
ईनाम के लिए  नामित एक महिला ब्लोगर कि ईमेल ने तो उनके बारे में बहुत कुछ बिना कहे कह दिया है.
यह चर्चा हो रही है इस पोस्ट की-

Ravindra Prabhat के प्रचार के पीछे ख़ुद रवीन्द्र प्रभात ही निकले ?


Thursday, April 11, 2013

रविश कुमार जी ‘बॉब्स अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 2013‘ में चल रही गड़बड़ियों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं

क्योंकि
‘‘औरत की हक़ीक़त‘ को वोट देने के बाद भी वहां वोट दर्ज नहीं होता। इसमें आयोजकों की कोई साज़िश तो नहीं है ?‘‘
पूरी सच्चाई का बयान-

रविश कुमार जी ‘बॉब्स अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 2013‘ में चल रही गड़बड़ियों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं।


ब्लॉग-चयन के लिए कुछ हिन्दी ब्लॉगर्स ने सीधे सीधे एंकर रविश कुमार जी को ज़िम्मेदार ठहरा दिया है। यह एक ग़लत बात है। रविश कुमार जी ने थोड़े ही ब्लॉग चुने हैं।
‘औरत की हक़ीक़त‘ ब्लॉग की वोटिंग ‘ज़ीरो‘ रहना इस बात का सुबूत है कि इन सारी अनियमितताओं के पीछे कुछ दूसरे छुटभय्ये लोग ज़िम्मेदार हैं। रविश कुमार जी इस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी से काम करते तो वह इतनी तरक्क़ी कैसे कर पाते ?
...लेकिन रविश कुमार जी को ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदारों का पता ज़रूर लगाना चाहिए, जिनकी वजह से उनका नाम ख़राब हो रहा है। लोग तो उन्हीं को जानते हैं, उनके या किसी और के नियुक्त किए हुए हैल्परों को थोड़े ही जानते हैं। हैल्पर उनकी हैल्प करने के बजाय उनकी छवि ख़राब कर रहे हैं।

Tuesday, April 9, 2013

डा. अनवर जमाल को सराहा गया जर्मनी में


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क़ाबिले क़द्र भाई ख़ुशदीप की पोस्ट के ज़रिये ब्लॉगर्स को पता चला कि दुनिया की 14 ज़बानों में 4 हज़ार से ज़्यादा ब्लॉग्स में से जब हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ 10 ब्लॉग चुने गए तो जर्मनी वालों ने उनमें डा. अनवर जमाल के ब्लॉग ‘औरत की हक़ीक़त‘ को भी चुना।
फ़ोलो करने लायक़ 10 ब्लॉग में ‘हलाल मीट‘ को देखकर यह यक़ीन हो गया कि चुनाव करने वाले किसी गुट से ताल्लुक़ नहीं रखते। इस ब्लॉग का संचालनकर्ता कौन है ?, यह तक क्लियर नहीं है लेकिन फिर भी इसे इज़्ज़त बख्शी गई। 
राजनीति, विज्ञान और समाज पर लिखने वाले दूसरे ब्लॉग भी इसमें शामिल हैं। उन सबकी लिस्ट भाई ख़ुशदीप के ब्लॉग से कॉपी की जा रही है। 
कौन-कौन से ब्लॉग इन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए नामांकित हुए हैं...

हिंदी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग...

अन्ना हज़ारे


आधारभूत ब्रह्मांड
विज्ञान

हिंदी में फॉलो करने लायक बेहतरीन ब्लॉग...



कोई भी हिन्दी ब्लॉगर ईनाम पाये लेकिन वह जर्मनी जाए और वहां हिन्दी का नाम रौशन करे। इसके लिए अपने पसंद के ब्लॉग को वोट दीजिए। पसंद का ब्लॉग न हो तो उनमें पढ़कर किसी को पसंद कीजिए। इस तरह के ईनाम देने का मक़सद यही होता है कि जिस ब्लॉग को नफ़रत या घटिया राजनीति के चलते पीछे धकेलने की कोशिश की गई हो। उसकी बेहतरी को मन्ज़रे आम पर क़ुबूल किया जाए और यहां तो आलमी सतह पर तसलीम किया गया है कि डा. अनवर जमाल हिन्दी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर्स में से एक हैं।
डा. अनवर जमाल समेत चुने गए सभी हिन्दी ब्लॉगरों को मुबारकबाद, सिर्फ़ इसलिए कि इस चुनाव में गुटबाज़ी और धांधली नहीं है।
‘औरत की हक़ीक़त‘ ब्लॉग पर कुल 21 पोस्ट्स देखी जा रही हैं। उनके 50 से ज़्यादा ब्लॉग्स में इस पर सबसे कम एक्टिविटी देखी गई है। अगर उनके एक्टिव ब्लॉग्स ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ या ‘वेद क़ुरआन‘ या ‘बुनियाद‘ वग़ैरह में से किसी को नॉमिनेट किया जाता तो ज़्यादा अच्छा रहता। 
बहरहाल हिन्दी ब्लॉगर्स की आवाज़ दुनिया के दूसरे कोने तक जा रही है। डा. अनवर जमाल के ज्ञान से दुनिया नफ़ा उठा रही है। यह एक अच्छा बदलाव है। यह एक अच्छी शुरूआत है।


Monday, April 8, 2013

ख़ूबसूरती हरेक खातून का पैदायशी हक़ तस्लीम किया जाये

...और इसके लिए सरकार को मुनासिब फंड फराहम करना चाहिए। जब तक ऐसा न हो तब तक औरतों को अपना तन पेट काट कर यह सब करना पड़ेगा जैसा कि देखा भी जा रहा है. 

एक मुफ़ीद लिंक शेयर करना अच्छा रहेगा.


Tuesday, March 19, 2013

सवाल ये है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है तो शादी/विवाह की उम्र को ही क्यों ना कम किया गया ?

पिछले कुछ वर्ष मे भारतीय समाज में आए खुलेपन, मीडिया और फिल्मों के प्रभाव के कारण युवाओं विशेषकर किशोरों मे सेक्स की प्रवृत्ति बढ़ी है.......
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 15 से 24 साल की उम्र में प्यार करने वाले लड़के-लड़कियों में से 42 फीसदी लड़कों और 26 फीसदी लड़कियों ने अपने साथी के साथ सेक्स किया होता है........
आज इंटरनेट और टीवी चैनलों के कारण युवाओं को सेक्स के बारे में जानकारियां पहले की अपेक्षा ज्यादा आसानी से मिल रही हैं. यही वजह है कि 18 की उम्र के पहले ही युवाओं में सेक्स का चलन बढ़ा है........
सरकार का मानना है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है........
पर प्रशन ये है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है तो शादी/विवाह की उम्र को ही क्यों ना कम किया गया......
विवाह पूर्व सेक्स की मान्यता देना कहाँ की बुद्धिमता है......
जब विवाह पूर्व सेक्स जायज़ कर दिए आप ने तो ये भी बता दीजिए के इस जायज़ सेक्स के बाद जन्मे नाजायज़ बच्चों का क्या होगा......??

Monday, March 18, 2013

'आओ मेरा बलात्कार करो’-पूर्वोत्तर की महिलाएं सुरक्षाबलों को क्यों ललकारती हैं ?


हमारे सैनिक वीर जवान हैं. वे बहुत मुश्किल हालात में रहते हैं. कभी कभी वे कुछ मुश्किलें खड़ी भी कर देते हैं. यह तब होता है जब उनमें से कुछ का जोश बाहर के दुश्मनों पर बरसने के बजाय अपने देश की माँ-बहनों पर ही ख़र्च होने लगे.
वेद प्रकाश पाठक जी ने अपनी एक पोस्ट में ऐसी पीड़ित औरतों का बयान करते हुए लिखा है कि
पूर्वोत्तर की उन पहाड़ियों से मिलता है जहां की बुजुर्ग महिलाएं सड़क पर उतरकर सुरक्षाबलों को ललकारती हैं कि ‘आओ मेरा बलात्कार करो....’। 
यह सही है कि कश्मीर हो या फिर पूर्वोत्तर, बगैर सुरक्षाबलों के हमारी राष्ट्रीय अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। वहां सैन्य ताकत चाहिए लेकिन हमारी मां-बहनों के बलात्कार की कीमत पर नहीं।
अतः ज़रूरतमंद सैनिकों के साथ उनकी पत्नियों के रहने का इंतेज़ाम किया जाना चाहिये. इससे 'फ़ौजी फ़ौज में, पड़ोसी मौज में' के हालात भी क़ाबू में रहेंगे और हमारे वीर जवान एकाग्र होकर मोर्चा संभाल सकेंगे.

Tuesday, March 12, 2013

मुहब्बत और इश्क़ में थोड़ा सा फ़र्क़ है...

साभार बड़ा ब्लॉगर कैसे बनें ?

पुराने उर्दू फ़ारसी लिट्रेचर में मुहब्बत और इश्क़ में थोड़ा सा फ़र्क़ माना जाता है। मुहब्बत में अक्ल क़ायम रहती है और इश्क़ में जुनून होता है, दीवानगी होती है। उसमें अक्ल बाक़ी नहीं रहती। जिसमें अक्ल बाक़ी हो, समझो उसे इश्क़ नहीं हुआ और अगर वह बदनामी से डरता हो तो समझ लो उसे मुहब्बत भी नहीं हुई क्योंकि बदनामी इश्क़ में तो होती ही है, मुहब्बत खुल जाय तो उसमें भी हो जाती है।
बदनामी ने इसके दामन को कभी छुआ तक नहीं। अल्लाह का चर्चा करने के लिए जो दो एक ब्लॉगर बदनाम हैं। यह उनके पास तक नहीं फटकता।
इसीलिए हिंदी हिंदू ब्लॉगर्स से कमाने वाला यह अकेला ‘अल्लाह का आशिक़‘ है।
बड़े ब्लॉगर्स का एक रंग यह भी है। ये सदियों से चली आ रहे शब्दों के अर्थ बदल कर रख देते हैं।

Sunday, March 10, 2013

औरतें अपने जैसी औरतों को अपना हमदर्द क्यों न बना सकीं ?

ब्लॉगिस्तान में बड़ी बड़ी बातें करने वालों की भीड़ है। बात हमेशा बड़ी ही करनी चाहिए। बड़ी बात करने का फ़ायदा यह है कि उसे कभी पूरा करना नहीं पड़ता और पूरा करो तो वह पूरी भी नहीं होती।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भी यही देखने में आया। किसी ने उम्मीद जताई और किसी ने अफ़सोस जता दिया। गुन्डे बदमाश उनकी बात पढ़ते नहीं और पढ़ने वाले मानते नहीं। औरतों को गुन्डों से ज़्यादा उसके अपने घर वाले सताते हैं। औरत को मर्दों से ज़्यादा औरतें सताती हैं। घर में और समाज में औरतें मर्दों से ज़्यादा औरतों के साथ रहती हैं। औरतें अपने जैसी औरतों को अपना हमदर्द न बना सकीं। घरों मे दिल को छीलने वाली बातें औरतें ही करती हैं। दहेज न लाने पर बहू को जली कटी कौन सुनाता है ? 

Friday, March 8, 2013

औरत की तरक्क़ी जारी है...


औरत ने तरक्क़ी की है। औरत आज हरेक मैदान में सरगर्म है। फिर सेहत और सुरक्षा के मामले में उसकी हालत अच्छी नहीं है। पिछले 40 सालों के दौरान औरतों के खि़लाफ़ होने वाले जरायम में 875 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसने औरत की तरक्क़ी की ख़ुशी को मद्धम कर दिया है।
सख्त क़ानून के बाद भी रेप और इसी क़िस्म के दूसरे जरायम कम होने के बजाय लगातार बढ़ रहे हैं। बहुत तरह के रहनुमा हैं और बहुत तरह की बातें हैं। कोई किस तरफ़ जाए ?
यह तय नहीं हो पा रहा है। इसलिए फ़िलहाल तो समाज अंग्रेज़ों के तरीक़े पर जी रहा है। वहां शादी से पहले जिन्सी ताल्लुक़ात आम बात हैं तो यहां भी हो चुके हैं।
औरत के शोषण का एक यह रूप जो नहीं था। यह भी तरक्क़ी के नाम पर चलन में आ चुका है।

अफ़सोस ! इस मैदान में भी औरत की तरक्क़ी जारी है।

Thursday, March 7, 2013

देखते हैं कि प्रवीन जी की तरफ़ से क्या जवाब आता है ?


अच्छे बहस मुबाहिसे ब्लॉगिस्तान में कम देखने में आ रहे हैं। हम भी अपने काम में मशग़ूल हो गए हैं। दीन यही कहता है कि दुनिया की ज़िंदगी इम्तेहान है। दूसरों का भला करना सबसे बड़ी नेकी है। यह हरेक इंसान का फ़र्ज़ है, चाहे वह वर्दी में हो या न हो। इस फ़र्ज़ को अदा करने में जान चली जाए तो यह शहादत कहलाती है। इसलाम में शहादत का दर्जा पाना कामयाबी की बात है। दूसरे धर्मों में भी इसे अच्छा माना जाता है और मरने के बाद की ज़िंदगी में राहत और ऐश मिलना बताया जाता है। इससे फ़र्ज़ की राह में मरना आसान हो जाता है और उसके बाद के रिश्तेदारों के दिलों को भी तसल्ली मिलती है कि हमारा आदमी अच्छे हाल में है।
दहरिये यानि नास्तिक लोग तो यही बताते हैं कि मरने के बाद ऐसी कोई ज़िंदगी नहीं है। लिहाज़ा कोई समझदार तब तक अपना फ़र्ज़ अदा करेगा जब तक कि उसकी ज़िंदगी को ख़तरा न हो। अपने ऊपर ख़तरा पड़ते देखते ही वह भाग खड़ा होगा। साईंस भी इसे नेचुरल बताती है।
वक्ती मसले पर एक गर्मागर्म बहस :
ज़िया उल हक़ सीओ की हत्या के संदर्भ में नास्तिक दार्शनिकों और आम नागरिकों की थ्योरी और प्रैक्टिकल का एक विश्लेषण
by 
  • DR. ANWER JAMAL


  • Monday, March 4, 2013

    पुलिस अधिकारी ज़िया व अन्य सैनिकों को शहीद का खि़ताब और सम्मान दिया जाय


    पुलिस अधिकारी ज़िया उल हक़ को पब्लिक ने उग्र होकर मार डाला या भीड़ को भड़का कर गुण्डा तत्वों ने मार डाला। बहरहाल एक ज़ांबाज़ अफ़सर मारा गया। हर साल ऐसे बहुत से अधिकारी और सिपाही अपनी ड्यूटी के दौरान मारे जाते हैं।
    इन्हें सैनिकों की तरह शहीद का खि़ताब और सम्मान नहीं दिया जाता।
    क्यों नहीं दिया जाता ?
    इस पर सोचना चाहिए।
    इस बात की व्यवस्था भी करनी चाहिए कि उनकी मौत के बाद उनके परिवार के लोगों का जीवन उसी स्तर पर चलता रहे जैसे कि उसकी मौजूदगी में चल रहा था।
    ऐसा नहीं किया जाता तो उनके काम करने के अंदाज़ पर उल्टा असर पड़ सकता है।
    गुण्डों को पकड़कर सख्त सज़ा देकर उनका मनोबल तोड़ना भी ज़रूरी है।
    हमें हिफ़ाज़त देने वालों की हिफ़ाज़त ख़तरे में नहीं रहनी चाहिए।

    Friday, March 1, 2013

    ईश्वर की आलोचना कौन करता है ?

    माल मन की मुराद है और उसे पाने के लिये कोई खुदा से दुआ मांग रहा है और कोई देवी देवता से प्रार्थना कर रहा है. धर्म पर चल कर अपनी आज़ादी कोई नहीं खोना चाहता. सच क्या है ?
    सब जानते हैं. उसे मानें तो दुख पाएँ.
    सच के लिये कष्ट कौन झेले ?
    ऐसे लोग अपनी मर्ज़ी से किसी आदमी को ईश्वर मान लेते हैं या ईश्वर को आदमी मान लेते हैं या कोई जानवर या पेड़ पत्थर या कोई और चीज़ मान लेते हैं. उनके बारे में ख़याली कहानियाँ लिख लेते हैं और फिर उनकी आलोचना करते रहते हैं. 
    उसने यूं क्यों किया ?
    उसने यूं क्यों न किया ?
    इस बातचीत का नाम वे धर्म और अध्यात्म रख लेते हैं. इसमें माल, मज़ा और आज़ादी सब है.
    इसमें अहंकार का मौक़ा भी मिल जाता है कि देखो हम इतने बढिया हैं कि हम ईश्वर की आलोचना भी कर सकते हैं ? 
    ईश्वर और धर्म को मानकर ये अहंकार न कर पाते . 
    रूहानियत के नाम धंधेबाज़ी और पाखंड फैला हुआ है।
    यही पाखंडी आज देश की आम जनता को भ्रमित कर रहे हैं।
    मालिक को राज़ी करने की लगन सच्ची हो और साधक अपनी अक्ल खुली रखे तो ही आदमी इस तरह के भ्रम से बच सकता है।

    Thursday, February 28, 2013

    मदरसे और मस्जिद के लिए चंदे इकठ्ठा करने के नाम पर ठगी का धंधा


    हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मस्जिद बिल्कुल सादा थी। शुरू में उसमें सिर पर छत और पांव के नीचे चटाई भी न थी। वह मस्जिद बिल्कुल क़ुदरती माहौल में थी। नमाज़ पढ़ने वालों पर सूरज की रौशनी हर तरफ़ से पड़ती थी, उन्हें ताज़ा हवा मिलती थी। उनके पांव ज़मीन से टच होते थे और उनके सिर पर खुला आसमान होता था। क़ुदरती माहौल सुकून देता है और बहुत सी बीमारियों से बचाता है। नए तर्ज़ की मस्जिदें बनाने की होड़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मस्जिद की तर्ज़ को भुला दिया गया है।
    मस्जिदों को सादा रखा जाता तो उनके नाम पर धंधा और ठगी करने वाले पनपते ही नहीं। ऐसे भी मदरसे हैं। जिनकी तरफ़ से चंदा वसूल करने वाला कोई जाता ही नहीं है। जिसे भी देना होता है। वह ख़ुद ही मनी ऑर्डर कर देता है या किसी के हाथ भेज देता है। कुछ मदरसों ने ऐसे लोगों की तनख्वाह मुक़र्रर कर रखी है। यह ठीक है। उनके घर का ख़र्च भी चलना चाहिए।
    कमीशनख़ोरी और ठगी इससे बिल्कुल अलग चीज़ है। चंदा वुसूल करने वाले ये लोग भी दाढ़ी, टोपी और शरई लिबास में होते हैं। इनके वेश-भूषा को देखकर धोखा न खाएं और अपनी रक़म चंदे में देने से पहले यह ज़रूर देख लें कि आप अपनी रक़म किसी ठग या कमीशनख़ोर को तो नहीं दे रहे हैं ?

    Saturday, February 23, 2013

    आतंकवाद का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा ?

    किसी आदमी की हत्या के बाद पुलिस इस बात पर भी विचार करती है कि इस आदमी की हत्या रंजिशन की गयी है या फिर किसी लाभ के लिये की गयी है ?
    आतंकवाद का मक़सद राजनीतिक लाभ उठाना होता है. इसलिये आतंकवादी घटनाओं के बाद यह भी देखा जाना चाहिये कि इस आतंकवादी घटना का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा ?
    बम धमाकों का मक़सद लोगों को मारना नहीं होता. बम धमाकों से ज़्यादा लोग तो शराब पीकर मर जाते हैं या ब्याजखोर महाजन के डर से आत्महत्या कर लेते हैं.
    ये आतंकवादी दरअसल अमन के दुश्मन हैं। इनके कुछ आक़ा हैं, जिनके कुछ मक़सद हैं। ये लोकल भी हो सकते हैं और विदेशी भी। जो कोई भी हो लेकिन इनके केवल राजनीतिक उद्देश्य हैं। ये लोग चाहते हैं कि भारत के समुदाय एक दूसरे को शक की नज़र से देखें और एक दूसरे को इल्ज़ाम दें। कुछ तत्व नहीं चाहते कि जनता अपनी ग़रीबी और बर्बादी के असल गुनाहगारों को कभी जान पाए। जनता का ध्यान बंटाने और उन्हें बांटकर आपस में लड़ाने की साज़िश है यह किसी की। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं, उन तक पहुंचना भी मुश्किल है और उन्हें खोद निकालना भी। कुछ जड़ों से तो लोग श्रृद्धा और समर्पण के रिश्ते से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में कोई क्या कार्रवाई करेगा ?
    इस बार भी बस ग़रीब ही पिसेगा !
    उसी का ख़ून पानी है वही बहेगा !!
    और इसी मुद्दे पर एक नज़र डा०  अनवर जमाल का यह मज़मून भी देखें -
    Hindi Bloggers Forum International (HBFI): आतंकवाद के ख़ात्मे का एकमात्र उपाय Aatankwad Free India

    Sunday, February 10, 2013

    लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है



    लहसुन के सेवन से रक्त में थक्का बनने की प्रवृत्ति बेहद कम हो जाती है, जिससे हृदयाघात का ख़तरा टलता है। यह बिंबागुओं (Platelates) को चिपकने से रोकता है। थक्कों को गलाता है। धमनियों को फैलाकर रक्तचाप घटाता है। हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए यह अमृत के समान है। नियमित लहसुन को दूध में उबालकर लेते रहने से ब्लडप्रेशर कम या ज़्यादा होने की बीमारी नहीं होती।
    • कॉलेस्ट्रोल की समस्या से पीड़ित लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि लगातार चार हफ्ते तक लहसुन खाने से कॉलेस्ट्रोल का स्तर 12 प्रतिशत तक या उससे भी कम हो सकता है। जिगर के अंदर मेटाबोलिज्म में सुधार लाकर कोलेस्ट्रॉल कम करता है और एरिथमिया को नियमित करता है। 'जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन' के एक अध्ययन के मुताबिक लहसुन के सेवन से कोलेस्ट्रॉल में 10 फीसदी गिरावट आती है। यदि रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है।
    • लहसुन की तीक्ष्णता और रोगाणुनाशक विशेषता के कारण यह चिकित्सा जगत में उपयोगी कंद है। मेहनतकश किसान-मजदूर तो लहसुन की चटनी, रोटी खाकर स्वस्थ और कर्मठ बने रहते हैं। षडरस भोजन के 6 रसों में से पाँच रस लहसुन में सदैव विद्यमान रहते हैं। सिर्फ 'अम्ल रस' नहीं रहता। आज षडरस आहार दुर्लभ हो चला है। लहसुन उसकी आपूर्ति के लिए हर कहीं सस्ता, सुलभ है। लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है। वह इसलिए कि इसका लगातार प्रयोग मानव जीवन को स्वास्थ्य संवर्धक स्थितियों में रखता है। हेल्थ एक्सपर्ट हर रोज सुबह-उठकर ख़ाली पेट लहसुन की दो-तीन कलियां गुनगुने पानी से लेने की बात कहते हैं।
    • तेज गंध वाली लहसुन एक संजीवनी है जो कैंसर, एड्स और हृदय रोग के विरुद्ध सुरक्षा कवच बन सकती है। त्वचा को दाग़-धब्बे रहित बनाने, मुंहासों से बचने और पेट को साफ़ करने में भी लहसुन बढिय़ा है। इसे बादी कम करने वाला माना जाता है, इसीलिए बैंगन या उड़द की दाल जैसी बादी करने वाली चीजों में इसे डालने की सलाह दी जाती है। यह खून को साफ़ कर शरीर के अंदरूनी सिस्टम की सफाई करता है। अगर आपका वजन अधिक है और इसे कम करना चाहते हैं तो सुबह-शाम लहसुन की दो-दो कलियां खाएं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करने, कैंसर, अल्सर और हैमरॉयड से लडऩे में लहसुन को फ़ायदेमंद बताया गया है। इसमें मौजूद सल्फर से एलर्जी महसूस करने वाले इसे न ही खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।

    • लहसुन का पौधा
      हर घर में खाया जाने वाले लहसुन भी ऐसी ही एक गुणकारी दवा है। 'लशति छिंनति रोगान लशुनम्' अर्थात् जो रोग का ध्वंस करे उसे लहसुन (Garlic) कहते हैं। इसे रगोन् भी कहते हैं। लहसुन गुणों से भरपूर भारतीय सब्जियों का स्वाद बढ़ाने वाला ऐसा पदार्थ है जो प्रायः हर घर में इस्तेमाल किया जाता है। ज़्यादातर लोग इसे सिर्फ मसाले के साथ भोजन में ही इस्तेमाल करते हैं। परंतु यह औषधि के रूप में भी उतना ही फ़ायदेमंद है। लहसुन से होने वाले लाभ और इसके चिकित्सीय गुण सदियों पुराने हैं। शोध और अध्ययन बताते हैं कि आज से 5000 वर्ष पहले भी भारत में लहसुन का इस्तेमाल उपचार के लिए किया जाता था। 

    पूरी इल्मी जानकारी भारत डिस्कवरी पे -


    http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B2%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8

    Wednesday, February 6, 2013

    Blog News: 'औरत की हक़ीक़त' ब्लॉग पर एक नई कहानी "औरत का क़ानूनी जलवा"

    Sabhar: Blog News: 'औरत की हक़ीक़त' ब्लॉग पर एक नई कहानी "औरत का क़ानूनी जलवा"

    औरत का क़ानूनी जलवा

    नए क़ानून के असर की एक सत्यकथा जो भविष्य में घटित होगी।

    चपरासी के अलावा ऑफ़िस के सभी लोग जा चुके थे। सीईओ अपने रूम में जुटे हुए थे। हालाँकि उनकी उम्र काफ़ी हो चुकी थी फिर भी बस एक जोश था, जो उन्हें अब भी नौजवानों की तरह जुटे रहने के लिए मजबूर करता था लेकिन जवानी बीत जाए तो सिर्फ़ जोश से ही काम नहीं चलता। सीईओ साहब जल्दी ही निपट गए। 
    उनकी सेक्रेटरी को भी जो कुछ ठीक करना था, हमेशा की तरह ठीक कर लिया। सीईओ साहब ने अपनी सेक्रेटरी के चेहरे पर नज़र डाली। वहां कोई शिकायत न थी। वह मुतमईन हो गए और अपना ब्रीफ़ेकेस उठाकर चलने ही वाले थे कि सेक्रेटरी ने आज का न्यूज़ पेपर उनके सामने रख दिया, जिसमें यौन हमले और शोषण का अध्यादेश लागू होने की ख़बर थी।
    सेक्रेटरी मुस्कुराते हए बोली -‘आप क्या चुनना पसंद करेंगे, 20 साल की क़ैद या ...?‘
    ‘क...क...क्या मतलब ?‘- सीईओ साहब हकला भी गए और बौखला भी गए।
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    पूरी कहानी के लिए लिंक पर जाएँ -

    Monday, February 4, 2013

    इसलाम धर्म: स्वर्गिक शांति का ख़ज़ाना है नमाज़ How to perfect your prayers (video)

    इसलाम धर्म: स्वर्गिक शांति का ख़ज़ाना है नमाज़ How to perfect your prayers (video)
    नशा और ब्याज हराम और वर्जित है, यह बात केवल और केवल क़ुरआन ही बताता है।
    विधवा को दोबारा विवाह करने का और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है, यह बात केवल और केवल क़ुरआन ही बताता है।
    क़ुरआन ऐसी बहुत सी बातें बताता है, जिनसे अन्याय और अत्याचार का ख़ात्मा होता है और जिन्हें जानना और मानना हरेक इंसान के लिए लज़िम है। इसीलिए हरेक इंसान को नमाज़ के लिए बुलाया जाता है ताकि हरेक इंसान क़ुरआन सुने और उसे जाने।
    नमाज़ कम जानने वालों को ज़्यादा जानने वालों के साथ एक जगह इकठ्ठा कर देती है। इससे लोगों का ज्ञान बढ़ता है और यह बात अकेले प्रार्थना करने से हरगिज़ हासिल नहीं हो सकता।
    नमाज़ ईश्वर का साक्षात्कार भी तुरंत कराती है।
    ईश्वर वह है जो आदमी की नज़र और उसकी अक्ल की पहुंच से बहुत परे है।
    नमाज़ यही अहसास कराती है।

    आप नमाज़ अदा करके देखिए,
    इसके फ़ायदे और इसके प्रभाव को आप ख़ुद ही जान जाएंगे।

    Saturday, January 26, 2013

    जानिये कि राष्ट्र गान का अर्थ क्या है ?

    जलियाँवाला बाग के नर संहार के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सम्मान में मिली अपनी ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी ! अपने देश की महिमा में उन्होंने बेमिसाल गीतों की रचना की है ! उनकी रचनाधर्मिता तथा उनके मंतव्यों को तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत करना और भ्रामक प्रचार करना किसी भी तरह से उचित नहीं है !
    जानिये कि राष्ट्र गान का अर्थ क्या है ?


  • आज 26 जनवरी है। हम सबके लिए एक मुबारक दिन है। इस मंच की तरफ से सबको मुबारकबाद। 

    आज़ादी क़ुरबानी देकर मिली है और इसे बाक़ी रखने के लिए भी लगातार क़ुरबानी  दी जा रही है। देश पर बाहर और अन्दर हर तरफ से हमले हो रहे हैं। कहीं ज़रा से मतभेद को बढ़ाकर नाली से खाई बनाई बनायी जा रही है और जहां कोई मतभेद नहीं है, वहाँ मतभेद पैदा किये जा रहे हैं जबकि आज इस सब भेड़ों और मतभेदों को पहले कम और फिर ख़तम करने की ज़रूरत है।

    Monday, January 7, 2013

    रूहानियत के नाम पर धंधेबाज़ी और पाखंड

    आज भारत में हज़ारों ऐसे गुरू हैं जो अपने ईश्वर और ईश्वर का अंश होने का दावा करते हैं और भारत क़र्ज़ में दबा हुआ भी है और क्राइम का ग्राफ़ भी लगातार बढ़ता जा रहा है। अगर उनसे कहा जाए कि आप इतने सारे लोग साक्षात ईश्वर हैं तो भारत का क़र्ज़ ही उतार दीजिए या जुर्म का ख़ात्मा ही कर दीजिए।
    तब वे ऐसा न कर पाएंगे।
    वे सब मिलकर किसी एक मरी हुई मक्खी तक को ज़िंदा नहीं कर सकते।
    इसके बावजूद न तो वे अपने दावे से बाज़ आते हैं और न ही उनके मानने वाले कभी यह सोचते हैं कि दवा खाने वाला यह आदमी ईश्वर-अल्लाह कैसे हो सकता है ?
    रूहानियत के नाम धंधेबाज़ी और पाखंड फैला हुआ है।
    यही पाखंडी आज साधकों को भ्रमित कर रहे हैं।
    मालिक को राज़ी करने की लगन सच्ची हो और साधक अपनी अक्ल खुली रखे तो ही वह इस तरह के भ्रम से बच सकता है।


    http://sufidarwesh.blogspot.in/2012/05/ruhani-haqiqat.html#comment-form

    Thursday, January 3, 2013

    Mushayera: आप उसे आवारा या बदचलन मत कह देना Modern Girl

    Mushayera: आप उसे आवारा या बदचलन मत कह देना Modern Girl

    एक तन्ज़ एक हक़ीक़त

    किसी लड़की को आप रात गए किसी पब से या सिनेमा हॉल से निकलते देखें
    या दिन दहाड़े किसी पार्क या खंडहर में किसी के साथ घुसते देखें तो
    आप उसे आवारा या बदचलन मत कह देना
    क्योंकि वह पढ़ी-लिखी है, समझदार है, जवान है, बालिग़ है
    और तरक्क़ी कर रही है
    वह ख़ुद को कितना भी सजाए,
    अपना कुछ भी दिखाए,
    चाहे ज़माने भर को रिझाए
    चाहे उसकी आबरू ही क्यों न लुट जाए
    आप उसे कभी ग़लत न कहना
    दोष सिर्फ़ लड़कों को, समाज को, पुलिस और नेताओं को देना
    ऐसा करके आप इज़्ज़त पाएंगे
    समाज का चलन उल्टा है
    सच से इसे बैर है।
    आप सच कहेंगे तो ज़माना आपका दुश्मन हो जाएगा
    जड़ों को पानी देकर यह शाख़ें कतरता है

    लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

     जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...