Monday, July 9, 2012

मुक़ददमेबाज़ी से अच्छी मुसीबत क्या हो सकती है ?

आपकी ब्लॉगिंग में आपकी शख्सियत झलकती है
तंज़ करने वाले भी तंज़ सहने की ताक़त नहीं रखते. पढ़े लिखे लोगों की मजलिस में बुरी बातें देखकर एक लंबे अर्से तक ब्लॉग पर कुछ लिखने का जज़्बा ही सर्द पड़ गया. 
ब्लॉगिंग को जुड़ने का ज़रिया बनाया जाए तो अच्छा रहेगा. अपनी बात कहिए और दूसरे की सुनिए. धौंस धमकी और अपमान की भाषा बोलने से बचिए. इसके लिए अपने दिल को धोइये. जब तक नफ़रतें दिल में रहेंगी ज़ुबान से आप मुहब्बत के फूल खिला ही नहीं सकते.
अपने घमंड की ख़ातिर कभी औरत मर्द का मुददा यहां बना दिया जाता है और कभी उसे हिन्दू मुस्लिम का मुददा बना दिया जाता है. यह बुरी बात है. 
ब्लॉगिंग क्या है ?
अपने ख़यालात ज़ाहिर करने का एक तरीक़ा है.
जो लोग ब्लॉगिंग नहीं करते, वे भी अपने ख़यालात ज़ाहिर करते ही हैं. कोई पान की दुकान पे तो तो कोई यूं ही बिना किसी दुकान के. औरतें भी अपना ख़याल ज़ाहिर करती हैं और मर्दों से ज़्यादा करती हैं.
हरेक का ख़याल है कि वह सबसे ज़्यादा अक्लमंद है और दूसरे उसकी बात मान लें तो उनका बेड़ा पार हो जाएगा. ऐसा सोचने में कोई हरज भी नहीं है. अपना दिल है जो चाहे सोचो. दिक्कत तब आती है जब ख़यालात आपस में टकरा जाएं. ख़याल आपस में टकरा जाते हैं तो दरहक़ीक़त दिल आपस में टकराते हैं. इसका दिल टूटे या उसका या दोनों का. टकराव होगा तो टूट फूट ज़रूर होगी. 
टकराव क़ानूनी शक्ल ले ले तो दिक्क़त और ज़्यादा बढ़ जाती है। एक तरफ़ से केस होगा तो दूसरा भी मरता क्या न करता, वह भी पलटकर करेगा ही. हज़ार किलोमीटर चलकर वह आपके शहर आएगा तो हज़ार किलोमीटर दूर अपने शहर में वह आपको भी बुलाएगा. काटते रहिए चक्कर। कई साल बाद लोअर कोर्ट से फ़ैसला होगा, फिर उसके बाद ऊपर और ऊपर अपील होती रहती है। मर्डर करने वालों के केस में, जिनमें सज़ाएं भी सुना दी गईं, वे सज़ाएं भी आखि़रकार माफ़ हो गईं। पीड़ित पक्ष की सारी पैरवी रखी रह गई। जिसके पास ज़मीन जायदाद हो वह तो मुक़ददमे की पैरवी झेल सकता है लेकिन नौकरीपेशा ब्लॉगर अपनी नौकरी करेगा, अपने बच्चे पालेगा या मुक़ददमों की तारीख़ पर हाज़िरी देगा ?
औरत कहीं जाएगी तो पति पहले पूछेगा कि कहां जा रही हो ?
औरत क्या बताएगी अपने पति को कि मुक़ददमा करने जा रही हूं ?
पति पूछेगा कि किस बात के लिए मुक़ददमा करने जा रही हो ?
पहले पति को उस पोस्ट का प्रिंट आउट निकाल कर दो. पहले वह उसे पढ़ेगा. पोस्ट अच्छी लगी तो वह उसकी दाद भी देगा. पति अच्छा हुआ तो साथ चलने के लिए मान भी जाएगा। उसके बाद सास ननदें भी पूछेंगी कि   कहां जा रही हो ?
बाल-बच्चे भी पूछेंगे कि मम्मी हमें छोड़कर आप कहां जा रही हो ?
तारीख़ें पड़ते हुए जब दो चार साल हो जाएंगे तो फिर मुहल्लेवाले भी पूछेंगे कि भाभी जी मुक़ददमा अभी तक लटका ही पड़ा है या कुछ फ़ाइनल हुआ ?
समाज भी ग़ैर ज़िम्मेदार है. एक बात में चार अपनी तरफ़ से जोड़कर सारे मुहल्ले और सारी रिश्तेदारी में फैला देंगे. उनके भी अपने ख़याल है. वे बिना ब्लॉगिंग के इधर उधर ही अपनी पोस्ट रिलीज़ कर देते हैं.
दूसरे को सज़ा तो जब होगी तब होगी, पहले अपनी इज़्ज़त का जनाज़ा ज़रूर निकल जाएगा.
किराए वैसे ही आसमान छू रहे हैं। कुछ लोगों को बैठे बिठाए नई नई मसीबतें मोल लेने का शौक़ भी होता है। मुक़ददमेबाज़ी से अच्छी मुसीबत क्या हो सकती है ?

3 comments:

रविकर फैजाबादी said...

यह है बुधवार की खबर ।

उत्कृष्ट प्रस्तुति चर्चा मंच पर ।।



आइये-

सादर ।।

DR. ANWER JAMAL said...

ख़याल आपस में टकरा जाते हैं तो दरहक़ीक़त दिल आपस में टकराते हैं. इसका दिल टूटे या उसका या दोनों का. टकराव होगा तो टूट फूट ज़रूर होगी.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

देते हैं सन्ताप को, नीच घरों के लोग।
इसीलिए तो मुकदमें, लोग रहे हैं भोग।।

लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

 जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...