Saturday, July 28, 2012

लोग "दूसरों" की विकृतियों के माहिर हो चले हैं

विकृति को समझना मुनाफ़े का सौदा है। कविता और लेख लिखो तो कोई टिप्पणी नहीं देता मगर किसी की विकृति को पहचान लो लोग अपनी राय देने आ जाते हैं मगर शर्त यह है कि विकृति ‘दूसरों‘ में से किसी की होनी चाहिए।
अपना कोई हो तो उसे संविधान और झंडे की तौहीन करने की भी पूरी छूट है। कोई नंगेपन और समलैंगिकता का हामी हो तो हो। उसकी सोच विकृति नहीं मानी जाएगी क्योंकि वह अपने गुट का है। अपनी विकृति पर चर्चा न करना और दूसरों की विकृतियों पर तब्सरा करना भी एक विकृति है। इसे कौन समझ पाएगा ?
दूसरा सुनेगा नहीं और अपनी विकृति लोग दूर करेंगे नहीं तो सुधार कैसे होगा ?

1 comment:

DR. ANWER JAMAL said...

1. तौबा गुनाहों को खा जाती है।
2. ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) नेक आमाल को खा जाती है।
3. ग़म उम्र को खा जाता है।
4. सदक़ा (दान) बलाओं को खा जाता है।
5. पशेमानी सख़ावत को खा जाती है।
6. नेकी बदी को खा जाती है।
7. झूठ रिज़क़ को खा जाता है।
8. ग़ुस्सा अक्ल को खा जाता है।
9. तकब्बुर (घमंड) इल्म को खा जाता है।
10. अद्ल (न्याय) ज़ुल्म को खा जाता है।

इन नसीहतों पर अमल किया जाए तो ख़याल और ज़ुबान क़ाबू में रहेंगे।

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