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Showing posts from July, 2012

अपनी हैसियत बढ़ाने की ख्वाहिश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की आदत

बारिश हो रही है। आम की फ़सल चल रही है। रमज़ान का महीना है। सहरी और इफ़तार सब हो रहा है। ज़कात-फ़ितरे का हिसाब लगा लिया गया है। ये सब ख़ुशियां हैं। ईद भी आएगी। यह भी ख़ुशी होगी लेकिन कभी कभी सोचता हूं कि जो अमन और जो ख़ुशियां हमें नसीब हैं वे हरेक को नसीब क्यों नहीं होतीं।
कहीं दंगा है तो कहीं आतंक। कहीं ग़रीबी और भूख है तो कहीं बेरोज़गारी और बंजर ज़मीनें। कहीं अशिक्षा है तो कहीं दहेज। कहीं सरकार की लापरवाही है तो कहीं ख़ुद अपनी कमज़ोरी।
हमारा अपना लालच और अपनी लापरवाही हमें एक ख़ुशहाल क़ौम बनने से रोके हुए है। गर्व करने के लिए कोई वजह ज़रूरी नहीं है। लोग फिर भी गर्व कर लेते हैं।
भारत भ्रष्टाचार में जकड़ा हुआ है और भ्रष्टाचार से लड़ने वाली टीम अन्ना को देश की जनता तन्हा छोड़ चुकी है। लोकपाल तो जैसे तैसे अब बन कर ही रहेगा मगर क्या मुल्क की अवाम को अपने आप को बदलने का अहसास हो पाएगा ?
अहम मुददे भी यहां अपने अहं की भेंट चढ़ा दिए जाते हैं।
ब्लॉग जगत में भी मुददे को नहीं नाम और हैसियत को समर्थन दिया जाता है। नाम और पद ठीक ठाक हो तो मर्दाना बीमारी की पोस्ट पर भी हाज़िरी लगा दी जाती है। ब्लॉगर विदेश में रहता हो…

कवि व्यभिचारी चोर -सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार

एक दिन एक कवि ने शिकायत की कि आप हिंदी के लेखकों को ही क्यों ठोकते हैं? अन्य भाषाओं वाले पढ़ते होंगे, तो क्या सोचते होंगे?’
‘न ठोकता, तो तुम क्या यह सवाल करते? इस पर भी न हंसूं, तो क्या करूं? मैं तो हर बार अपने ऊपर ही हंसता हूं।’
‘जो हास्यास्पद हैं, उन पर हंसें। बाकी पर क्यों? इतने बड़े और महान लेखक हैं और आप उनकी महानता में सुई चुभाते रहते हैं!’
‘हमारे उत्तर-आधुनिक शब्दकोश में ‘महान’ शब्द ‘संदिग्ध’ है। महानता अनेक तुच्छताओं से गढ़ी जाती है। और साथी हिंदी में ऐसा कौन है, जो हास्यास्पद नहीं है? ..........
आगे बढ़ें-  कवि व्यभिचारी चोर -सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार

लोग "दूसरों" की विकृतियों के माहिर हो चले हैं

विकृति को समझना मुनाफ़े का सौदा है। कविता और लेख लिखो तो कोई टिप्पणी नहीं देता मगर किसी की विकृति को पहचान लो लोग अपनी राय देने आ जाते हैं मगर शर्त यह है कि विकृति ‘दूसरों‘ में से किसी की होनी चाहिए।
अपना कोई हो तो उसे संविधान और झंडे की तौहीन करने की भी पूरी छूट है। कोई नंगेपन और समलैंगिकता का हामी हो तो हो। उसकी सोच विकृति नहीं मानी जाएगी क्योंकि वह अपने गुट का है। अपनी विकृति पर चर्चा न करना और दूसरों की विकृतियों पर तब्सरा करना भी एक विकृति है। इसे कौन समझ पाएगा ?
दूसरा सुनेगा नहीं और अपनी विकृति लोग दूर करेंगे नहीं तो सुधार कैसे होगा ?

खुदा की इबादत का महीना है रमज़ान, इन बातों का रखें ध्यान

हिजरी कैलेंडर का नवां महीना रमज़ान होता है। पूरी दुनिया में फैले इस्लाम के अनुयायियों के लिए रमज़ान का पवित्र महीना एक उत्सव होता है। इस्लाम धर्म की परंपराओं में रमज़ान में रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरुरी फर्ज होता है, उसी तरह जैसे 5 बार की नमाज अदा करना जरुरी है। इस बार रमज़ान के पाक महीने की शुरुआत 21 जुलाई, शनिवार (यदि 20 जुलाई को चांद नहीं दिखा तो रमज़ान 22 से शुरु होगा) से हो रही है।




इस्लाम धर्म में रमज़ान के महीने में रोजा गहरी आस्था के साथ रखे जाते हैं। किंतु इस्लाम धर्म का रोजा सिर्फ भूखे या प्यासे रहने की परंपरा मात्र नहीं है बल्कि रोजे के दौरान कुछ मानसिक और व्यावहारिक बंधन भी जरुरी बताए गए हैं। जानते हैं रोजे के दौरान पालन किए जाने वाले नियमों को -

1- रोजे के दौरान सिर्फ  भूखे-प्यासे ही न रहें बल्कि आंख, कान और जीभ का भी गलत इस्तेमाल न करें यानी न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही बुरा कहें।

- हर मुसलमान के लिए जरुरी है कि वह रोजे के दौरान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बीच के समय में खान-पान न करे। यहां तक कि कुछ गलत सोचे भी नहीं। 

- रोजे की सबसे अहम परंपराओं में सेहरी बहुत लो…

रोज़ा के आध्यात्मिक लाभ

आध्यात्मिक लाभः  (1) इस्लाम में रोजा का मूल उद्देश्य ईश्वरीय आज्ञापालन और ईश-भय है, इसके द्वारा एक व्यक्ति को इस योग्य बनाया जाता है कि उसका समस्त जीवन अल्लाह की इच्छानुसार व्यतीत हो। एक व्यक्ति सख्त भूक और प्यास की स्थिति में होता है, खाने पीने की प्रत्येक वस्तुयें उसके समक्ष होती हैं, एकांत में कुछ खा पी लेना अत्यंत सम्भव होता है, पर वह नहीं खाता पीता। क्यों ? इस लिए कि उसे अल्लाह की निगरानी पर दृढ़ विश्वास है। वह जानता है कि लोग तो नहीं देख रहे हैं पर अल्लाह तो देख रहा है। इस प्रकार एक महीने में वह यह शिक्षा ग्रहण करता है कि सदैव ईश्वरीय आदेश का पालन करेगा और कदापि उसकी अवज्ञा न करेगा। (2) रोज़ा ईश्वरीय उपकारों को याद दिलाता औऱ अल्लाह कि कृतज्ञता सिखाता है क्योंकि एक व्यक्ति जब निर्धारित समय तक खान-पान तथा पत्नी के साथ सम्बन्ध से रोक दिया जाता है जो उसकी सब से बड़ी इच्छा होती है फिर वही कुछ समय बाद मिलता है तो उसे पा कर वह अल्लाह ती प्रशंसा बजा लाता है। (3) रोज़ा से कामवासना में भी कमी आती है। क्योंकि जब पेट भर जाता है तो कामवासना जाग उठता है परन्तु जब पेट खाली रहता है …

[प्यारी माँ] एक आवाज़ बीमार भ्रूण हत्या के खि़लाफ़

ईमेल से प्राप्त :-
प्यारी बेटी अनम की याद में, जो जन्नत का फूल बन गई है. अनम ने हमें बताया है कि हर साल न जाने कितने करोड़ ऐसे अनाम मासूम होते हैं, जिनके क़त्ल में हमारी ख़ामोश हिस्सेदारी है, जिन्हें हमने कभी देखा नहीं बल्कि जिन्हें हम जानते तक नहीं हैं।
अनम हमारे दिलों में आज भी मौजूद है। हम भी उसकी मौजूदगी को बनाए रखना चाहते हैं। अनम की याद के बहाने हम उस जैसे करोड़ों मासूमों को याद कर पाते हैं। हो सकता है कि कभी लोगों में समझदारी जागे और वे इनके हक़ में भी कभी आवाज़ बुलंद करें।
बीमार भ्रूणों की रक्षा के लिए आप यह पोस्ट देखें और इस आवाज़ को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करें- http://pyarimaan.blogspot.in/2012/07/blog-post_22.html
यह एक सामाजिक मुददा है। यह तवज्जो चाहता है। विकलांग या बीमार होना कोई जुर्म नहीं है। उनके लिए भी हमारे दिलों में और हमारी दुनिया में जगह होनी चाहिए।

इसलाम के आर्थिक मॉडल की कामयाबी की वजह क्या है ?

इसलाम में आर्थिक व्यवस्था के मार्गदर्शक सिद्धांत Islamic Economics लेखक : डा. सैयद ज़फ़र महमूद info@zakatindia.org अनुवाद: डा. अनवर जमाल
पूरी क़ौम के एक बड़े से केक में से सारे नागरिकों को एक बड़ा टुकड़ा मिलेगा। यह बात तक़सीम के ग़ैर बराबरी वाले सिस्टम की वजह से यक़ीनी नहीं है। (यानि पूरी क़ौम या देश की कुल पैदावार बहुत ज़्यादा होने के बावजूद यह ज़रूरी नहीं है कि सारे ही नागरिकों की आमदनी का स्तर बढ़ गया है) इसके खि़लाफ़ इसलाम के आर्थिक मॉडल की कामयाबी यह है कि यह हरेक नागरिक की बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति को यक़ीनी बनाने की क्षमता रखता है।
http://www.islamdharma.blogspot.in/2012/07/islamic-economics.html

ब्लॉगिंग क्या है ?

अपने ख़यालात ज़ाहिर करने का एक तरीक़ा है. जो लोग ब्लॉगिंग नहीं करते, वे भी अपने ख़यालात ज़ाहिर करते ही हैं. कोई पान की दुकान पे तो तो कोई यूं ही बिना किसी दुकान के. औरतें भी अपना ख़याल ज़ाहिर करती हैं और मर्दों से ज़्यादा करती हैं. हरेक का ख़याल है कि वह सबसे ज़्यादा अक्लमंद है और दूसरे उसकी बात मान लें तो उनका बेड़ा पार हो जाएगा. ऐसा सोचने में कोई हरज भी नहीं है. अपना दिल है जो चाहे सोचो. दिक्कत तब आती है जब ख़यालात आपस में टकरा जाएं. ख़याल आपस में टकरा जाते हैं तो दरहक़ीक़त दिल आपस में टकराते हैं. इसका दिल टूटे या उसका या दोनों का. टकराव होगा तो टूट फूट ज़रूर होगी. आपकी ब्लॉगिंग में आपकी शख्सियत झलकती है
तंज़ करने वाले भी तंज़ सहने की ताक़त नहीं रखते. पढ़े लिखे लोगों की मजलिस में बुरी बातें देखकर एक लंबे अर्से तक ब्लॉग पर कुछ लिखने का जज़्बा ही सर्द पड़ गया था . ब्लॉगिंग को जुड़ने का ज़रिया बनाया जाए तो अच्छा रहेगा. अपनी बात कहिए और दूसरे की सुनिए. धौंस धमकी और अपमान की भाषा बोलने से बचिए. इसके लिए अपने दिल को धोइये. जब तक नफ़रतें दिल में रहेंगी ज़ुबान से आप मुहब्बत के फूल खिला ही नह…

मुक़ददमेबाज़ी से अच्छी मुसीबत क्या हो सकती है ?

आपकी ब्लॉगिंग में आपकी शख्सियत झलकती है
तंज़ करने वाले भी तंज़ सहने की ताक़त नहीं रखते. पढ़े लिखे लोगों की मजलिस में बुरी बातें देखकर एक लंबे अर्से तक ब्लॉग पर कुछ लिखने का जज़्बा ही सर्द पड़ गया.  ब्लॉगिंग को जुड़ने का ज़रिया बनाया जाए तो अच्छा रहेगा. अपनी बात कहिए और दूसरे की सुनिए. धौंस धमकी और अपमान की भाषा बोलने से बचिए. इसके लिए अपने दिल को धोइये. जब तक नफ़रतें दिल में रहेंगी ज़ुबान से आप मुहब्बत के फूल खिला ही नहीं सकते. अपने घमंड की ख़ातिर कभी औरत मर्द का मुददा यहां बना दिया जाता है और कभी उसे हिन्दू मुस्लिम का मुददा बना दिया जाता है. यह बुरी बात है.  ब्लॉगिंग क्या है ? अपने ख़यालात ज़ाहिर करने का एक तरीक़ा है. जो लोग ब्लॉगिंग नहीं करते, वे भी अपने ख़यालात ज़ाहिर करते ही हैं. कोई पान की दुकान पे तो तो कोई यूं ही बिना किसी दुकान के. औरतें भी अपना ख़याल ज़ाहिर करती हैं और मर्दों से ज़्यादा करती हैं. हरेक का ख़याल है कि वह सबसे ज़्यादा अक्लमंद है और दूसरे उसकी बात मान लें तो उनका बेड़ा पार हो जाएगा. ऐसा सोचने में कोई हरज भी नहीं है. अपना दिल है जो चाहे सोचो. दिक्कत तब आती है जब ख…

जानते हैं शादी की सबसे अच्छी बात क्या है ?

पुरानी ब्लागर पुराने लिंक बांट रही है. कल देखा तो 3 पुरानी पोस्ट के लिंक थे. उनमें उसकी फ़ज़ीहत के क़िस्से थे. अक्ल पुरानी हो और उसमें टेंशन भी घुस जाए तो ब्लागर ऐसा कर देता है. किसी ने समझाया होगा तो उसने वे तीनों पोस्ट के लिंक हटा दिए. आज सुबह खोला तो पेज़ एक्ज़िस्ट नहीं था और अब ‘कारण बताओ‘ के शीर्षक पर क्लिक करो तो वहां अब न यह शीर्षक है और न ही वे 3 पुराने लिंक. थोड़ा सा भी ईगो पर चोट लग जाए तो ब्लागर कितना अपसैट हो जाता है ? वह किसी काम का नहीं रह जाता. बस नए पुराने लिंक ही बांटता रहता है. ख़ुद भी बेचैन रहता है और दूसरों में भी चेतावनियां दे कर बेचैनी फैलाता रहता है. ऐसे ही लोगों ने ब्लागिंग का कबाड़ा करके रख दिया है. आज ही अख़बार में भी आया है- फ़ेसबुक बढ़ा रहा है बेचैनी

हिंदी ब्लागिंग का हाल देखो तो यह बेचैनी के साथ परेशानी भी बढ़ा रही है. 
शीशा हमें तो आपको पत्थर कहा गया दोनों के सिलसिले में ये बेहतर कहा गया
ख़ुददारियों की राह पे जो गामज़न रहे उनको हमारे शहर में ख़ुदसर कहा गया
इक मुख्तसर सी झील न जो कर सका उबूर इस दौर में उसी को शनावर कहा गया
उसने किया जो ज़ुल्म तो हुआ न कुछ…

DR. ANWER JAMAL के मज़मून का एक जुज़

हरेक चीज़ का एक मक़सद होता है।
इंसान का भी एक मक़सद है।
हरेक मक़सद हासिल करने के लिए एक रास्ता होता है।
इंसान के लिए भी एक रास्ता है, जिस पर चलकर उसे अपना मक़सद हासिल करना है।
जब इंसान अपना मक़सद ही भूल जाता है तो फिर वह रास्ते को भी भूल जाता है। आज इंसान अपने मक़सद को भूल गया है। इसीलिए वह अपने रास्ते से हट गया है। ...अनन्त जीवन देने वाले परमेश्वर को पाना ही इंसान का सच्चा मक़सद है।
समाज सुधार के लिए इंसान को उसका मक़सद याद दिलाना होगा
सत्य के अंश से मनुष्य के जीवन की अंश मात्र समस्याएं हल होती है जबकि पूर्ण सत्य से मनुष्य की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और आध्यात्मिक सभी समस्याएं हल हो जाती हैं। 
समस्याओं के हल का स्तर ही यह तय करता है कि किस ग्रन्थ में सत्य अंश मात्र है और किस ग्रन्थ में पूर्ण है ?

हिंदी ब्लागर किस पोस्ट को ज़्यादा पढ़ते हैं ?-एक सर्वे जनहित में

एक बार एक कवि ने कहा था कि आपको पोस्ट लिखने की ज़रूरत ही नहीं है। बस वक्ष वक्ष वक्ष और ऐसे ही अल्फ़ाज़ लिख दीजिए। लोग पागलों की तरह उसे ऐसे पढ़ने के लिए टूट पड़ेंगे जैसे उन्होंने कभी वक्ष देखा ही न हो। कुछ शरपसंद ब्लागर ऐसे हैं कि जब उनकी बात नहीं मानी जाती तो वे अपने निजी मुददे को सांप्रदायिकता से जोड़ देते हैं। कहते हैं कि फ़लां ब्लाग पर उस विशेष पार्टी की औरतों के नाम और फ़ोटो हैं और उस ब्लाग की पोस्ट में ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ भी हैं और ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ वाली पोस्ट उस ब्लाग पर सबसे ज़्यादा पसंद की जा रही हैं। भाई पढ़ने वाले भी तुम्हारी पार्टी के ही हैं। इस तरह तो तुम ख़ुद यह बता रहे हो कि हमारे लोग उन पोस्टों पर टूट कर पड़ते हैं जिनमें ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ हों। उसी ब्लाग पर सैकड़ों दूसरी पोस्टें भी हैं जिनमें ये अल्फ़ाज़ नहीं हैं। उन्हें पढ़ा होता तो ‘लाइक‘ के कालम में वे दूसरी पोस्टें आ जातीं जिनमें टेक्नीकल जानकारी या दूसरी बातें बताई गई हैं। ‘लाइक‘ कालम में ऐसी वैसी पोस्टों को लाया कौन ? हिंदी ब्लागर ही लाए हैं और कौन लाया है !!! इसी विशेष ब्लाग पर नहीं हर ब्लाग पर ऐसी पोस्टों के पाठक …

औरतों की मौजूदगी में व्यक्ति बहस से बच नहीं सकता

हम कई बार तय नहीं कर पाते कि  इस पोस्ट पर क्या कमेन्ट दें ?
मेरे साथ यही हुआ जब मैंने 'ब्लॉग  की ख़बरें' देखीं .
औरतों की मौजूदगी में व्यक्ति काम वासना के आकर्षण से बच नहीं सकता. यह महात्मा बुद्ध ने बताया था . यह पोस्ट पढ़कर मुझे लगा कि
औरतों की मौजूदगी में व्यक्ति बहस से बच नहीं सकता. कोई मुझे बताये कि इस पोस्ट पर क्या कमेन्ट दिया जाए ?
धर्म के नाम पर 'सेक्स' का खेल

झंडे का रंग कोई भी हो, डंडा हमारा ही चलेगा.

दोस्त का काम है मिलना . सो वो मिले. हमने कहा कि  अगर झंडे का रंग भगवा हो जाए तो कैसा रहेगा ?
बोले, अच्छा रहेगा.
हमने कहा कि हमारे लिए कोई डरने वाली बात तो नहीं है न ?
बोले, डरने वाली बात उस दिन होगी जब डंडे का साइज़ और उसका रंग डिस्कस किया जाएगा.
हमने कहा तब कोई डर नहीं है.
दोस्त ने हैरत से पूछा, क्यों ?
भाई, आजकल अपने डंडे की बड़ी डिमांड है. झंडे का रंग कोई भी हो. डंडा हमारा ही लिया जाता है. हमारे डंडे में जान है न !
अतः झंडे का रंग कोई भी हो, डंडा हमारा ही चलेगा.

विज्ञान ने खोजा गॉड पार्टिकल

बह्मांड की उत्पत्ति और जीवन के सृजन संबंधी कई प्रश्नों का जवाब देने में सक्षम गॉड पार्टिकल को बुधवार को खोज लिया गया।

स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर स्थित 27 किलोमीटर लंबी एक भूमिगत सुरंग में हिग्स बोसोन पर वर्ष 2009 से दिन-रात शोध कर रही यूरोपीय परमाणु शोध संगठन (सर्न) की दो टीमों (एटलस) और (सीएमएस) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में इससे मिलते-जुलते कण के अस्तित्व की बात स्वीकार की।

सर्न की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हमें अपने आंकड़ों में एक नए कण के पाए जाने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। यह हमारे शोध संयंत्र लार्ज हेड्रोन कोलाइडर के 125 और 126 जीईवी क्षेत्र में स्थित है। यह एक अद्भुत क्षण हैं। हमने अब तक मिले सभी बोसोन कणों में से सबसे भारी बोसोन को खोज निकाला है। सर्न ने इन नए आंकड़ों को सिग्मा 05 श्रेणी में स्थान दिया है, जिसके मायने होतें हैं नए पदार्थ की खोज। सेर्न के महानिदेशक राल्फ ह्यूर ने कहा कि प्रकृति को लेकर हमारी समझ में इजाफा करने की दिशा में हमने एक मील का पत्थर हासिल कर लिया। सेर्न के शोध निदेशक सेर्गियो बर्तालुकी ने हिग्स बोसोन के आस्तित्व की दिशा में प्रबल संकेत मिलन…

Blog News: धर्म के नाम पर 'सेक्स' का खेल

अख्तर खान साहब ने वह पोस्ट ही मिटा डाली है जो उनके सचिव ने भास्कर डोट कॉम से एक अंश उठाकर उनके ब्लॉग  पर पोस्ट बना दी थी. जिन ब्लॉगर्स ने अख्तर साहब के ब्लॉग पर मात्र एक अंश पर आपत्ति प्रकट की , उनमें से किसी ने भास्कर डोट कॉम की पूरी पोस्ट  पर भी कोई आपत्ति प्रकट नहीं की जो कि 8 गुना ज़्यादा है , है न कमाल की बात ? कुछ हिंदी ब्लॉगर्स ऐसी दोहरी सोच लेकर भी बुद्धिवादी कहलाते हैं.
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