Tuesday, April 17, 2012

हलाल रिज़्क़ बच्चों की कामयाबी का ज़ामिन


गोरखपुर। रिज़्क़ से बरकत ग़ायब, घरों का सुकून ग़ारत, हर तरफ़ नाचाक़ी व नाइत्तेफ़ाक़ी, वालिदैन की नाफ़रमानी, लोगों की बदहवासी व परेशानी का सबब यह है कि लोगों ने दुनिया तलबी और पैसों की चाहत में हलाल व हराम का फ़र्क़ ख़त्म कर दिया है। ऐसे नाज़ुक वक्त में दुखतराने इस्लाम (इस्लाम की बेटियों) की ज़िम्मेदारियां कुछ ज़्यादा हो गई हैं। वो अपने मर्दों को हराम की कमाई से रोकें और अपने बच्चों की परवरिश हलाल के रिज़्क़ से करें।
इन ख़यालात का इज़्हार बंगाल से आई आलिमा सिददीक़ा इमाम ने कल रात गोरखनाथ इमाम बाड़े के क़रीब औरतों के एक बड़े इज्तमा को खि़ताब करते हुए किया।

4 comments:

कुमार राधारमण said...

हराम की कमाई हर हाल में रूकनी चाहिए। कोई भी धार्मिक व्यक्ति ऐसी कमाई नहीं चाहेगा। औरों को,ऐसी कमाई करने वालों की बरकत भले दिखती हो,मगर इसके एवज़ में जो भुगतना पड़ता है,उसे सिर्फ वही जानता है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
बहुत सुन्दर!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
बहुत सुन्दर!

DR. ANWER JAMAL said...

Nice post .
लोगों की दिलचस्पी जीवन के ज़्यादा से ज़्यादा साधन जमा कर लेने में है।
इन्हीं साधनों को मांगने के लिए वे ईश्वर से प्रार्थनाएं करते हैं।
यह आम आस्तिकों का दर्जा है।
सूफ़ी वह है जो ख़ुदा को देने की कोशिश करता है।
ख़ुदा बंदे से उसका प्रेम चाहता है बिला शिरकते ग़ैरे।
जब बंदा ख़ुदा को प्यार का यह नज़राना देने की कोशिश करता है तो वह सूफ़ी बन जाता है और दूसरे गुण उसमें अपने आप विकसित हो जाते हैं।
पीर मुर्शिद यही सिखाते हैं।
किताबों में जो बातें भारी लगती हैं, वे उनकी तालीम की बरकत से आसानी से अमल में आ जाती हैं।
ख़ुदा की मुहब्बत का झरना जब बंदे के दिल में बहने लगता है और वह अपने रब की मर्ज़ी में अपनी मर्ज़ी फ़ना कर देता है तो वह दुख और भय से आज़ाद हो जाता है।
कोई दुख न तो उसे हार्ट अटैक कर पाएगा और न ही किसी डर से वह आत्महत्या करेगा।
लौकिक जीवन भी ढंग से वही जी पाता है जो अपने रब से प्यार करता है।
रब से प्यार न हो तो फिर इबादत महज़ एक ऐसा शरीर है जिसमें कि आत्मा ही नहीं है।
प्यार ज़िंदगी है।

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