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Showing posts from April, 2012

ज़िंदगी और मौत के लम्हे, सोचिए सोचिए और गहराई से सोचिए This video just might change your life!

ज़िंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। जाने वाला कोई लौटकर नहीं आता।
आप क्या कर रहे हैं। देख लें।
जो करना चाहिए। वही करें।
अपना वक्त बेकार न गवाएं।

ज़ुल्मो सितम की दर्दीली दास्तान, पैग़म्बर साहब सल्ल. की ज़िंदगी के वाक़यात Hardships of Rasulullah ﷺ *MUST WATCH*

मुख़तलिफ़ हदीसों में ये वाक़यात बयान हुए हैं। उनमें से कुछ यहां दी जा रही हैं। रंग , नस्ल और अलग अलग अक़ीदों में बंटी हुई इंसानियत को एक करने के लिए पैग़म्बर साहब सल्ल. ने क्या तालीम दी ? और उसके लिए क्या क़ुरबानियां दीं ?
यह सब नज़र के सामने रखने की ज़रूरत है।

सतरहवीं सूरा ‘बनी इसराईल‘, जिंदगी में इंसान का क्या फ़र्ज़ है ?

क़ुरआन अल्लाह का कलाम है। इसे पढ़ने के बाद इंसान को पता चलता है कि उसका रब उससे क्या चाहता है ? और यह कि मां बाप का उस पर क्या हक़ है और जिंदगी में उसका क्या फ़र्ज़ है ? हरेक आदमी पर लाज़िम है कि वह तास्सुब और तंगदिली से पाक हो कर एक बार क़ुरआन का मुताला ज़रूर करे ताकि उसे पता चले कि इस दुनिया में उसे किसने पैदा किय है और उसे क्या करना चाहिए ? इस सिलसिले में आज इस ब्लॉग पर क़ुरआन की सतरहवीं सूरा ‘बनी इसराईल‘ को बराय मुताला पेश किया जाता है। उस रब के फ़रमान पर ध्यान दीजिए।
بسم الله الرحمن الرحيم क्या ही महिमावान है वह जो रातों-रात अपने बन्दे (मुहम्मद) को प्रतिष्ठित मस्जिद (काबा) से दूरवर्ती मस्जिद (अक़्सा) तक ले गया, जिसके चतुर्दिक को हमने बरकत दी, ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियाँ दिखाएँ। निस्संदेह वही सब कुछ सुनता, देखता है (1)हमने मूसा को किताब दी थी और उसे इसराईल की सन्तान के लिए मार्गदर्शन बनाया था कि "हमारे सिवा किसी को कार्य-साधक न ठहराना।" (2)ऐ उनकी सन्तान, जिन्हें हमने नूह के साथ (नौका में) सवार किया था! निश्चय ही वह एक कृतज्ञ बन्दा था (3)और हमने किताब में इसराईल की सन्…