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Golok जहां मनुष्य गाय को नहीं खाता, वहां गाय मनुष्य को खाती है - अज्ञेय

ब्लॉगर्स मीट वीकली (28) God in Ved & Quran

में गाय गांधी और गोडसे एक साथ 

गाय के साथ मुसीबत भी मुफ्त में


अमित चौधरी का विचार है कि
उत्तर प्रदेश के चुनावों में 4 बड़ी पार्टियों-बीएसपी, एसपी, बीजेपी और कांग्रेस में सबसे खस्ता हालत बीजेपी की मानी जा रही है। इसके बावजूद बीजेपी सुधरने को तैयार नहीं है और मामला कोर्ट में होने के बावजूद चुनावी घोषणा पत्र में राम मंदिर का जिक्र करने से अपने आपको नहीं रोक सकी। आम तौर पर सभी पार्टियों के घोषणा पत्र में जनता की भलाई का वादा होता है। बीजेपी का चुनावी घोषणा पत्र भी इससे अलग नहीं है लेकिन एक चीज इसमें बड़ी हास्यास्पद लगी। बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनने के बाद (जिसकी संभावना नहीं दिख रही है) गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों (बीपीएल) को मुफ्त में गाय देना चाहती है।

अगर बीजेपी ने बीपीएल परिवारों को इसके लिए चुना है तो इसका मकसद उनकी गरीबी दूर करना ही होगा। इसमें हास्यास्पद बात यह है कि जो परिवार पहले से ही गरीबी रेखा से नीचे हैं यानी अपना पेट बमुश्किल से भर पाते हैं, वे गाय के लिए चारा कहां से जुटाएंगे? उनके पास इतनी जमीन नहीं कि खेती कर सकें, तो गाय के लिए चारा कहां बोएंगे? गांवों में पहले जैसे बाग या ग्राम-सभा की जमीन नहीं रही, जहां जानवरों को चराया जा सके। या फिर बीजेपी गाय देने के बाद चारे का भी कुछ इंतजाम करेगी? दरअसल, बीजेपी के इस वादे को पढ़ते ही मुझे 2 चीजें एक साथ याद आईं। पत्रकार पी. साईनाथ और साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का लिखा हुआ कुछ याद आया। हो सकता है आपने दोनों चीजें पढ़ी हों लेकिन मैं उन्हीं का जिक्र बीजेपी के इस वादे के संदर्भ में करना चाहता हूं।

पी. साईनाथ ने करीब 15 साल पहले देश के सबसे गरीब जिलों पर कुछ रिपोर्ट्स लिखीं थीं, जो पेंग्विन से प्रकाशित एक किताब everybody loves a good drought में हैं। इसका हिंदी अनुवाद तीसरी फसल नाम से आनंद स्वरूप वर्मा ने किया है। इसमें पहली ही रिपोर्ट है 'आए थे नस्ल सुधारने पर...' इसमें उन्होंने उड़ीसा के नवापाड़ा का जिक्र किया है। वहां पर सरकार ने लोगों को मुफ्त में गायें दीं। उनके चारे के लिए पेड़ और उन पेड़ों को उगाने के लिए जमीन का भी इंतजाम किया। इसके साथ सख्त हिदायत दी गई कि उस जमीन पर अनाज नहीं उगाना है, वही पेड़ उगाने हैं। चारा उगाने के लिए भी लोगों को मजदूरी देने की बात कही गई। गायों की नस्ल न खराब हो जाए, इसके लिए उस इलाके के सांड़ों का बधिया कर दिया गया, जबकि उन खरियार सांड़ों की नस्ल अच्छी मानी जाती थी। उस वक्त इस योजना पर 2 करोड़ रुपए खर्च हुए और 2 साल में 8 बछड़े पैदा हुए। दूध में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई और चारे के लिए लगाए गए हजारों पेड़ उग नहीं पाए, क्योंकि वे उस मिट्टी के अनुकूल नहीं थे। काफी वक्त बाद उस इलाके के कुछ लोग कहीं से कुछ खरियार सांड़ ले आए और चाहते थे कि लोगों को इस बारे में शिक्षित करें। पी. साईनाथ लिखते हैं, 'अफसरों को भी शिक्षित करने की कुछ कम जरूरत नहीं, क्योंकि फुदकू टांडी ने बताया कि भुवनेश्वर से अफसर आए थे। उन्होंने समन्विता कार्यक्रम को बंद करने का एलान किया और कहा कि अब हम लोग जा रहे हैं, इस कार्यक्रम को कहीं और लागू करने।'

ज्ञानपीठ से प्रकाशित अज्ञेय की एक किताब है, 'एक बूंद सहसा उछली।' इसमें यूरोप के यात्रा-वृत्तांत हैं। ‘20वीं शती का गोलोक’ शीर्षक से स्वीडन का यात्रा-वृत्त है। स्वीडन में बड़े पैमाने पर डेयरी फार्मिंग होती है। लेकिन जब अज्ञेय को कहीं कोई गाय नहीं दिखी तो उन्होंने इस बारे में पूछताछ की . सवाल करने पर अज्ञेय खुद कई सवालों से घिर गए। जैसे- सुना है आपके देश के शहरों में सांड़ छुट्टे फिरते हैं, क्या यह सच है? सुना है कि आपके यहां गाय लोगों के घरों में रहती हैं और चराने के लिए सड़कों पर छोड़ दी जाती हैं, जहां वे कचरा खाती हैं। क्या यह बात सही है? लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि भारत में तो गाय पूज्य मानी जाती है, है न?

अज्ञेय आगे लिखते हैं, 'ठीक ही तो है। जहां मनुष्य गाय को नहीं खाता, वहां गाय मनुष्य को खाती है- और मनुष्य अच्छा भोजन नहीं है इसलिए उसको खाकर भी भूखी रह जाती है। गाय क्योंकि पूज्य है। इसलिए उसको पालनेवाला निर्धन व्यक्ति उसको भी भूखों मारता है; और उसके साथ स्वयं भी भूखों मरता है और अपने को यही सोचकर सांत्वना दे लेता है कि गाय को भूखे रखने के कारण वह पाप-भागी नहीं है क्योंकि वह स्वयं भी तो भूखा है। वास्तव में जब तक हमारी गो-संबंधी भावना में परिवर्तन नहीं होता तब तक स्थिति में कोई सुधार भी नहीं हो सकता और उस दिशा में किया जाने वाला सब प्रयत्न बालू की दीवार है। गोधन का संवर्द्धन तो तभी हो सकता है जब हम उसे धन मानें; अर्थात भावना को एक ओर रखकर उसे आर्थिक नियमों के अधीन मान लें। माताओं की वृद्धि नहीं की जाती, न सुधार होता है और माताओं की नस्ल के बारे में कुछ कहना तो निरा दुर्विनय है!'
असल माखज़ : नवभारत टाइम्स 

Comments

DR. ANWER JAMAL said…
Nice ,

हक़ीक़त गहरी हो और उसे भारत न जानता हो ?
यह एक असंभव बात है।
भारत का साहित्य गहरी हक़ीक़तों से लबालब भरा हुआ है। गहरी हक़ीक़तों के जानने वाले को ही पंडित कहा जाता है।
पंडित वह सत्य भी जानते हैं जिसे इतिहास ने महफ़ूज़ कर लिया और जिसे सब जानते हैं और पंडित वह परम सत्य भी जानते हैं जिसे सुरक्षित रखने का सौभाग्य केवल उन्हीं को मिला और जिसे कम लोग ही जानते हैं।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भारत के वैदिक पंडित किस रूप में जानते हैं ?
यह जानने के लिए आज हम वेद भाष्यकार पंडित दुर्गाशंकर सत्यार्थी जी का एक लेख यहां पेश कर रहे हैं।
आज तक लोगों ने यही जाना है कि ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो ज्ञानी होय‘ लेकिन अगर ‘ज्ञान‘ के दो आखर का बोध ढंग से हो जाए तो दिलों से प्रेम के शीतल झरने ख़ुद ब ख़ुद बहने लगते हैं। यह एक साइक्लिक प्रॉसेस है।
पंडित जी का लेख पढ़कर यही अहसास होता है।
मालिक उन्हें इसका अच्छा पुरस्कार दे, आमीन !
http://vedquran.blogspot.com/2012/01/mohammad-in-ved-upanishad-quran-hadees.html

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