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वे इस्लाम की शीतल छाया में जीवन गुज़ार रहे हैं, लेकिन उन्हें बोध नहीं है।



जिसे जानना हो, वह जान ले !

वर्ण व्यवस्था जा चुकी है और इस्लाम आ चुका है।
इस्लाम को न मानकर आप केवल अपना जीवन ही नष्ट नहीं कर रहे हैं बल्कि समाज के कमज़ोर वर्गों का जीवन भी नर्क बना रहे हैं .
एक दिन आपको उस मालिक को अपने इन सब कर्मों का जवाब देना है.
यह धर्म और आपका यह जीवन सब कुछ उसी का दिया हुआ है और एक दिन वह आपसे इस नाफ़रमानी का हिसाब ज़रूर लेगा .
कृपया विचार करें कि मुसलामानों से चिढ कर आप खुद को सत्य से महरूम क्यों कर रहे हैं ?

Comments

DR. ANWER JAMAL said…
हरेक आस्तिक अपने पैदा करने वाले को किसी न किसी नाम से याद करता ही है। जो जिस ज़बान को जानता है, उसी में उसका नाम लेता है। हरेक ज़बान में उसके सैकड़ों-हज़ारों नाम हैं। उसका हरेक नाम सुंदर और रमणीय है। ‘रमणीय‘ को ही संस्कृत में राम कहते हैं। ईश्वर से बढ़कर रमणीय कोई भी नहीं है। कोई उसका नाम ‘राम राम‘ जपता है तो कोई ‘अल्लाह अल्लाह‘ कहता है। अलग अलग ज़बानों में लोग अलग अलग नाम लेते हैं। योगी भी नाम लेता है और सूफ़ी भी नाम लेता है।
http://vedquran.blogspot.com/2012/01/sufi-silsila-e-naqshbandiya.html

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