Monday, January 30, 2012

Golok जहां मनुष्य गाय को नहीं खाता, वहां गाय मनुष्य को खाती है - अज्ञेय

ब्लॉगर्स मीट वीकली (28) God in Ved & Quran

में गाय गांधी और गोडसे एक साथ 

गाय के साथ मुसीबत भी मुफ्त में


अमित चौधरी का विचार है कि
उत्तर प्रदेश के चुनावों में 4 बड़ी पार्टियों-बीएसपी, एसपी, बीजेपी और कांग्रेस में सबसे खस्ता हालत बीजेपी की मानी जा रही है। इसके बावजूद बीजेपी सुधरने को तैयार नहीं है और मामला कोर्ट में होने के बावजूद चुनावी घोषणा पत्र में राम मंदिर का जिक्र करने से अपने आपको नहीं रोक सकी। आम तौर पर सभी पार्टियों के घोषणा पत्र में जनता की भलाई का वादा होता है। बीजेपी का चुनावी घोषणा पत्र भी इससे अलग नहीं है लेकिन एक चीज इसमें बड़ी हास्यास्पद लगी। बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनने के बाद (जिसकी संभावना नहीं दिख रही है) गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों (बीपीएल) को मुफ्त में गाय देना चाहती है।

अगर बीजेपी ने बीपीएल परिवारों को इसके लिए चुना है तो इसका मकसद उनकी गरीबी दूर करना ही होगा। इसमें हास्यास्पद बात यह है कि जो परिवार पहले से ही गरीबी रेखा से नीचे हैं यानी अपना पेट बमुश्किल से भर पाते हैं, वे गाय के लिए चारा कहां से जुटाएंगे? उनके पास इतनी जमीन नहीं कि खेती कर सकें, तो गाय के लिए चारा कहां बोएंगे? गांवों में पहले जैसे बाग या ग्राम-सभा की जमीन नहीं रही, जहां जानवरों को चराया जा सके। या फिर बीजेपी गाय देने के बाद चारे का भी कुछ इंतजाम करेगी? दरअसल, बीजेपी के इस वादे को पढ़ते ही मुझे 2 चीजें एक साथ याद आईं। पत्रकार पी. साईनाथ और साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का लिखा हुआ कुछ याद आया। हो सकता है आपने दोनों चीजें पढ़ी हों लेकिन मैं उन्हीं का जिक्र बीजेपी के इस वादे के संदर्भ में करना चाहता हूं।

पी. साईनाथ ने करीब 15 साल पहले देश के सबसे गरीब जिलों पर कुछ रिपोर्ट्स लिखीं थीं, जो पेंग्विन से प्रकाशित एक किताब everybody loves a good drought में हैं। इसका हिंदी अनुवाद तीसरी फसल नाम से आनंद स्वरूप वर्मा ने किया है। इसमें पहली ही रिपोर्ट है 'आए थे नस्ल सुधारने पर...' इसमें उन्होंने उड़ीसा के नवापाड़ा का जिक्र किया है। वहां पर सरकार ने लोगों को मुफ्त में गायें दीं। उनके चारे के लिए पेड़ और उन पेड़ों को उगाने के लिए जमीन का भी इंतजाम किया। इसके साथ सख्त हिदायत दी गई कि उस जमीन पर अनाज नहीं उगाना है, वही पेड़ उगाने हैं। चारा उगाने के लिए भी लोगों को मजदूरी देने की बात कही गई। गायों की नस्ल न खराब हो जाए, इसके लिए उस इलाके के सांड़ों का बधिया कर दिया गया, जबकि उन खरियार सांड़ों की नस्ल अच्छी मानी जाती थी। उस वक्त इस योजना पर 2 करोड़ रुपए खर्च हुए और 2 साल में 8 बछड़े पैदा हुए। दूध में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई और चारे के लिए लगाए गए हजारों पेड़ उग नहीं पाए, क्योंकि वे उस मिट्टी के अनुकूल नहीं थे। काफी वक्त बाद उस इलाके के कुछ लोग कहीं से कुछ खरियार सांड़ ले आए और चाहते थे कि लोगों को इस बारे में शिक्षित करें। पी. साईनाथ लिखते हैं, 'अफसरों को भी शिक्षित करने की कुछ कम जरूरत नहीं, क्योंकि फुदकू टांडी ने बताया कि भुवनेश्वर से अफसर आए थे। उन्होंने समन्विता कार्यक्रम को बंद करने का एलान किया और कहा कि अब हम लोग जा रहे हैं, इस कार्यक्रम को कहीं और लागू करने।'

ज्ञानपीठ से प्रकाशित अज्ञेय की एक किताब है, 'एक बूंद सहसा उछली।' इसमें यूरोप के यात्रा-वृत्तांत हैं। ‘20वीं शती का गोलोक’ शीर्षक से स्वीडन का यात्रा-वृत्त है। स्वीडन में बड़े पैमाने पर डेयरी फार्मिंग होती है। लेकिन जब अज्ञेय को कहीं कोई गाय नहीं दिखी तो उन्होंने इस बारे में पूछताछ की . सवाल करने पर अज्ञेय खुद कई सवालों से घिर गए। जैसे- सुना है आपके देश के शहरों में सांड़ छुट्टे फिरते हैं, क्या यह सच है? सुना है कि आपके यहां गाय लोगों के घरों में रहती हैं और चराने के लिए सड़कों पर छोड़ दी जाती हैं, जहां वे कचरा खाती हैं। क्या यह बात सही है? लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि भारत में तो गाय पूज्य मानी जाती है, है न?

अज्ञेय आगे लिखते हैं, 'ठीक ही तो है। जहां मनुष्य गाय को नहीं खाता, वहां गाय मनुष्य को खाती है- और मनुष्य अच्छा भोजन नहीं है इसलिए उसको खाकर भी भूखी रह जाती है। गाय क्योंकि पूज्य है। इसलिए उसको पालनेवाला निर्धन व्यक्ति उसको भी भूखों मारता है; और उसके साथ स्वयं भी भूखों मरता है और अपने को यही सोचकर सांत्वना दे लेता है कि गाय को भूखे रखने के कारण वह पाप-भागी नहीं है क्योंकि वह स्वयं भी तो भूखा है। वास्तव में जब तक हमारी गो-संबंधी भावना में परिवर्तन नहीं होता तब तक स्थिति में कोई सुधार भी नहीं हो सकता और उस दिशा में किया जाने वाला सब प्रयत्न बालू की दीवार है। गोधन का संवर्द्धन तो तभी हो सकता है जब हम उसे धन मानें; अर्थात भावना को एक ओर रखकर उसे आर्थिक नियमों के अधीन मान लें। माताओं की वृद्धि नहीं की जाती, न सुधार होता है और माताओं की नस्ल के बारे में कुछ कहना तो निरा दुर्विनय है!'
असल माखज़ : नवभारत टाइम्स 

Thursday, January 26, 2012

ख़ास पेशकश : ब्लॉगर्स मीट वीकली (27) Frequently Asked Questions

इंसान जिन सवालों की वजह से परेशान रहता है उन सबका जवाब भी वह पा सकता है उनकी वेबसाइट पर देखिए


मौलाना अपनी बुढ़ापे की उम्र में भी इसी शांति और रूहानियत का संदेश लेकर पूरब से लेकर पश्चिम तक घूम रहे हैं, जो लोग दिल्ली या उसके आस पास रहते हैं वे मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब को रू रू सुनने की ख़ुशक़िस्मती पा सकते हैं उनके सेंटर पर जिसका पता है सीपीएस इंटरनेशनल 1 निज़ामुददीन वेस्ट नई दिल्ली 110013 एक फ़ोन नंबर भी है जिस पर आप उनके कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं- 01124357333

कैसी लगी आपको यह  ख़ास पेशकश ?

Asal Maakhaz : ब्लॉगर्स मीट वीकली (27) Frequently Asked Questions

Sunday, January 22, 2012

सोमवार का मतलब है ब्लागर्स मीट वीकली, याद है न ?

विधवा समस्या इस बार की मीट का ख़ास टॉपिक था। वृंदावन में बहुत सी विधवाएं रहती हैं। जो निर्धन विधवाएं हैं, उनके मरने पर उनके शरीर को स्वीपर छोटे छोट पीस में काटकर थैलियों में भरकर फेंक देते हैं।
अंतिम संस्कार क्यों नहीं हो पाता इन विधवाओं का ?
और इससे भी बढ़कर यह कि उन्हें विधवा रहने पर मजबूर कौन करता है ?
अगर उनके सामने विवाह का विकल्प हो तो क्या वे विधवा रहकर कीर्तन करते रहना पसंद करेंगी ?
लेकिन बात यह है कि समाज में तो कुंवारियों को ही वर मिलने मुश्किल हो रहे हैं फिर विधवा को स्वीकारेगा कौन ?
वह कौन सी विचारधारा है जो विधवा के विवाह को प्रमुखता देती है ?


वह कौन सी विचारधारा है जिसके आदर्श पुरूषों ने विधवाओं से विवाह किया है , इस पर ग़ौरो फ़िक्र ज़माने की ज़रूरत है लेकिन किया किसी ने भी नहीं।
कहीं से किसी ने नहीं बताया कि इसका हल क्या है ?
ब्लागर मीट कहीं जंगल में रख लो तो मंगल मनाने हंसने बतियाने वहां पहुंच जाएंगे सब के सब और वृंदावन में बदहाल विधवाओं की चिंता न किसी दक्खनपंथी को है और न किसी मक्खनपंथी को।
हमदर्दी के जज़्बात से ख़ाली होकर कविताएं गाने का मतलब क्या रह जाता है ?
बस हरेक अपनी आज़ादी और अपनी सहूलत का ख़याल रख रहा है और बस ख़ुद के लिए पाना चाहता है।
दूसरों के लिए सोचना जब आएगा जब ब्लागर सच में इंसान कहलाएगा।
सही सोच का यही नक्शा पेश किया था पिछली ब्लागर मीट वीकली में
और अब तो नई मीट का दिन भी आ पहुंचा है।
ब्लॉगर्स मीट वीकली (26) Dargah Shaikh Saleem Chishti

Thursday, January 19, 2012

मुसलमान पति से मिलने वाले लाभ को हर घर में आम कर दिया जाए तो हर घर आनंद से भर जाएगा

लव जिहाद का चर्चा फिर उठाया जा रहा है .
मुसलमान पति से मिलने वाले लाभ को हर घर में आम कर दिया जाए तो हर घर आनंद से भर जाएगा और स्त्री के मन पर किसी भौतिक अभाव का भी प्रभाव न पड़ेगा.


मुसलमानों को इल्ज़ाम न दो बल्कि जो वे देते हैं आप भी वही आनंद उपलब्ध कराइये.

अच्छी बातें एक दूसरे से सीखने में कोई हरज नहीं है,

मुसलमान योग शिविर में जाते हैं और योग सीखते हैं,

आप उनसे दाम्पत्य जीवन के आनंद का रहस्य जान लीजिए,

हक़ीक़त यह है कि जो मज़ा आता है उसे अल्फ़ाज़ बताया नहीं जा सकता.

ज़रा सोचिए कि आज मुसलमान को संदिग्ध बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. शिक्षा और आय में उसे पीछे धकेला ही जा चुका है. इसके बावजूद भी जब एक लड़की अपना दिल हारना चाहती है तो वह एक मुसलमान युवक को ही क्यों चुनती है ?

परफ़्यूम छिड़ककर और बाइक लेकर सीटियां बजाते हुए तो हर समुदाय के युवक घूम रहे हैं.
लव जिहाद नाम की कोई चीज़ हक़ीक़त में होती तो क्या हम न करते ?
asal maakhaz :

'Love Jihad' उर्फ़ नाच न जाने आंगन टेढ़ा

Tuesday, January 17, 2012

किसी अच्छे काम के लिए पीसफ़ुल एक्टिविटी करना जिहाद है . True Jihad - Mawlana Wahiduddin Khan

Dr. Ayaz Ahmad  with Maulana Wahiduddin Khan 
 मौलाना साहब से मिलने के लिए और उनका लेक्चर सुनने के लिए निज़ामुद्दीन , नई दिल्ली गए थे। हमारे साथ अनस ख़ान और डा. अयाज़ अहमद भी थे। अब उनके बायीं तरफ़ भाई रजत मल्होत्रा जी आकर बैठ गए। लोगों ने एक स्लिप पर अपने सवाल लिखकर पूछने शुरू कर दिए और रजत भाई की गोद में रखे हुए लैपटॉप दुनिया के अलग अलग मुल्कों से सवाल और कॉम्पलीमेंट्स आने लगे।
एक सवाल जिहाद के बारे में आया।
मौलाना ने कहा कि जिहाद के माअना कोशिश के हैं। किसी अच्छे काम के लिए पीसफ़ुल एक्टिविटी करना जिहाद है।
जिहाद का मतलब क़िताल (युद्ध) नहीं है। क़ुरआन में आया है कि ‘ व-जाहिद बिहिम जिहादन कबीरा‘ यानि ‘और इस (क़ुरआन) के ज़रिये से उनके साथ जिहाद ए कबीर करो।
क़ुरआन कोई हथियार नहीं है। क़ुरआन कोई तलवार या बम नहीं है।
इस बारे में आप हमारी दो किताबें देखें,
1. ट्रू जिहाद
2. प्रॉफ़ेट ऑफ़ पीस
मौलाना की किताब ‘प्रॉफ़ेट ऑफ़ पीस‘ को पेंग्विन ने पब्लिश किया है।

एक सवाल आया कि कुछ लोग फ़िक्री ताक़त को कम और असलहे की ताक़त को ज़्यादा समझते हैं। क्या यह सही है ?
मौलाना ने फ़रमाया कि यह ग़लत बात है। असलहे की ताक़त से बड़ी कामयाबी मिलने की कोई मिसाल तारीख़ (इतिहास) में नहीं है। रूस अफ़ग़ानिस्तान में और अमेरिका इराक़ में नाकाम हुआ।
पीसफ़ुल एक्टिविटी का तरीक़ा अख्तियार करना फ़िक्री ताक़त का इस्तेमाल करना है।
एक है पीसफ़ुल एक्टिविज़्म और दूसरा है वॉयलेंट एक्टिविज़्म।
1857 में आज़ादी के लिए वॉयलेंट एक्टिविटी की गई लेकिन आज़ादी नहीं मिली जबकि महात्मा गांधी ने 1947 में पीसफ़ुल एक्टिविटी की और आज़ादी मिल गई।
तशद्दुद (हिंसा) सें मक़सद हासिल नहीं होता बल्कि बात और बिगड़ जाती है।
फ़िक्र की ताक़त को इस्तेमाल करने का मतलब है नज़रिये की ताक़त को इस्तेमाल करना।

सैटेनिक वर्सेज़ के बारे में एक सवाल आया कि इस्लमी तारीख़ में इसका क्या मक़ाम है ?
मौलाना ने कहा कि इस्लामी तारीख़ में सैटेनिक वर्सेज़ का कोई मक़ाम ही नहीं है। ख़ुशवंत सिंह ने जब इसे पढ़ा था तो उन्होंने इसके प्लॉट को रद्दी क़रार दिया था। यह फ़ेल हो जाएगा लेकिन मुसलमानों ने इसे लेकर शोर मचाया तो इसकी ख़ूब सेल हुई।

जन्नत के बारे में किसी भाई ने नेट के ज़रिये दरयाफ़त किया कि मौलाना जन्नत पाने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?
मौलाना ने सूरा ए ताहा की 76 वीं आयत पढ़ी ‘व-ज़ालिका जज़ाऊ मन तज़क्का‘ यानि यह बदला है उस शख्स का जो पाकीज़गी (पवित्रता) अख्तियार करे।
जो अपने आपको पाक करता है। उसके लिए जन्नत है। जितनी भी नेगेटिव थिंकिंग्स हैं, उनसे ख़ुद को पाक करना है। नफ़रत, हसद और ग़ुस्से से ख़ुद को पाक करना है।
मुकम्मल तफसील के लिए देखें -

Thursday, January 12, 2012

वे इस्लाम की शीतल छाया में जीवन गुज़ार रहे हैं, लेकिन उन्हें बोध नहीं है।



जिसे जानना हो, वह जान ले !

वर्ण व्यवस्था जा चुकी है और इस्लाम आ चुका है।
इस्लाम को न मानकर आप केवल अपना जीवन ही नष्ट नहीं कर रहे हैं बल्कि समाज के कमज़ोर वर्गों का जीवन भी नर्क बना रहे हैं .
एक दिन आपको उस मालिक को अपने इन सब कर्मों का जवाब देना है.
यह धर्म और आपका यह जीवन सब कुछ उसी का दिया हुआ है और एक दिन वह आपसे इस नाफ़रमानी का हिसाब ज़रूर लेगा .
कृपया विचार करें कि मुसलामानों से चिढ कर आप खुद को सत्य से महरूम क्यों कर रहे हैं ?

Saturday, January 7, 2012

गर्भवती, रजोनिवृत्त महिलाओं में मछली के तेल के 11 लाभ

महिलाओं मछली के तेल से एक बहुत लाभ सकता है. पूर्व सिंड्रोम, भ्रूण विकास और गर्भावस्था की वृद्धि की संभावना के उपचार - हृदय काम करता है, मस्तिष्क स्वास्थ्य, मूड लाभ में वृद्धि, लक्षण आदि के उन्मूलन के विनियमन की तरह सामान्य स्वास्थ्य लाभ के अलावा, महिलाओं को भी अतिरिक्त लाभ का आनंद मिलता है. हाँ! मछली के तेल तुम्हें बाहर ले अपनी उदास और तुम उज्ज्वल, स्वस्थ और स्वस्थ बनाते हैं.
डालो Femme: गर्भवती, रजोनिवृत्त महिलाओं में 11 मछली के तेल के लाभ


महिलाओं के लिए तेल मछली: मछली के तेल प्रकार की समुद्री मछली और निकाले से सामन, अल्बकोर ट्यूना, लेक ट्राउट, सार्डिन हेरिंग, हलिबेट महिलाओं के लिए अच्छे हैं. मछली के तेल की आपूर्ति करता है EPA और DHA के रूप में दोनों स्वस्थ एसिड होता है जो उन्हें सहनशक्ति देना सामान्य और नियमित रूप से बीमारियों के खिलाफ लड़ने के लिए होते हैं. प्रमुख लाभ में से कुछ हैं:
1. सुरक्षा कैंसर से स्तन: स्तन कैंसर स्तन एक पूरे जीवन का बाजार कर सकते हैं महिला और सौंदर्य की हानि, जिसके परिणामस्वरूप. अनुसंधान दिखाया है कि मछली के तेल से फैटी एसिड की एक अच्छी आपूर्ति के साथ महिलाओं को स्तन कैंसर होने की संभावना कम है. DHA है एक प्राकृतिक विरोधी भड़काऊ है कि सेल परिवर्तन रोकता है और कोशिकाओं है कि स्तन कैंसर के मूल कारण हैं मारता है.
2. सुधार प्रजनन: reseach से पता चलता है कि मछली के तेल का सेवन आहार नियमित खुराक में प्रजनन की दर बढ़ जाएगी. मछली के तेल के दैनिक आहार में जोड़ा खुराक हार्मोन संतुलन होगा, हार्मोन के स्तर में सुधार लाने और गर्भाशय के लिए एक स्थिर रक्त के प्रवाह को बनाए रखने. ओमेगा -3 वसा गर्भावस्था के अवसरों में भी वृद्धि कर सकते हैं.
3. भ्रूण विकास: मछली के तेल से फैटी एसिड वितरण अवधि के पूर्व कम जोखिम के. यह सुनिश्चित करता है कि गर्भावस्था के चरणों पूरी तरह से शरीर के कुछ हिस्सों का गठन कर रहे हैं और सुनिश्चित करता है कि भ्रूण जन्म से पहले अच्छी तरह से होता है. 


4. शिशु के मस्तिष्क विकास: एक बच्चे के दिमाग से काम उचित इसके लिए महत्वपूर्ण है. ओमेगा -3 और DHA मछली के तेल में पाया मस्तिष्क के विकास और इस तरह, एक बच्चे की बुद्धि में वृद्धि की आपूर्ति करता है.

5. स्वस्थ शिशुओं: मछली का तेल बच्चे गर्भावस्था एक स्वस्थ की जानी चाहिए एक भाग के आहार के रूप में और माँ यह मदद करता है के बीच में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों के आदान placental रक्त परिसंचरण और प्रभावी है.
6. मुफ्त postpartum अवसाद से: तेल मछली का सेवन उच्च महिलाओं के साथ postpartum अवसाद का खतरा कम है. इस माँ और बच्चे के लिए एक अच्छी खबर है.
7. राहत ऐंठन से मासिक धर्म: लक्षण के premenstruation अप्रिय एसिड के फैटी असंतुलन का परिणाम अक्सर.ओमेगा 3 मछली के तेल relieves दर्द और ऐंठन और ammenorrhea dysmenorrhea के कारण.
8. Preeclampsia से रोकथाम: एक्लंप्षण पूर्व रक्तचाप के रूप में जाना गर्भावस्था के दौरान, खतरनाक बहुत जा सकता है. ओमेगा 3 मछली के तेल फैटी एसिड मदद रक्तचाप को बनाए रखने और महत्वपूर्ण माँ और बच्चे के स्वास्थ्य के जोखिम को कम. 


9. ऑस्टियोपोरोसिस के खिलाफ संरक्षण: तेल से मछली फैटी एसिड का स्तर उच्च होने ऑस्टियोपोरोसिस के जोखिम को कम करने के लिए है दिखाया गया है.

10. कम से कम रजोनिवृत्ति समस्याओं: संतुलन के द्वारा हार्मोनल नाटकीय रूप से सुधार, मछली के तेल में फैटी एसिड झूलों सकते मूड और कम करने में काफी चमक गर्म लक्षण रजोनिवृत्ति जैसे.
11. हृदय रोग के कम जोखिम: हृदय रोग की बीमारी को मारता है कई अन्य किसी भी समय की तुलना में महिलाओं को आगे की. ओमेगा EPA और DPA साथ 3 वसा अच्छा करने के लिए इस परिदृश्य लड़ाई है. मछली के तेल ट्राइग्लिसराइड्स, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करती है, एक पूरी की और स्वस्थ जीवन के लिए जिस तरह फ़र्श.

असल  माखज़ - http://www.fish-oils.com/hi/uses-of-fish-oils_pour-femme-11-benefits-of-fish-oil-in-pregnant-menopausal-women_95.html

Wednesday, January 4, 2012

सूफ़ियों का तरीक़ा ए तालीम What is Sufism Tasawwuf ? [English] Shaykh-ul-Islam Dr.Tahir-ul-Qadri 1/3

नक्शबंदी सूफ़ियों का तरीक़ा ए तालीम
हज़रत ख्वाजा बाक़ी बिल्लाह रहमतुल्लाह अलैह (1563-1603) की आमद के साथ ही नक्शबंदी सिलसिला हिंदुस्तान में आया। नक्शबंदी सूफ़ियों की तालीम में हमने देखा है कि उनकी एक तवज्जो (शक्तिपात) से ही मुरीद के दिल से रब का नाम ‘अल्लाह अल्लाह‘ जारी हो जाता है यानि चाहे वह किसी से बात कर रहा हो या कुछ और ही सोच रहा हो या सो रहा हो लेकिन रब का नाम उसके दिल से लगातार जारी रहता है। जिसे अगर शैख़ चाहे तो मुरीद अपने कानों से भी सुन सकता है बल्कि पूरा मजमा उसके दिल से आने वाली आवाज़ को सुन सकता है। इसे ‘लतीफ़ा ए क़ल्ब का जारी होना‘ कहा जाता है। लतीफ़ अर्थात सूक्ष्म होने की वजह से इन्हें लतीफ़ा कहा जाता है। हिंदी में इन्हें चक्र कहा जाता है।
इसके बाद शैख़ की निगरानी में मुरीद एक के बाद एक चार लतीफ़ों से भी ज़िक्र करता है। ये भी अल्लाह के ज़िक्र से जारी हो जाते हैं। ये पांचों लतीफ़े इंसान के सीने में पाए जाते हैं। इस तरह सीने में पांच लतीफ़े अल्लाह के ज़िक्र से जारी हो जाते हैं। इन पांचों लतीफ़ों के नाम यह हैं-
1. लतीफ़ा ए क़ल्ब
2. लतीफ़ा ए रूह
3. लतीफ़ा ए सिर्र
4. लतीफ़ा ए ख़फ़ी
5. लतीफ़ा ए इख़्फ़ा

इसके बाद छठे लतीफ़े से ‘अल्लाह अल्लाह‘ का ज़िक्र किया जाता है। इस लतीफ़े का नाम है ‘लतीफ़ा ए उम्मुद्-दिमाग़‘। यह लतीफ़ा सिर के बीचों बीच होता है। इस तरह थोड़े ही दिन बाद बिना किसी भारी साधना के यह नाम शरीर के हरेक रोम से और ख़ून के हरेक क़तरे से जारी हो जाता है। इस ज़िक्र की ख़ासियत यह होती है कि ‘अल्लाह अल्लाह‘ की आवाज़ जब सुनाई देती है तो इस ज़िक्र में कोई गैप नहीं होता। यह ज़िक्र एक नाक़ाबिले बयान मसर्रत और आनंद से भर देता है। इसे ‘सुल्तानुल अज़्कार‘ कहते हैं और मुरीद इस मक़ाम को 3 माह से भी कम अवधि में पा लेता है।

Sunday, January 1, 2012

वर्ष 2012 आपके लिए एक अवसर है शांति पाने का, मालिक आप सबको शांति के ख़ज़ाने से भर दे।


एक पैग़ाम ईमेल से हमें मिला तो गोया कि हमें शब्द मिल गए नए साल की मुबारकबाद देने के लिए .

[Blog News] मालिक आप सबको शांति के ख़ज़ाने से भर दे Happy 2012

  
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DR. ANWER JAMAL 

Sat, Dec 31, 2011 at 10:56 AM
To: ayazdbd@gmail.com
वर्ष 2011 बस अब जा ही चुका है और वर्ष 2012 आपके सामने है।
हम आपके लिए शांति की कामना करते हैं।
मालिक आप सबको शांति के ख़ज़ाने से भर दे।
मालिक आपको ऐसी शांति दे, 
जो सदा आपके साथ बनी रहे।
वर्ष 2012 आपके लिए एक अवसर है, शांति पाने का।

नए साल के मुबारक मौक़े पर हमारी तरफ़ आपके लिए एक अमूल्य भेंट है,
जो शांति को तुरंत उपलब्ध कराती है।

विभिन्‍न प्रकार की नमाज और उन्हें पढने का तरीका namaz ka tariqa


लाखों हिन्‍दी जानने वाले हमारे भाईयों-बहनों को अरबी न समझने के कारण नमाज़
पढने में दिक्‍कत होती है, उनकी परेशानी को देखते हुये, पेश है ऐसी किताब जो नमाज विषय पर हिन्‍दी में सभी जानकारी देती है .

लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

 जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...