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मूंछें हों तो नत्थूलाल जैसी , वरना न हों ,

ठीक ऐसे ही कुर्बानी पर बहस हो तो ऐसी जैसी शिल्पा मेहता जी ने की है .
देखें उनकी पोस्ट :
"कुर्बानी क्या होती है ?
अलबत्ता हमारा कमेन्ट उन्होंने छापा नहीं है.
हमने उसमें कहा था की बकरीद के मौके पर जो लोग अहिंसा का पाखण्ड रचाते हैं खुद पूरे साल मक्खी , मच्छर  और चूहे मारते रहते हैं . शहद भी ये लोग खाते हैं और ...
अंडा मछली भी लुत्फ़ के साथ खाते हैं .
फिर भी ये चिल्लाते हैं.

Comments

shilpa mehta said…
Thanks

आपका कमेन्ट इसलिये नही छाप सकी - कि उसमे बहुत आक्षेप थे, जो बहस मे हो सकते हैं, चर्चा मे नही ॥

आपको चर्चा पसंद आई हो, तो कृपया मेरे प्रश्न का उत्तर देंगे ? वह पोस्ट अहिंसा पर नहीं है - कुर्बानी शब्द की परिभाषा पर है |

सादर, सधन्यवाद |
DR. ANWER JAMAL said…
शिल्पा जी अपने लिए जो अधिकार चाहती हैं , वह अधिकार वह दूसरे के लिए नहीं मानतीं .
कुर'आन की आयतों की तुलना उन्होंने गीता से की लेकिन जब हमने कुर'आन की का आदेश वेद में दिखाया तो उन्होंने हमारी वह टिप्पणी पब्लिश ही नहीं की ,
इसे न तो स्वस्थ चर्चा कहा जा सकता है और न ही स्वस्थ बहस ,
और अब उन्होंने टिप्पणी का ऑप्शन ही बंद कर दिया है.
इसलिए वह टिप्पणी हम अब यहाँ लगा रहे हैं -

### और प्रत्येक समुदाय के लिए हमने क़ुरबानी का विधान किया
शिल्पा जी ने क़ुरआन की आयतों के अनुवाद को गीता के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने की कोशिश की है। हम क़ुरआन के इस दावे को वेदादि में देखने की कोशिश करेंगे कि क़ुरआन का यह दावा कितना ज़्यादा सही है ?
इस सिलसिले में हम स्वामी विवेकानंद जी का बयान यहां देखेंगे जो कि गीता के भी अच्छे जानकार थे।
स्वामी विवेकानंद जी सनातन परंपराओं के सिर्फ़ अच्छे जानकार ही नहीं थे बल्कि वे उनके रक्षक और पोषक भी थे। उन्होंने प्राचीन धार्मिक परंपराओं का ज्ञान आम करने की भी कोशिश की और उन्हें पुनर्जीवित करने का प्रयास भी किया। इसी प्रयास हेतु वह आजीवन गौमांस खाते रहे हैं।
इस तरह यह सच्चाई सामने आ जाती है कि पशुबलि के अर्थों में क़ुरबानी ईश्वरीय धर्म की एक सनातन परंपरा है। जो लोग इसे छोड़ना चाहें , वे इसे छोड़ सकते हैं और जो इसे न छोड़ना चाहें तो उन्हें प्राचीन परंपराओं का रक्षक समझा जाए।
देखिए -
स्वामी विवेकानंद ने पुराणपंथी ब्राह्मणों को उत्साहपूर्वक बतलाया कि वैदिक युग में मांसाहार प्रचलित था . जब एक दिन उनसे पूछा गया कि भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कौन सा काल था तो उन्होंने कहा कि वैदिक काल स्वर्णयुग था जब "पाँच ब्राह्मण एक गाय चट कर जाते थे ." (देखें स्वामी निखिलानंद रचित 'विवेकानंद ए बायोग्राफ़ी' प॰ स॰ 96)
€ @ क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?
या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ?
2- ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति .
ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है .
-ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य
सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में भी यही पढ़ाया जाता है ।
क्या सायण और विवेकानंद की गिनती असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?
Haj or Yaj विभिन्न धर्म-परंपराओं का संगम : हज By S. Abdullah Tariq
shilpa mehta said…
This comment has been removed by the author.
shilpa mehta said…
अनवर जमाल भाई साहब
मैंने आपका कमेन्ट तो पब्लिश किया ना ?

जो आपका कमेन्ट आया ( जिसे मैंने पब्लिश भी किया - अनाधिकार चेष्टा वाला ) उसमे जो नाराज़गी का पुट था - उसी के कारण चर्चा बंद कर दी मैंने वहां | मैं चर्चा तो करती हूँ , बहस नहीं करती | न मेरा उद्देश्य कभी किसी की धार्मिक आस्थाओं को ठेस पहुंचाना रहा है - न कभी होगा | जब - जहाँ - जो - मुझे सही लगता है / गलत लगता है - वह यदि मेरी अंतरात्मा की आवाज़ हो, तो मैं उस पर चर्चा करती हूँ , और आगे भी करूंगी | यह बात मैं इस ब्लॉग जगत में कई लोगों से कह चुकी हूँ, आज आपसे भी कह रही हूँ |

परंतु , मैं जितना अधिकार अपना मानती हूँ अपनी आपत्ति कहने का, उतना ही दूसरे का भी मानती हूँ मुझसे असहमत रहने का | i believe in individual freedom of thought and decision . जो आपने कहा ".....शिल्पा जी अपने लिए जो अधिकार चाहती हैं , वह अधिकार वह दूसरे के लिए नहीं मानतीं . " इससे मैं असहमत हूँ, फिर भी - आपको अधिकार है कि आप ऐसा सोचना चाहें, तो ज़रूर सोचें, बल्कि सिर्फ सोचें ही क्यों कहें भी | :)

पहले भी कहा था - अब फिर कहूँगी - जितने आप अल्लाह के बन्दे हैं, उतनी ही मैं भी हूँ | जैसे आपके लिए पवित्र कुरान का स्थान है - मेरे लिए भी है | किन्तु वेदों का मुझे कोई ज्ञान नहीं है | तो उस विषय पर मैं क्या बात कर पाऊँगी ? मेरी काबिलियत नहीं है कि वेदों पर बात कर पाऊँ , क्योंकि उस बारे में मुझे जानकारी ही नहीं है | तो उस पर चर्चा के लिए तो आपको किसी जानकार से बात करनी होगी | मुझ जैसी अज्ञानी से नहीं |

:)
यह कमेन्ट ( जो आपने यहाँ लिखा ) तो आपने निरामिष पर किया है | आप कन्फ्यूज़ हो रहे हैं शायद | यह कमेन्ट निरामिष पर पब्लिश हुआ भी है - मैंने खुद देखा है वहां |

फिर भी - आपको लगता है कि मैंने आपका कमेन्ट पब्लिश नहीं किया - तो माफ़ी चाहती हूँ | मुझे खेद है | वैसे आप काफी ज्ञानवान व्यक्ति हैं, और काफी समय से मुझसे चर्चाएं करते आये हैं - आपने मेरे बारे में ऐसा सोचा - इस पर मुझे आश्चर्य है |

और एक बात - मैंने बार बार कहा कि मेरी पोस्ट मांसाहार के विरोध या पक्ष में नहीं है , न ही मैंने कहीं भी किसी मांसाहारी को असुर कहा है कभी भी | मेरे बहुत से नजदीकी मित्र मांसाहार लेते हैं, परिवार जन भी | और वे सब बहुत अच्छे लोग हैं | मैंने इस असुर वाली बात से स्वयं ही सहमत नहीं हूँ | विवेकनद जी के बारे में कुछ भी कहने में असमर्थ हूँ, क्योंकि मुझे जानकारी नहीं उनके बारे में भी |

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