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क्या कांग्रेस ही छीन रही है हिंदुस्तानी मुसलमानों से उनका स्वाभिमान ? या दूसरी पार्टियां भी ऐसा ही कर रही हैं ?


आज यह सवाल वे लोग भी पूछ रहे हैं जो कि ख़ुद भारतीय मुसलमानों के स्वाभिमान पर और उनकी धार्मिक परंपराओं पर चोट करते रहते हैं।
इसे कहते हैं घड़ियाली आंसू बहाना।
जिनके पास खुद स्वाभिमान नहीं है, 
वे भी स्वाभिमान की चिंता करते दिखते हैं और वह भी उन लोगों के स्वाभिमान की जिन्हें वे मांसाहार के कारण विदेश चले जाने का सुझाव देते हैं।
पता नहीं ये किसे धोखा देते हैं ?

Comments

ana said…
'kisnne kaha' se jyada mahatwpoorna hai 'kya kaha'....is bar inhone pte ki bat ki hai
DR. ANWER JAMAL said…
हक़ीक़त यह है कि क़ुरआन .खुदाई नेमतों का अबदी (चिरस्थाई) .खज़ाना है। क़ुरआन .खुदा का परिचय है। क़ुरआन बंदे और .खुदा का मिलन-स्थल है।
मगर उपरोक्त क़िस्म के काल्पनिक विचारों ने क़ुरआन को लोगों के लिए एक ऐसी किताब बना दिया जो या तो एक चटियल ज़मीन है जहाँ आदमी की रूह के लिए कोई ग़िज़ा नहीं या वह किसी शायर के मजमू ए कलाम की तरह एक ऐसा लफ्जी मज्मूआ है जिससे हर आदमी बस अपने .खास ज़ेहन की तस्दीक़ (पुष्टि) हासिल कर ले। वह असलन .खुद अपने आपको पाए और यह समझ कर .खुश हो कि उसने .खुदा को पा लिया है।

क़ुरआन एक फ़िक्री (वैचारिक) किताब है और फ़िक्री किताब में हमेशा एक से ज्य्ादा ताबीर की गुंजाइश रहती है। इसलिर क़ुरआन को सही तौर पर समझने के लिए ज़रूरी है कि पढ़ने वाले का ज़ेहन .खाली हो। अगर पढ़नेवाले का ज़ेहन .खाली न हो तो वह क़ुरआन में .खुद अपनी बात पढ़ेगा। इसे समझने के लिए क़ुरआन की आयत की मिसाल लीजिए :-
''कुछ लोग ऐसे हैं जो अल्लाह के सिवा दूसरों को उसका समकक्ष बनाते हैं और उनसे ऐसी मुहब्बत करते हैं जैसी मुहब्बत अल्लाह के साथ होनी चाहिए। हालाँकि इमान रखने वाले सबसे ज्य्ादा अल्लाह से मुहब्बत करते हैं।" (सूरह बक़रा- 165)
एक शख़्स जो सियासी ज़ौक़ रखता हो और सियासी उखेड़-पछाड़ को काम समझता हो, वह जब इस आयत को पढ़ेगा तो उसका ज़ेहन पूरी आयत में बस 'अंदाद' (समकक्ष) पर रूक जाएगा। वह क़ुरआन से 'समकक्ष' का लफ्.ज़ ले लेगा और बाक़ी मफ़हूम (भावार्थ) को अपने ज़ेहन से जोड़ कर कहेगा कि इससे आशय सियासी समकक्ष ठहराना है। इस आयत में कहा गया है कि आदमी के लिए जाइज़ नहीं कि वह किसी को .खुदा का सियासी समकक्ष बनाए। इस तशरीह के मुताबिक़ यह आयत उसके लिए इस बात का इजाज़तनामा बन जाएगी कि जिसे वह .खुदा का ' सियासी समकक्ष' बना हुआ देखे उससे टकराव शुरू कर दे। इसके विपरीत जो आदमी सादा जे.हन के साथ इसे पढ़ेगा वह 'समकक्ष' के लफ्.ज़ पर नहीं रूकेगा, बल्कि पूरी आयत की रोशनी में इसका मफ़हूम (भावार्थ) सुनिश्चित करेगा। ऐसे शख़्स को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि यहाँ समकक्ष ठहराने की जिस स्थिति का ज़िक्र है वह ब-एतबार मुहब्बत है न कि ब-एतबार सियासत। यानी आयत यह कह रही है कि आदमी को सबसे ज्य्.ादा मुहब्बत सिर्फ़ .खुदा से करना चाहिए। 'हुब्बे शदीद'(सबसे ज्य्.ादा मुहब्बत) के मामले में किसी दूसरे को .खुदा का हमसर नहीं बनाना चाहिए।

क़ुरआन का सामान्य मफ़हूम(भावार्थ) और इसे समझने की शर्त यह है कि आदमी .खाली ज़ेहन होकर क़ुरआन को पढ़े। मगर जो शख़्स क़ुरआन के गहरे मअना तक पँहुचना चाहे उसे एक और शर्त पूरी करनी पड़ती है। और वह यह कि वह उस राह का मुसाफ़िर बने जिसका मुसाफ़िर उसे क़ुरआन बनाना चाहता है। क़ुरआन आदमी की अमली (व्यावहारिक) ज़िन्दगी की रहनुमा किताब है और किसी अमली किताब को उसकी गहराइयों के साथ समझना उसी वक्.त मुमकिन होता है जबकि आदमी अमलन उन तजुर्बों से गुज़रे जिनकी तरफ़ इस किताब में रहनुमाई की गई है।

Musalmano ko apne sudhar ki taraf dhyaan dena chahiye .
DR. ANWER JAMAL said…
लोग जो शाकाहार पसंद करते हैं,
उन्हें जानकर ताज्जुब होगा कि आलू टमाटर को वैज्ञानिकों ने ख़ून पीते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया है।

See :-
http://hbfint.blogspot.com/2011/11/blog-post_3809.html

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