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मैदानी क्षेत्रों में मांस क्यों खाया जाए ?


हिंदू भाई बहनों में कुछ जो शाकाहारी हैं, वे ये सवाल अक्सर पूछते हैं। उनके सवालों का जवाब देती है यह पोस्ट

बौद्धिक बौनेपन का ख़तरा 


इसे पढ़कर आपकी  तसल्ली ज़रूर हो जाएगी।

Comments

सुज्ञ said…
aastik का कहना है: नवभारत में इसी पोस्ट पर

November 07,2011 at 04:11 PM IST

It is totatally out of context to quote the swaminatahn's research today!!
इन्होने 1967 में यानी चालीस साल पहले बौद्धिक बोनेपन की आशंका जताई थी. उस समाया के उपलब्ध जानकरी के हिसाब से ये सोचना शायद ग़लत ना हो पर आज स्थिति क्या है?क्या वाकई इस तरह की कोई बात समाज में है? हा कुपोषणा ,लोहे की कमतरत जैसे मुद्दे ज़रूर है पर वे सर्वथा अलग है.
ये सुनहरा मौका है की जो 40 साल पहले स्वामीनाथन ने कहा उसका विश्लेषण किया जाए . आज हक़ीकत तो ये है की भारतीयो के बौद्धिक उँचाई का लोहा तो सारी दुनिया मान रही है. खुद अमेरिका का रास्टरपति , या ब्रिटन का प्रधानमंत्री अपने देश के बचो को भारत की मिसाल देते है.बुद्धिक उँचाई में दुनिया के पहले तीन देशो में भारतीयो का नाम ज़रूर है.
आब में आपको अत्यंत सामयिक उधारण दूँगा. इस समाया स्टीव जॉब की जीवनी धूम मचा रही है . इस पुस्तक के लेखक वॉल्टर इस्साकसुन भारत और चीन के बारे में क्या कहते है ज़रा इस पर गौर करे.. China and India are likely to produce many rigorous analytical thinkers and knowledgeable technologists

क्या आप अब भी बौद्धिक बौनेपन का ख़तरा महसूस करते है जबकि खुद पस्चिम भारत की बौद्धिक उऊनचाई को उसके लिए ख़तरा मानता है?
सुग्य जी ने एक्दम सही कहा.....यह एक मूर्खतापूर्ण आलेख एवं खोज (?) थी जिसे किसी ने न माना और आज उसका उलता हुआ है...एसी जाने कितनी खोजें पश्चिमी देशों के पिट्ठू लोग करते रहते हैं भारतीय शास्त्रों, सभ्यता व विद्वता को नकारने के षडयन्त्र के तहत ....आज अनवर जी भी कब्र से निकाल कर लाये हैं....किस उद्देश्य से?????
DR. ANWER JAMAL said…
क़ुरबानी और मांसाहार के बारे में आपने अपने मनोभाव को व्यक्त किया , यह ठीक है लेकिन आपको प्रतिपक्ष की बात पर भी ध्यान देना चाहिए।
धन्यवाद !!!
‘चर्चा
गोश्‍तखोरी-सब्‍जीखोरी debate स्‍वामी नित्‍यानंद और डाक्‍टर बशीर
1910–1911 ई.

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