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Showing posts from November, 2011

अजमेर की दरगाह शरीफ - श्रुति अग्रवाल

दीदार गरीब नवाज की मज़ार का - श्रुति अग्रवाल 
दरगाह अजमेर शरीफ...एक ऐसा पाक-शफ्फाक नाम है जिसे सुनने मात्र से ही रूहानी सुकून मिलता है...अभी रमजान का माह चल रहा है...इस माह-ए-मुबारक में हर एक नेकी पर 70 गुना सवाब होता है। रमजानुल मुबारक में अजमेर शरीफ में हजरत ख्वाजा मोईनुद्‍दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह की मजार की जियारत कर दरूर-ओ-फातेहा पढ़ने की चाहत हर ख्वाजा के चाहने वाले की होती है,लेकिन रमजान की मसरूफियत और कुछ दीगर कारणों से सभी के लिए इस माह में अजमेर शरीफ जाना मुमकिन नहीं है। ऐसे सभी लोगों के लिए धर्मयात्रा में हमारी यह प्रस्तुति खास तोहफा है।
फोटो गैलरी देखने के लिए क्लिक करें-
दरगाह अजमेर शरीफ का भारत में बड़ा महत्व है। खास बात यह भी है कि ख्वाजा पर हर धर्म के लोगों का विश्वास है। यहाँ आने वाले जायरीन चाहे वे किसी भी मजहब के क्यों न हों, ख्वाजा के दर पर दस्तक देने के बाद उनके जहन में सिर्फ अकीदा ही बाकी रहता है। दरगाह अजमेर डॉट काम चलाने वाले हमीद साहब कहते हैं कि गरीब नवाज का का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि लोग यहाँ खिंचे चले आते हैं। यहाँ आकर लोगों को रूहानी सुकून मिलता है। 


भारत में इ…

तुम में से कोई उस समय तक वास्तविक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही पसन्द न करे जो वह अपने लिए पसन्द करता है .

इंसानियत के सुनहरे उसूल हैं पैग़म्बर मुहम्मद साहब सल्ल. की शिक्षाएंअल्लाह तआला उस पर रहम नहीं करता जो दूसरों पर रहम नहीं करता है |
तुम में से कोई उस समय तक वास्तविक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही पसन्द न करे जो वह अपने लिए पसन्द करता है .
वह जो पेट भर खाता है जबकि उसका पड़ोसी भूखा रहता है वह मुसलमान नहीं |
सच्चा और ईमानदार व्यापारी ईशदूतों, सदाचारियों, सिद्दीकों और शहीदों के साथ होगा |
ताक़तवर वह नहीं जो दूसरों को पछाड़ दे बल्कि ताक़तवर वह है जो गुस्सा पर क़ाबू पा ले |
अल्लाह तुम्हारे जिस्मों और तुम्हारी सूरतों को नहीं देखता बल्कि वह तुम्हारे दिलों को देखता है |
अल्लाह तुम्हारे तुम्हारी सूरतों और मालों को नहीं देखता बल्कि वह तुम्हारे दिलों और कर्मों को देखता है |

भारत की ताक़त , प्यार ही प्यार बरसा हरिद्वार में

पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी की संस्था गायत्री परिवार की तरफ़ से हमें निमंत्रण मिला। उनके जन्मशताब्दी समारोह में पहुंचे। उनकी कलश यात्रा में भी शामिल हुए। हमारे अलावा दूसरे ज़िलों से भी मुसलमान यहां पहुंचे थे। सबसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। हिंदू मुस्लिम क़रीब आए इस महाकुंभ में। प्यार मुहब्बत की अनोखी मिसाल देखी सभी ने और भारत की ताक़त यही है। आप इसे यूट्यूब पर देख भी सकते हैं http://www.youtube.com/watch?v=thDTEKONqg4&feature=mfu_in_order&list=UL

इस्लामी नए साल को मनाने का तरीका बेवाओं (विधवाओं), बेसहारा लोगों की मदद करना है .

इस्लामी नया साल मुबारक .  दुनिया के हर मजहब या कौम का अपना-अपना नया साल होता है। नए साल से मुराद (आशय) है पुराने साल का खात्मा (समापन) और नए दिन की नई सुबह के साथ नए वक्त की शुरुआत। नए वक्त की शुरुआत ही दरअसल नए साल का आगाज (आरंभ) है।  इस्लामी कैलेंडर में जिलहिज के महीने की आखिरी तारीख को चाँद दिखते ही पुराना साल विदाई के पायदान पर आकर रुखसत हो जाता है और अगले दिन यानी मोहर्रम की पहली तारीख से इस्लामी नया साल शुरू हो जाता है।
नए साल का मतलब इस्लाम मजहब में 'बेवजह का धूमधड़ाका करना या फिजूल खर्च करना या नाच-गानों में वक्त बर्बाद करना नहीं है बल्कि अल्लाह (ईश्वर) की नेमत (वरदान) और फजल (कृपा) की खुशियाँ मनाना है।'
इस्लामी नए साल को मनाने का तरीका यह है कि बेबसों, बेवाओं (विधवाओं), बेसहारा लोगों की मदद करना, जरूरतमंदों और यतीमों (अनाथ बच्चे-बच्चियों) की दिल से सहायता करना और जुबान से चुप रहना यानी सहायता करके प्रचार के ढोल नहीं पीटना, बीमारों, बूढ़ों और अपंगों-अपाहिजों यानी विकलांगों तथा निःशक्तों की मदद करना, बुजुर्गों का सम्मान करना अपना कर्तव्य (फर्ज) पूरी मुस्तैदी और ईमानदारी से …

मुसलमान होकर भी आदमी गिर सकता जहन्नम में

मुसलमानों में मुफ़लिस (दरिद्र) वास्तव में वह है जो दुनिया से जाने के बाद (मरणोपरांत) इस अवस्था में, परलोक में ईश्वर की अदालत में पहुंचा कि उसके पास नमाज़, रोज़ा, हज आदि उपासनाओं के सवाब (पुण्य) का ढेर था। लेकिन साथ ही वह सांसारिक जीवन में किसी पर लांछन लगाकर, किसी का माल अवैध रूप से खाकर किसी को अनुचित मारपीट कर, किसी का चरित्रहनन करके, किसी की हत्या करके आया था। फिर अल्लाह उसकी एक-एक नेकी (पुण्य कार्य का सवाब) प्रभावित लोगों में बांटता जाएगा, यहां तक उसके पास कुछ सवाब बचा न रह गया, और इन्साफ़ अभी भी पूरा न हुआ तो प्रभावित लोगों के गुनाह उस पर डाले जाएंगे। यहां तक कि बिल्कुल ख़ाली-हाथ (दरिद्र) होकर नरक (जहन्नम) में डाल दिया जाएगा।
http://www.islamdharma.org/article.aspx?ptype=A&menuid=15
सो ज़ुल्म से बचो ताकि उसके नुकसान से बच सको.

वह कभी टंकी पर नहीं चढ़ी ...

 क्या बड़ा ब्लॉगर टंकी पर ज़रूर चढता है ? ऐसी मान्यता क्यों बन गई है कि बड़ा ब्लॉगर वही कहला सकता है जो कि टंकी पर चढ  जाए और ज़ोर ज़ोर  से चिल्लाए-'ब्लॉग वालो, तुमसे मेरी ख़ुशी  देखी नहीं जाती, तुम मुझसे जलते हो, मेरी टिप्पणियों से जलते हो, लो मैं चला/चली।'

गर्भाशय कैंसर से बचाते हैं बच्चे !

ऐसी महिलाओं में गर्भाशय कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं जिनके या तो कम बच्चे हैं या फिर बच्चे हैं ही नहीं। वर्तमान में प्रतिवर्ष 7,530 महिलाओं में गर्भाशय कैंसर की पुष्टि होती है जबकि 1975 में यह संख्या 4,175 थी।
समाचार पत्र 'डेली मेल' के मुताबिक चिकित्सकों का कहना है कि महिलाओं का अपने करियर में आगे बढ़ने की वजह से बच्चों को जन्म नहीं देना या कम बच्चों पैदा करना गर्भाशय कैंसर के मामले बढ़ने का मुख्य कारण है।

पूर्वी क़ौमों ने इस्लाम की वजह से कभी मुसलमानों से जंग नहीं लड़ी जो कि पश्चिमी क़ौमें कर रही हैं - डा. असग़र

मज़दूर की मज़दूरी उसके शरीर का पसीना सूखने से पहले दे दो

अल्लाह कहता है कि परलोक में मैं तीन आदमियों का दुश्मन हूंगा। 
एक: जिसने मेरा नाम लेकर (जैसे-‘अल्लाह की क़सम’ खाकर)  किसी से कोई वादा किया, फिर उससे मुकर गया, 
दो: जिसने किसी आज़ाद आदमी को बेचकर उसकी क़ीमत खाई; 
तीन: जिसने मज़दूर से पूरी मेहनत ली और फिर उसे पूरी मज़दूरी न दी।

हदीस-शास्त्र !

ब्लॉग परिषद की तैयारियां कैंसिल कर दी गई हैं, अपना सुझाव अपने पास ही रखें.

क्योंकि पहले ही से जो परिषदें हैं, वे राजनीति का अखाड़ा बनी हुई हैं, सो कोई भी सुझाव हमें चाहिए ही नहीं। अपना सुझाव अपने पास ही रखें।

मछली को ज़िंदा भी निगल सकती हैं हसीनाएं , चित्र सहित ...

मछली को ज़िंदा भी खाते और खिलाते हैं हमारे कुछ भाई-बहन !
देखिए -

Treatment for asthma 
Hundreds and thousands of people jostled in Hyderabad on Monday to swallow medicine stuffed inside live fish .

क्या कांग्रेस ही छीन रही है हिंदुस्तानी मुसलमानों से उनका स्वाभिमान ? या दूसरी पार्टियां भी ऐसा ही कर रही हैं ?

आज यह सवाल वे लोग भी पूछ रहे हैं जो कि ख़ुद भारतीय मुसलमानों के स्वाभिमान पर और उनकी धार्मिक परंपराओं पर चोट करते रहते हैं। इसे कहते हैं घड़ियाली आंसू बहाना। जिनके पास खुद स्वाभिमान नहीं है,  वे भी स्वाभिमान की चिंता करते दिखते हैं और वह भी उन लोगों के स्वाभिमान की जिन्हें वे मांसाहार के कारण विदेश चले जाने का सुझाव देते हैं। पता नहीं ये किसे धोखा देते हैं ?

इनका एजेंडा हिडेन बिलकुल नहीं है ...

सुज्ञ जी ने भी कुर्बानी के विरोध में पोस्ट लगाई है मगर एक फ़र्क़ है.  शिल्पा जी अपने लिए जो अधिकार चाहती हैं  , ठीक वही अधिकार  दूसरे के लिए वह नहीं मानतीं मगर सुज्ञ जी के ब्लॉग पर ऐसा नहीं है,   मुलाहिज़ा कीजिये -

पशु-बलि : प्रतीकात्मक कुरीति पर आधारित हिंसक प्रवृतिhttp://niraamish.blogspot.com/2011/11/mass-animal-sacrifice-on-eid.html

मूंछें हों तो नत्थूलाल जैसी , वरना न हों ,

ठीक ऐसे ही कुर्बानी पर बहस हो तो ऐसी जैसी शिल्पा मेहता जी ने की है .
देखें उनकी पोस्ट :
"कुर्बानी क्या होती है ?
अलबत्ता हमारा कमेन्ट उन्होंने छापा नहीं है.
हमने उसमें कहा था की बकरीद के मौके पर जो लोग अहिंसा का पाखण्ड रचाते हैं खुद पूरे साल मक्खी , मच्छर  और चूहे मारते रहते हैं . शहद भी ये लोग खाते हैं और ...
अंडा मछली भी लुत्फ़ के साथ खाते हैं .
फिर भी ये चिल्लाते हैं.

पहले से ज्यादा मांस खा रहे हैं भारतीय

बदलते वक्त के साथ भारत में खाने में मांस का इस्तेमाल भी बढ़ा है. पहले जहां लोग भैंस या गाय का मांस नहीं खाते थे वहीं अब शौक के लिए भी लोग खा रहे हैं. बड़े रेस्तरां में सूअर और गोमांस मिलने लगा है. धार्मिक मनाही और शाकाहारी संस्कृति के बावजूद भारतीय पहले से अधिक मांस का इस्तेमाल करने लगे हैं. आहार के बदलाव और हाइजीन प्रक्रिया उन्नत होने से ऐसे बदलाव हो रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन यानि एफएओ कहती है कि भारत में मांस की प्रति व्यक्ति खपत 5 से लेकर 5.5 किलोग्राम सालाना हो गई है. रिकॉर्ड संकलन शुरू होने के बाद से यह सबसे उच्चतम है. इससे पता चलता है कि विकासशील देशों में प्रोटीन युक्त आहार की तरफ लोगों का झुकाव हो रहा है.जानकार कहते हैं कि आर्थिक विकास की वजह से तेजी से अमीर हो रहे लोग, देश विदेश यात्रा कर चुके लोगों के कारण से मांस के इस्तेमाल में तेजी आ रही है. मांस के ज्यादा उपयोग होने से रेस्तरां और सुपरमार्केट के पास उपभोक्ताओं को देने के लिए विभिन्न प्रकार के उत्पाद हैं.  वक्त के साथ स्वाद बदला मुंबई के एक मशहूर विदेशी व्यंजन रेस्तरां के जयदीप मुखर्जी कहते हैं, "सं…

लो आ गई ब्लॉगर्स मीट वीकली 17 भी, शुक्रिया प्रेरणा जी का

शाकाहार और मांसाहार पर बहुत सारी पोस्ट के अलावा बच्चों के दिन की मुबारकबाद देते हुए। रंग बिरंगी पोस्ट बहुत सी जानकारी देती हैं। प्रेरणा जी का और सभी लेखकों का शुक्रिया। हमारी ढेर सारी पोस्टें भी यहां दिख रही हैं। एक बार फिर शुक्रिया प्रेरणा जी का। ब्लॉगर्समीट वीकली (17) बाल दिवस की शुभकामनाएं

कुल्टा औरत की पहचान , पहले और अब

एक लाजवाब व्यंग्य 
अच्छी नारी को सुल्टा नहीं कहा जाता तो फिर बुरी नारी को कुल्टा क्यों कहा जाता है ?
इस बात को हम आज तक नहीं जान पाए लेकिन यह बात ज़रूर जानते हैं कि बालों के समूह को लट कहते हैं और यह भी सच है कि मर्द के लिए लट बोला जाता है तो औरत के लिए भी लट और लटें ही बोला जाता है। ऐसा नहीं है कि मर्द के लिए तो लट बोला जाए और औरत के लिए लटा और लटाएं बोला जाता हो।
पुराने ज़माने में अगर कोई औरत कुल्टा पाई जाती थी तो समाज के चौधरी साहब उसकी लटाएं काट दिया करते थे यानि कि उसकी चोटी काट दिया करते थे ताकि उसे दूर से देखते ही सब जान जाएं कि यह औरत कुल्टा है और उससे सदा दूर ही रहें।
इसी महान व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि परंपरागत यौन रोगों के अलावा एड्स जैसे किसी सर्वथा नए यौन रोग दुनिया में चाहे कहीं भी पैदा हुए लेकिन भारत पर ऐसा एक भी इल्ज़ाम नहीं आने पाया।
कुछ कुल्टा औरतों की चोटियां गईं , सो गईं। थोड़ा बहुत मानवाधिकारों का हनन हुआ सो हुआ लेकिन मानव बच गया , मानवता बच गई।
ज़माना बदला तो यह रस्म भी बदल गई।
अब समाज के किसी चौधरी और पंचायत की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। जो औरत कुल्टा होती है, आज वह…

गुलछर्रे मुबारक, कमेंट ऑप्शन बंद बिल्कुल भी नहीं है

कोई देश तीर्थ के लिए मशहूर है दुनिया में और कोई दुनिया की दौलत के लिए.
दौलत के भूखे तीर्थ का देश छोड़कर चले जाते हैं ऐसे देश में जहां वे अपनी आस्थाओं पर प्रहार होते चुपचाप देखते रहते हैं.
वहां गाय काटी जाती है और वे चुप रहते हैं सिर्फ़ माल की ख़ातिर.
वहां बैठकर वे गऊ रक्षा की बातें करते हैं अपने ब्लाग पर केवल उस देश के लोगों के लिए जहां से भागे हुए हैं.
यह है इनकी नैतिकता.
ये गंगा को छोड़कर गए , ये हिमालय को छोड़कर गए, ये अपनी बूढ़ी मां को छोड़कर गए, ये अपने रिश्ते नातों को छोड़कर गए, ये सब कुछ छोड़कर गए सिर्फ़ एक माल की ख़ातिर.
ये अपना ज़मीर कुचल कर विदेश में रहते हैं और फिर भी नैतिकता का उपदेश पिलाते हैं अपने देश के लोगों को.
तुम माल की बातें करो, नैतिकता की बातें हम कर लेंगे.
तुम्हें सीखना हो धर्म और नैतिकता तो हमसे सीखो.
या फिर ख़ामोश ही रहो.
जिस मैदान में तुम्हें कोई तजर्बा ही नहीं है.
उसमें बात क्यों करते हो ?
क्यों विदेशियों के साथ प्यार से रहते हो ?
और देश में हिंदू मुस्लिमों के दरम्यान नफ़रत की आग भड़काते हो ?
जो तीर्थ, गंगा और हिमालय ही छोड़ गया माल के लिए,
उसे हक़ भी क्या है किसी को उ…

क्या आप मूत्र पीने के शौक़ीन हैं ?

मल मूत्र का नाम आते ही आदमी घृणा से नाक भौं सिकोड़ने लगता है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जो कि मूत्र पीते हैं। मूत्र पीने को आजकल बाक़ायदा एक थेरेपी के रूप में भी प्रचारित किया जाता है। मूत्र का सेवन करने वालों में आज केवल अनपढ़ और अंधविश्वासी जनता ही नहीं है बल्कि बहुत से उच्च शिक्षित लोग भी हैं और ऐसे लोग भी हैं जो कि दूसरे समुदाय के लोगों को आए दिन यह समझाते रहते हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए लेकिन खुद कभी अपने पीने पर ध्यान नहीं देते कि वे क्या पी रहे हैं और क्यों पी रहे हैं ? बहरहाल यह दुनिया है और यहां रंग बिरंगे लोग हैं। सबकी अक्ल और सबकी पसंद अलग अलग है। जो लोग पेशाब पीते हैं , उन्हें भला कौन रोक सकता है ? देखिए एक लिंक -
Complete Guide Urine Therapy (Coen Van Der Kroon)  Urine therapy consists of two parts: internal appication (drinking urine) and external application (massaging with urine). Both aspects comple-ment each other and are important for optimal results. The basic principle of urine therapy is therefore quite simple: you drink and massag…

क्या दिव्या जी भारत आएंगी अपने वतन पर शहीद होने के लिए ?

ZEAL: वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हों.... यह आह्वान कर रही हैं डा. दिव्या श्रीवास्तव जी। अच्छी प्रेरणा है। पोस्ट पढ़ने के लिए गए तो देखा कि 39 कमेंट भी हो गए हैं लेकिन किसी ने भी यह नहीं कहा कि वतन की नौजवां तो आप भी हैं, आप भी शहीद होने के लिए अपने वतन आ जाईये न !
इसी का नाम है पर उपदेश कुशल बहुतेरे !! आजकल के नेता लोग इसी तरकीब से काम चला रहे हैं। खुद को बचाए रखेंगे और लोगों से कहेंगे कि ‘चढ़ जा बेटा सूली पर राम भली करेगा‘ लेकिन अब जनता की आंखें कुछ कुछ खुलने लगी हैं। वह चाहती है कि जो शहीद होने की प्रेरणा दे रहा है पहले इस रास्ते पर वह खुद तो चलकर दिखाए !!!
क्या दिव्या जी भारत आएंगी अपने वतन पर शहीद होने के लिए ? इसे हम भी पूछ रहे हैं और आप भी पूछिए . अगर वे नहीं आतीं और खुद थाईलैंड में रहकर विदेशी मुद्रा कमा रही हैं तो दूसरों को भी बताएं कि वे अपना देश छोड़कर कैसे अपना भविष्य बेहतर बना सकते हैं ? जिस काम का उन्हें तजुर्बा है, उस काम की सलाह देना ज़्यादा ठीक है बनिस्बत शहादत की प्रेरणा देने के , कि जो काम उन्होंने न तो किया है और न ही कभी करना है।

त्रिया की बदबूदार पोस्ट

जैसे कि बहादुरी को मर्दानगी और डरकर भाग जाने को बुज़दिली कहा जाता है , ठीक ऐसे ही पति की वफ़ादार औरत को सती और बेवफ़ा को त्रिया कहा जाता है। औरत और मर्द, दोनों में ही दोनों तरह के लोग हमेशा से पाए जाते हैं। ब्लॉगिंग की दुनिया में भी इन्हें देखा जा सकता है।
ब्लॉगिंग किसी भी भाषा में और किसी भी देश में की जा रही हो लेकिन सभी ब्लॉगर अच्छे, सच्चे और नेक नहीं होते।
कुछ लालची और ग़ददार भी होते हैं।
ये लोग अपने ऐब छिपाने के लिए दूसरों पर बेवजह इल्ज़ाम लगाते रहते हैं और इस तरह  उनकी पोस्ट्स से नफ़रत और बदबू फैलती रहती है। जो आदमी अपनी बीवी का और जो औरत अपने शौहर की वफ़ादार नहीं है और ग़ैरों के साथ इश्क़ फ़रमा रहे हैं, इनसे किसी नेकी और सुधार की उम्मीद करना ही बेकार है।
बस इनसे होशियार रहने की ज़रूरत है।
नीचे जिस पोस्ट का लिंक है, वह ऐसी ही किसी त्रिया चरित्र ब्लॉगर की कारस्तानी है , आप देखें और अपनी राय न भी दें तो भी चलेगा।
10 things I hate about India

मैदानी क्षेत्रों में मांस क्यों खाया जाए ?

हिंदू भाई बहनों में कुछ जो शाकाहारी हैं, वे ये सवाल अक्सर पूछते हैं। उनके सवालों का जवाब देती है यह पोस्ट

बौद्धिक बौनेपन का ख़तरा
इसे पढ़कर आपकी  तसल्ली ज़रूर हो जाएगी।

विज्ञान के युग क़ुरबानी पर ऐतराज़ क्यों ?

ZEAL: ईद मुबारक
विज्ञान के युग क़ुरबानी पर ऐतराज़ क्यों ? ब्लॉगर्स मीट वीकली 16में यह शीर्षक देखकर लिंक पर गया तो उन सारे सवालों के जवाब मिल गए जो कि क़ुरबानी और मांसाहार पर अक्सर हिंदू भाई बहनों की तरफ़ से उठाए जाते हैं। पता यह चला कि अज्ञानतावश कुछ लोगों ने यह समझ रखा है कि फल, सब्ज़ी खाना जीव को मारना नहीं है। जबकि ये सभी जीवित होते हैं और इनकी फ़सल को पैदा करने के लिए जो हल खेत में चलाया जाता है उससे भी चूहे, केंचुए और बहुत से जीव मारे जाते हैं और बहुत से कीटनाशक भी फ़सल की रक्षा के लिए छिड़के जाते हैं। ये लोग दूध, दही और शहद भी बेहिचक खाते हैं और मक्खी मच्छर भी मारते रहते हैं और ये सब कुकर्म करने के बाद भी दयालुपने का ढोंग रचाए घूमते रहते हैं। यह बात समझ में नहीं आती कि जब ये पाखंडी लोग ये नहीं चाहते कि कोई इनके धर्म की आलोचना करे तो फिर ये हर साल क़ुरबानी पर फ़िज़ूल के ऐतराज़ क्यों जताते रहते हैं ? अपने दिल में ये लोग जानते हैं कि हमारी इस बकवास से खुद हमारे ही धर्म के सभी लोग सहमत नहीं हैं। इसीलिए ये लोग कमेंट का ऑप्शन भी बंद कर देते हैं ताकि कोई इनकी ग़लत बात को ग़लत भी न कह सके। सच…