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हुस्न ने घर की छत से लेकर चने और गन्ने के खेत तक में जो शोध किया है इश्क़ पर उसका किसी को पता ही नहीं है


शायर की कल्पना यह है कि हुस्न इतना ग़ाफ़िल है कि उसे इश्क का पता ही नहीं है।
लेकिन जब शायर मिलेगा हुस्न से तो उसे पता चलेगा कि उसने हुस्न को कम करके आंका है, हुस्न ने घर की छत से लेकर चने और गन्ने के खेत तक में जो शोध किया है इश्क़ पर उसका किसी को पता ही नहीं है।
ग़ाफ़िल शायर के तौर पर मशहूर हैं देखिए वे क्या कह रहे हैं-



ऐ हुस्न तुझे इश्क़ का पता ही नहीं है।
पेश आया भी जैसे के कुछ हुआ ही नहीं है।।


उसका भी फ़ैसला है याँ दरबारे-हुस्न में,
जिस इश्क़ की कभी कोई ख़ता ही नहीं है।


तड़पे है तेरे ज़ेरे-क़दम इश्क़ बेतरह,
और तू कहे के ये तो कुछ सज़ा ही नहीं है।


ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।
                                                                   -ग़ाफ़िल


असल माखज़ - http://cbmghafil.blogspot.com/2011/09/blog-post.html

Comments

DR. ANWER JAMAL said…
हुस्न की नॉलिज का क्या ख़ूब बयान किया है आपने !

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