Skip to main content

देखिये एक डिज़ायनर पोस्ट , डिज़ायनर ब्लॉगिंग में रामबाण है ‘हनी बी तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (27)

‘हनी बी तकनीक‘ अर्थात मधुमक्खी तकनीक एक सफल तकनीक है जो सदा काम करती है और आपके ब्लॉग तक पाठक खींच लाती है और न सिर्फ़ बहुत से पाठक खींच लाती है बल्कि उन पाठकों को टिप्पणी करने के लिए मजबूर भी करती है।
डिज़ायनर पोस्ट 
ब्लॉगवाणी के जिस ब्लॉग को मैंने सबसे पहले फ़ोलो किया वह डाक्टर टीकाराम जी का था और मुझे आज भी याद है कि मैंने चिठ्ठाजगत पर सबसे पहले जिस ब्लॉग के शीर्षक पर क्लिक किया वह ब्लॉग मिस कंचन का था। उसके बाद मैंने कितने ही ब्लॉग पढ़े और उनसे बहुत कुछ सीखा और गर्व होता है कि हमारे बीच अमीर लाल जी, कबीर लाल जी , नयनसुख जी और मुन्नीबाई जी जैसे हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर मौजूद हैं। मुझे भाई अरबाज़ हुसैन की पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में इन सभी के साथ रू ब रू मिलने का इत्तेफ़ाक़ भी हुआ और वे पल जीवन के अविस्मरणीय पल बन चुके हैं।
मुझे याद है कि जब मुझे इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बुलाया गया तो ठीक उसी दिन हमारा कुत्ता टॉमी बीमार हो गया। जिसका इलाज फ़ॉरेन रिटर्न डाक्टर टेकचंद गोयल जी से कराया जाना बहुत ज़रूरी था। इसका मतलब यह था कि अपनी पज़ेरो तो टॉमी के लिए बुक हो गई और बेटा अपनी स्पोर्ट मोटर साइकिल हमें देगा नहीं। मन मारकर हमें सूमो पर ही समझौता करना पड़ा। हमारी श्रीमति जी ने हमें बहुत शर्म दिलाने की कोशिश की कि हम अपना कार्यक्रम रद्द करके उनके साथ टॉमी को लेकर डाक्टर के पास चलें लेकिन हमें तो उनकी हर बात बस एक ऐसा उपदेश लग रही थी जिसे पूरा करना हमारे बस में नहीं था और सही भी है। इस बात को एक मशहूर लतीफ़े में इस तरह बयान किया गया है

एक दोस्त - यार ग़ज़ल और उपदेश में क्या अंतर है ?
दूसरा दोस्त - शादी से पहले महबूबा की हर बात ग़ज़ल लगती है और शादी के बाद पत्नी की हर बात उपदेश लगने लगती है
पूरी तकनीक और पूरा फ़ायदा पता चलेगा डा. अनवर जमाल साहब के साझा ब्लॉग पर

डिज़ायनर ब्लॉगिंग में रामबाण है ‘हनी बी तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (27)

Comments

Popular posts from this blog

क्या आप सूअर की चर्बी खा रहे हैं ?

बी. एस. पाबला  जी का लेख देख कर मन में यही विचार आया, क्योंकि हम तो लेज़ खाते नहीं हैं और हो सकता है कि दूसरे प्रोडक्ट्स में E 631 हम भी खा रहे हों जो कि हक़ीक़त में सूअर की चर्बी का कोड है . यूरोप और अमेरिका में जा बसे हिन्दू मुसलमान कहाँ तक बच पाते होंगे सूअर की चर्बी से . मुस्लिम देशों में इसे गाय या भेड़ की चर्बी कह प्रचारित किया गया लेकिन इसके हलाल न होने से असंतोष थमा नहीं और इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नींदउड़गई। आखिर उनका 75 प्रतिशत कमाई मारी जा रही थी इन बातों से। हार कर एक राह निकाली गई। अबगुप्तसंकेतोवालीभाषा का उपयोग करने की सोची गई जिसे केवल संबंधित विभाग ही जानें कि यह क्या है! आम उपभोक्ता अनजान रह सब हजम करता रहे। तब जनमहुआ E कोडका
तब से यह E631 पदार्थकईचीजोंमेंउपयोग किया जाने लगा जिसमे मुख्य हैं टूथपेस्ट, शेविंग क्रीम, च्युंग गम, चॉकलेट, मिठाई, बिस्कुट, कोर्न फ्लैक्स, टॉफी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ आदि। सूची में और भी नाम हो सकते हैं। हाँ, कुछ मल्टी-विटामिनकी गोलियों में भी यह पदार्थ होता है। शिशुयों, किशोरों सहित अस्थमा और गठिया के रोगियों को

बवासीर

दोस्तों बवासीर ऐसी बीमारी है जो किसी भी आदमी का रात दिन का चैन सुकून छीन लेता है.....देसी दवाइयों से इसका कामयाब इलाज संभव है यदि परहेज़ ध्यान रखा जाए
............... पाइल्स (बवासीर, अर्श): वात, पित, कफ़ ये तीनो दोष त्वचा, मांस, मेदा को दूषित करके गुदा के अंदर और बाहरी स्थानों मैं मांस के अंकुर (मस्से/फफोले) तैयार करते हैं. इन्ही मांस के अंकुरों को बवासीर या अर्श कहते हैं ! ये मांस के अंकुर गुदामार्ग का अवरोध करते हैं और मलत्याग के समय शत्रु की भांति पीड़ा करते हैं ! इसलिए इनको अर्श भी कहा जाता है. ( चरक) बवासीर का सबसे उत्तम उपचार आयुर्वेद के द्वारा ही किया जा सकता है ! आयुर्वेदिक उपचार एक बहुत ही सुलझा और बिना साइड इफ़ेक्ट का उपचार है ! पाइल्स को पूरी तरह से आयुर्वेदिक तरीके से ही ठीक किया जा सकता है| बाहरी लक्षणों के कारण भेद: बवासीर 2 प्रकार (kind of piles) की होती हैं। एक भीतरी(खूनी) बवासीर तथा दूसरी (बादी) बाहरी बवासीर। भीतरी / ख़ूनी बवासीर / आन्तरिक / रक्‍त स्रावी अर्श / रक्तार्श ख़ूनी बवासीर में मलाशय की आकुंचक पेशी के अन्दर अर्श होता है तो वह म्युकस मेम्ब्रेन (Mucous Membran…

शुक्राणुहीनता NIL SPERM

शुक्राणु की कमी के कारण और निवारण आदमी दिखनें में तन्दरुस्त हो ताकतवर हो लेकिन उसके शुक्राणु अगर दुर्बल हैं तो वो गर्भ धारण नहीं करवा सकते - तो जानें वीर्य में स्वस्थ शुक्राणुओं को बढ़ाने के चंद तरीके - पुरुष के वीर्य में शुक्राणु होते हैं ये शुक्राणु स्त्री के डिम्बाणु को निषेचित कर गर्भ धारण के लिये जिम्मेदार होते हैं - वीर्य में इन शुक्राणुओं की तादाद कम होने को शुक्राणु अल्पता की स्थिति कहा जाता है। शुक्राणु की कमी को ओलिगोस्पर्मिया कहते हैं लेकिन अगर वीर्य में शुक्राणुओं की मौजूदगी ही नहीं है तो इसे एज़ूस्पर्मिया संज्ञा दी जाती है ऐसे पुरुष संतान पैदा करने योग्य नहीं होते हैं। वीर्य में स्वस्थ शुक्राणुओं की तादाद कम होने के निम्न कारण हो सकते हैं-- * वीर्य का दूषित होना * अंडकोष पर गरमी के कारण वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम हो जाती है। ज्यादा तंग अन्डर वियर पहिनने,गरम पानी से स्नान करने, बहुत देर तक गरम पानी के टब में बैठने और मोटापा होने से शुक्राणु अल्पता हो जाती है। * हस्तमैथुन से बार बार वीर्य स्खलित करना * थौडी अवधि में कई बार स्त्री समागम करना * अधिक शारीरिक और मानसिक …