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ब्लॉगर्स मीट वीकली का मरकज़ी ख़याल इस बार क्या था ?

क्या आप जानना चाहेंगे ?
ब्लॉगर्स मीट वीकली में हिंदी ब्लॉग जगत से चुने हुए लोग पहुंचे और आयोजन भी सफल रहा। इस बार जन्माष्टमी की बधाई और शुभकामनाएं ही नज़र आईं।
प्यार मुहब्बत और सुख चैन का माहौल तैयार होते देखकर हमें तो अच्छा लगा और आपको भी लगेगा।

Comments

DR. ANWER JAMAL said…
Wah ...

Nice article .

बुख़ारी साहब का बयान इस्लाम के खि़लाफ़ है
दिल्ली का बुख़ारी ख़ानदान जामा मस्जिद में नमाज़ पढ़ाता है। नमाज़ अदा करना अच्छी बात है लेकिन नमाज़ सिखाती है ख़ुदा के सामने झुक जाना और लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना।
पहले सीनियर बुख़ारी और अब उनके सुपुत्र जी ऐसी बातें कहते हैं जिनसे लोग अगर पहले से भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों तो वे आपस में ही सिर टकराने लगें। इस्लाम के मर्कज़ मस्जिद से जुड़े होने के बाद लोग उनकी बात को भी इस्लामी ही समझने लगते हैं जबकि उनकी बात इस्लाम की शिक्षा के सरासर खि़लाफ़ है और ऐसा वह निजी हित के लिए करते हैं। यह पहले से ही हरेक उस आदमी को पता है जो इस्लाम को जानता है।
लोगों को इस्लाम का पता हो तो इस तरह के भटके हुए लोग क़ौम और बिरादराने वतन को गुमराह नहीं कर पाएंगे।
अन्ना एक अच्छी मुहिम लेकर चल रहे हैं और हम उनके साथ हैं। हम चाहते हैं कि परिवर्तन चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो लेकिन होना चाहिए।
हम कितनी ही कम देर के लिए क्यों न सही लेकिन मिलकर साथ चलना चाहिए।
हम सबका भला इसी में है और जो लोग इसे होते नहीं देखना चाहते वे न हिंदुओं का भला चाहते हैं और न ही मुसलमानों का।
इस तरह के मौक़ों पर ही यह बात पता चलती है कि धर्म की गद्दी पर वे लोग विराजमान हैं जो हमारे सांसदों की ही तरह भ्रष्ट हैं। आश्रमों के साथ मस्जिद और मदरसों में भी भ्रष्टाचार फैलाकर ये लोग बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं।
ये सारे भ्रष्टाचारी एक दूसरे के सगे हैं और एक दूसरे को मदद भी देते हैं।
अहमद बुख़ारी साहब के बयान से यही बात ज़ाहिर होती है।
ब्लॉगर्स मीट वीकली 5 में देखिए आपसी स्नेह और प्यार का माहौल।
DR. ANWER JAMAL said…
एक मुसलमान जिस समय मुसलमान होता है ठीक उसी समय में वह अपने देश का प्रेमी भी होता है। नमाज़ की शुरूआत ही हाथ उठाने से यानि समर्पण की मुद्रा से होती है और उसका ख़ात्मा होता है दायें बायें के लोगों पर और चीज़ों पर सलामती की दुआ करते हुए ‘अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह‘।
इस्लाम और देशप्रेम में पहले और बाद का झगड़ा भी वही लोग खड़ा करते हैं जिन्हें इस्लामी जीवन पद्धति का पता ही नहीं है।
दूसरे लोग इसे राजनीतिक रंग दे देते हैं और बाद में वे कहावतें बनकर पूरे देश में दोहराई जाने लगती हैं।
‘इस्लाम‘ आ अर्थ है एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होना, उसका आज्ञापालन करना और शांति।
अब आप ख़ुद सोचिए कि देश की भलाई करना तो इस्लाम का अनिवार्य अंग है और ऐसा न करे उसे तो इस्लाम ख़ुदा का दुश्मन क़रार देता है।
दूसरे मतों में जहां केवल पूजा पद्धति को ही धर्म मान लिया जाता है और वैध अवैध की शिक्षा या तो दी ही नहीं जाती या दी जाती है तो वह आज देश विरोधी और समाज विरोधी हैं, वहां यह सवाल खड़ा होता है कि जब दोनों टकरायें तो क्या छोड़ा जाए और क्या पकड़ा जाए ?
मिसाल के तौर पर आज भी कुछ मतों में छूतछात मौजूद है, कुछ मतों में आज भी यह विधान है कि दहेज चाहे एक रूपया ही क्यों न दिया जाए लेकिन दिया ज़रूर जाए, इसके बिना विवाह नहीं हो सकता। जबकि क़ानून रोक रहा है। इन मतों को मानने वालों के सामने समस्या आती है कि अपने मतों की रीति का पालन करें या क़ानून का ?
इस्लाम की कोई भी शिक्षा सामाजिक हितों को नुक्सान नहीं पहुंचाती बल्कि उसकी सुरक्षा और सलामती ही इस्लाम में निहित है लेकिन बुख़ारी साहब जैसे लोग उस शिक्षा को सामने आने ही नहीं देते।
मिसाल के तौर पर नस्ल दर नस्ल धर्म गद्दी पर बाप के बाद बेटे के बैठने की परंपरा इस्लाम में नहीं है। इस्लामी ख़लीफ़ा हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु और
हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने बेटों को खि़लाफ़त की गद्दी पर नहीं बैठाया। हज़रत अमीर मुआविया ने अपने बेटे यज़ीद को खि़लाफ़त की गद्दी पर बैठाया और यहीं से इस्लाम की आदर्श परंपरा का हनन होना शुरू हो गया।
बुख़ारी ख़ानदान दावा तो करता है इस्लाम के शुरूआती ख़लीफ़ाओं का अनुयायी होने का और अमल कर रहा है उनके खि़लाफ़ ?
यही बात बताती है कि उन्हें राह दिखाने से पहले ख़ुद भी राह पर आ जाना चाहिए ।
आपको भी हार्दिक शुभकामनायें!

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