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...क्योकि उनका ध्यान इबादत मे कम दिखावे मे ज़्यादा रहता है

रमजान का महीना बङी बरकतो का और नेमतो का है इस महीने मे हमारी नेकियो का अज्र बढा दिया जाता है गुनाह माफ किये जाते है। जिन्दगी गुजारने का खूबसूरत तरीका क्या होना चाहिए इसका भी हमे इसी माह में पता चलता है। रोजा रखने का मतलब सिर्फ भूखा प्यासा रहना नही है, रोजा दीन का एक अहम सतून है और दीन का मतलब है जिन्दगी गुजारने का तरीक़ा रोजा हर आक़िल बालिग़ मुसलमान पर फ़र्ज़ है। जो कोई भी शख़्स बिना किसी वजह के और बिना किसी मजबूरी के रोजा छोङ दे वो गुनाहगार है। रोज़ा सिर्फ खाना पीना छोङना नही बल्कि ज़ुबान को ग़लत और बुरी बातो से रोकना, जैसे ग़ीबत करना (चुग़ल ख़ोरी) गाली गलौच, झूठ से बचना, अपनी आंखो की हिफ़ाज़त, अपने हाथो को लङाई झगङा और ग़लत रास्ते पर चलने से रोकना और अपने दिल से बुराई निकालना रोज़े का ही एक हिस्सा है। क़ुरान-ए-करीम और दूसरी आसमानी किताबे भी रमज़ान के महीने मे ही हम बन्दो को अता की गई। रमदान के महीने मे शुक्र गुज़ार बन्दो और रोज़ेदारो के लिए जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते है। रोज़ा हमे बुराइयो से रोकता है इस महीने मे रोज़ा रखने से सब्र करने बरदाश्त करने की तालीम मिलती है। नमाज़ों की पाबंदी होती है हर वक़्त खाने पीने, ठूस ठूस कर खाने की आदत ख़त्म हो जाती है। हदीस है, (जिसका मफहूम है) कि जिस शख़्स ने ईमान व सवाब की नीयत से रजाए-ए-इलाही के लिए रोज़ा रखा, तो इसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिये जाते है। रमज़ान का महीना ख़ुदा की ख़ास इनायत और रहमतो का महीना है, इसका ख़ास अहतमाम करना चाहिए, अगर किसी मजबूरी की वजह से रोज़ा न रख सके तो सबके सामने खाते पीते मत फिरो। क़ुरान की तिलावत और तरावीह का ख़ास ख़्याल रखा जाए। सदक़ा ख़ैरात करें ग़रीबो यतीमो और मजबूरो की मदद करें, यह जरूरत मन्दो के साथ हमदर्दी का महीना है, फितरा ज़कात (जो सिर्फ इस्लाम ने ही दुनियां की भलाई के लिए अमीरो और मालदारों पर गरीबों की मदद के लिए टैक्स की तरह लगाया है) हिसाब करके पाई पाई अदा करें। अपने माल से पैसे से मदद करें अपने मिज़ाज मे नरमी लाएं, जिस आदमी ने रोज़ा रखकर भी झूठ बोलना नही छोड़ा तो उसका रोज़ा बेकार गया, रोज़े का मक़सद ही ज़िन्दगी को साफ़ सुथरा बनाना है। रोज़े का मतलब कम खाना कम सोना और ज्यादा से ज्यादा इबादत करना है। कुछ लोग जो रमज़ान के रोज़ों से ज़्यादा ईद की ख़रीदारी मे लग जाते है, इन रहमतो बरकतो से दूर हो जाते है क्योकि उनका ध्यान इबादत मे कम दिखावे मे ज़्यादा रहता है, जबकि असल ईद उसकी है जिसने इबादत की और बुरे कामौ से बचा रहा और अपने ख़ुदा को मना लिया। तो दुनियांवी एतबार से ये बरकतो का महीना अल्लाह की तरफ से इबादतों और क़बूलियत का सीज़न है और सीज़न के मौक़े पर भारी छूट का लाभ उठाएं और अपने अल्लाह को मना लें, ताकि हम सब पर अल्लाह रहम करे।
असल माखज़ :- http://www.oppositionnews.com/hindi/hindi/news_detail.php?gid=16&nid=772

Comments

बहुत सटीक बात कही है आपने .शुक्रिया

blog paheli
Dr. Ayaz Ahmad said…
SHUKRIYA...

SHIKHA JI ...
रोजा रखने का मतलब सिर्फ भूखा प्यासा रहना नही है,.....रोज़ा सिर्फ खाना पीना छोङना नही बल्कि ज़ुबान को ग़लत और बुरी बातो से रोकना, जैसे ग़ीबत करना (चुग़ल ख़ोरी) गाली गलौच, झूठ से बचना, अपनी आंखो की हिफ़ाज़त, अपने हाथो को लङाई झगङा और ग़लत रास्ते पर चलने से रोकना और अपने दिल से बुराई निकालना ...... है।

भाई, ये सब चीजें तो कब से रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा बन चुकी हैं। भूख प्यास की आदत भी खूब है। उन के पीछे गुनाह माफी या जन्नत का लालच भी नहीं है। जन्म के पहले औऱ मृत्यु के बाद के जीवन पर विश्वास भी नहीं है। हमें तो बस यही जीवन मिला है। इसी में कुछ अच्छा किया तो यहीं लिखा जाएगा और बुरा किया तो भी। मैं नहीं चाहता कि मरने के बाद मुझे बुरे रुप में याद किया जाए।

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