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इन आयतों से हमने क्या सीखा ?

 सूरए बक़रह की १८६वीं आयत का अनुवाद है :-
 और जब भी मेरे बंदे मेरे बारे में तुमसे पूछें तो (हे पैग़म्बर) कह दो कि मैं समीप (ही) हूं। जब भी कोई पुकारने वाला मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार सुनता हूं। अतः उन्हें भी मेरा निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए और मुझपर ईमान लाना चाहिए ताकि उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो जाए।
एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से पूछा कि ईश्वर हमसे सीमप है कि हम धीमे स्वर में उससे प्रार्थना करें या हमसे दूर है कि हम उसे तेज़ आवाज़ में पुकारें। ईश्वर की ओर से यह आयत उतरी कि ईश्वर, बंदों के समीप है। वह अपने बंदों से इतना समीप है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जैसाकि सूरए क़ाफ़ की १६वीं आयत में कहा गया है कि हम मनुष्य से उसकी गर्दन की रग से भी अधिक समीप हैं।
प्रार्थना के लिए कोई विशेष समय नहीं है। मनुष्य जब भी और जिस अवस्था में चाहे ईश्वर को पुकार सकता है परन्तु रमज़ान का महीना चूंकि प्रार्थना और प्रायश्चित का महीना है अतः प्रार्थना की यह आयत रमज़ान और रोज़े की आयतों के बीच में आई है।
इस छोटी सी आयत में ईश्वर ने सात बार अपने पवित्र अस्तित्व और सात बार अपने बंदों की ओर संकेत किया है ताकि अपने और अपने बंदों के बीच के अति निकट रिश्ते और संबन्ध को दर्शा सके।
आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा ?
ईमान की एक निशानी रोज़ा रखना है। रोज़ा मनुष्य में पापों से बचने की भावना उत्पन्न और उसे सुदृढ़ करता है।
ईश्वरीय आदेशों का पालन स्वयं हमारे लिए आवश्यक है न ये कि ईश्वर को हमारी नमाज़ या रोज़ों की आवश्यकता है।
इस्लाम एक व्यापक धर्म है। उसने प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता और स्थिति के अनुसार उचित क़ानून प्रस्तुत किये हैं। जैसाकि रमज़ान में यात्री, रोगी और वृद्ध का आदेश अन्य लोगों से भिन्न है।
रमज़ान के महीने में रोज़ा रखकर हमें अपनी आत्मा को पाप से पवित्र कर लेना चाहिए तथा अपने हृदय में क़ुरआन के प्रभाव की भूमि प्रशस्त करनी चाहिए।
ईश्वर हमारी प्रार्थना और पुकार को सुनता है तथा हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है अतः हमें भी उससे प्रार्थना करनी चाहिए और केवल उसी के आदेशों का पालन करना चाहिए क्योंकि हमारा मोक्ष व कल्याण उसपर ईमान रखने में ही निहित है।

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