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महीना पाक है रमज़ान का और लोग हैं कि ...


ऐसे ऐसे काम कर रहे हैं जिन्हें देखकर इंसान का सिर झुक जाए। कहां मर गई है इंसानियत ?
मौज-मज़े के चक्कर में पड़कर इंसान मौत को भुला बैठा है। वह भूल गया है कि उसे अपने अमल के बारे में ख़ुदा को जवाब भी देना है। जिस बात को आदमी अपनी नज़र के सामने नहीं रखता उन्हें वह भूल जाता है। रमज़ान का महीना क़ुरआन पढ़ने के लिए ख़ास है। पांच वक्त की नमाज़ के अलावा तरावीह की नमाज़ और तहज्जुद का अहतमाम भी इसीलिए है।
नेट पर भी आज क़ुरआन को हासिल करना आसान है।
जो मुसलमान नेट से जुड़े हैं उनके लिए एक लिंक है, जहां से क़ुरआन कई भाषाओं में मुफ़त पढ़ा जा सकता है। आप भी इसे देखिए और ज़्यादा से ज़्यादा मुसलमानों तक इसे पहुंचायें ताकि सभी लोग अपनी बुरी आदतों से तौबा करके नेक राह पर चलें।
आमीन .

Comments

Sunil Kumar said…
केवल मुसलमान ही क्यों हिन्दू क्यों नहीं बुरी आदतों से तौबा करें , बुरी आदत तो सभी को छोडनी पड़ेगी ............
पाक साफ हो के नमाज पढ़ना चाहिए। पर उन का क्या जो नमाज पढ़ कर पाक होना चाहते हैं?
Dr. Ayaz Ahmad said…
Suneel ji ! बुरी आदतों से सभी को तौबा करनी चाहिए मुसलमान हो या हिन्दू हो या फिर कोई और आपकी बात सही है लेकिन अगर हम यही बात कहते हैं तो हमारे सिर इल्ज़ाम धर दिया जाता है कि आप यहां इस्लाम फैला रहे हो, तब बात खटाई में पड़ जाती है। इसीलिए हमने कहा कि कोई तो सुधरे और सुधार की शुरूआत अपने आप से ही बेहतर होती है।
आपकी बात सही है लेकिन हमने कहने में एहतियात बरती है ताकि दीन की बात में ग़ैर ज़रूरी बातें पैदा होकर झगड़े की और किसी को शिकायत की नौबत न आए।
Dr. Ayaz Ahmad said…
आदमी को पाक साफ़ होकर नमाज़ अदा करनी चाहिए और यह भी सही है कि नमाज़ अदा करने के बाद आदमी पाक होता है। पाक ख़ुदा के सामने पाक जगह खड़ा होकर इंसान जब उसका पाक कलाम सुनता है और उसके मन में बार बार यह पाठ पहुंचता रहता है कि एक दिन उसे मरना है और जब तक जीना है लोगों की तकलीफ़ पर सब्र करते हुए और उनके लिए भलाई की दुआ करते हुए जीना है और अगर उसने इसके खि़लाफ़ किया तो उसका ठिकाना आग होगा, नाम चाहे उसका किसी भी ज़बान में हो तो उसके मन से लालच और नफ़रत का मैल धुलता चला जाता है।
इस तरह नमाज़ आदमी के विचारों को पाक करके उसे अंदर से पाक करती है लेकिन जो ध्यान नहीं देता और कोई नसीहत नहीं लेता वह न तो नमाज़ से पाक होता है और न ही हज से।

बात यह है कि आदमी पाक हो जाए और लोगों के काम आना सीख ले।

आपकी बार बार आमद हमारे हौसले बढ़ा रही है।

क्या इसे कोई बड़ा वैचारिक बदलाव माना जाए ?
बुरी आदत तो सभी को छोडनी पड़ेगी

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