Sunday, August 7, 2011

रचना जी का चुभता हुआ सवाल और हमारा जवाब

हमें डाक्टर अनवर जमाल साहब ने आवाज़ दी कि आओ ब्लॉगर्स मीट वीकली में .
हालांकि फ़ैसला पूरी तरह हमारे हाथ में था लेकिन कुछ आशंकाएं हमारे मन में थीं। इसीलिए हमने बहुत दिनों बाद एक पोस्ट तैयार की।

इस पोस्ट में हमें कुछ सुझाव मिले और रचना जी की तरफ़ से एक ऐतराज़ भी।
डा. दिव्या जी , सुनील कुमार जी और डा. अनवर जमाल साहब की तरफ़ से मिले हुए सुझावों के मद्दे नज़र यह पाया कि हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़े रहना ही ठीक है और अपनी मसरूफ़ियत और वक्त की कमी के पेशे नज़र यह ठीक है कि लिखा कम जाए और पढ़ा ज़्यादा जाए. इसका तरीक़ा यह है कि जो लिंक हमें ब्लॉगर्स भेजते रहते हैं हम उन्हीं को यहां पोस्ट की शक्ल दे दिया करें। इस तरह हमारी सक्रियता भी बनी रहेगी और पुराने लेखों को नए पाठक भी मिलेंगे और हम भी जिन लिंक्स को टाल गए हैं उन्हें अब देख लेंगे .

रचना जी की तरफ़ से एक चुभता हुआ सवाल भी मिला और उनका सवाल बिल्कुल वाजिब है। उन्होंने कहा कि

हिंदी ब्लॉगर्स को जोड़ पाने


is judane sae hotaa kyaa haen is par vimarsh nahin hotaa


kis samajik muddae ko laekar hindi blog samaaj ne kahii apni pehchaan banaii haen

 
रचना जी ! मिलकर क्या होता है ?
न मिलने से मिलना तो बहरहाल बेहतर ही होता है .
आपकी बात सही है कि हिंदी ब्लॉग जगत अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर किसी मुद्दे को मज़बूती से न उठा पाया और आपकी ही तरह हमारे मन में भी ऊहापोह बनी हुई थी . इस कमी को भी मिलजुलकर एक मन और एक राय होकर ही दूर किया जा सकता है न कि एक दूसरे को इल्ज़ाम देकर .

आपके हरेक सही काम में हम आपके साथ हैं।
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता . यह बात हमेशा से ही मशहूर है और बिल्कुल सही है .

इसी बीच उम्मीद जगाती हुई अख़तर ख़ान अकेला साहब की पोस्ट हमारे सामने आई है और हमारे मन से ऊहापोह पूरी तरह ख़त्म हो गई :    

शुक्र है खुदा का आज सपना मेरा पूरा हुआ ,,खुदा बुरी नज़र से बचाए इस सद्भाव की ब्लोगिंग को


हम भले ही कुछ न कर सकें लेकिन प्यार के दो बोल तो बोल ही सकते हैं।
आज मित्रता दिवस है। इस अवसर पर पढें यह पोस्ट

याराना यार का .......

लीजिये ham हो गए  सक्रिय 

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रचना जी का सवाल बहुत वाजिब है। ब्लागरों के मिलने का कोई तो उल्लेखनीय उत्पाद होना चाहिए।

DR. ANWER JAMAL said...

फ्रेंडशिप डे की शुभकामनाये
वकील साहब से सहमत ।
इन जैसे मुददों पर विचार करने के लिए
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आपका स्वागत है।
http://www.hbfint.blogspot.com/

सतीश सक्सेना said...

@ "न मिलने से मिलना तो बहरहाल बेहतर ही होता है".

बेहतर लाइने हैं यह ! हार्दिक शुभकामनायें आपको !!

रचना said...

milnae aur judnae mae antar haen
maene judnae ki baat ki thee milnae ki nahin

prerna argal said...

आपकी पोस्ट "ब्लोगर्स मीट वीकली {३}" के मंच पर शामिल की गई है /आप वहां आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/ हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। कल सोमवार०८/०८/11 को
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित

एस.एम.मासूम said...

ब्लागरों के मिलने का कोई तो उल्लेखनीय उत्पाद होना चाहिए?
.

यह सवाल क्यों? ब्लॉगर मीत का कोई उल्लेखनीय उत्पाद क्या अभी तक दिखा नहीं?
.
यहाँ तो बड़े बड़े धुरंदर जमा हैं जो केवल बेहतरीन लेखों पे ही टिप्पणी करते हैं. :)
बधाई अयाज़ साहब.

Dr. Ayaz Ahmad said...

रचना जी ! आदमी पहले मिलता है और फिर किसी बात पर सहमति हो तो जुड़ता भी है ।
जब दो चार या दस बीस आदमी जुड़ते हैं तो उनमें सबमें कुछ ख़ूबियाँ तो समान होती हैं और कुछ अलग अलग । समान ख़ूबियाँ उन्हें पास लाने का काम करती हैं और तब वे एक दूसरे की उन ख़ूबियों से भी फ़ायदा उठाते हैं जो हरेक में अलग अलग होती हैं और ऐसा अनायास होता है ।
जुड़ने से हमेशा मानवता का हित ही होता है बशर्ते कि नीयत नेक और दिल साफ़ हो ।

आप हमारे इस नज़रिये पर क्या कहना चाहेंगी ?

रचना said...

हम यहाँ केवल ब्लॉग्गिंग की बात कर रहे हैं
प्रश्न हैं क्या ब्लोग्गर जुड़ कर कुछ कर रहे हैं
उत्तर हैं पिछले ५ साल से तो नहीं ऐसा कुछ भी जिस से किसी का भी हित हुआ हो , मौज मस्ती इत्यादि के अलावा
ज्यादा जानने की इच्छा हो और ब्लॉग पढ़े
आगे और क़ोई मंथन इस विषय पर यहाँ करने की क़ोई जरुरत नहीं हैं क्युकी बात अपने ही प्रश्न और मुद्दे से अलग कर रहे हैं आप

रचना said...

हम यहाँ केवल ब्लॉग्गिंग की बात कर रहे हैं
प्रश्न हैं क्या ब्लोग्गर जुड़ कर कुछ कर रहे हैं
उत्तर हैं पिछले ५ साल से तो नहीं ऐसा कुछ भी जिस से किसी का भी हित हुआ हो , मौज मस्ती इत्यादि के अलावा
ज्यादा जानने की इच्छा हो और ब्लॉग पढ़े
आगे और क़ोई मंथन इस विषय पर यहाँ करने की क़ोई जरुरत नहीं हैं क्युकी बात अपने ही प्रश्न और मुद्दे से अलग कर रहे हैं आप

Dr. Ayaz Ahmad said...

रचना जी ! आप एक तालीमयाफ़्ता और सुलझी हुई औरत हैं। आपने दुनिया घूमी है और रस्मों के नाम पर औरतों पर होने वाले अत्याचारों के खि़लाफ़ आवाज़ उठाई है। यह आपने अकेले भी किया है और अपने ब्लॉग पर बहुत सी महिलाओं को साथ जोड़कर भी आपने यह काम किया है।
हो सकता है कि दूसरी नारियों ने और दूसरे मर्दों ने आपसे कम किया हो लेकिन किया दूसरों ने भी है। अपने काम के सामने दूसरों के कामों को नज़रअंदाज़ कर देना ज़ुल्म होगा।
हां, आपकी यह बात सही है कि ज़्यादातर हिंदी ब्लॉगर्स अपना समय एक दूसरे की ऐसी तारीफ़ में गवां रहे हैं जिसे वे ख़ुद जानते हैं कि हम एक दूसरे को टोपी पहना रहे हैं लेकिन उनकी नज़र में ब्लॉगिंग सोशल नेटवर्किंग का ज़रिया भर है। इसके ज़रिये वे अपने घूमने फिरने के अड्डे बढ़ा रहे हैं।
ब्लॉगर्स मीट को गुटबाज़ी और शराब पीने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए भी आपकी चिंता को हम जायज़ मानते हैं और जिस साहस के साथ आपने इस ओर ध्यान दिलाया , हम उसकी भी तारीफ़ करते हैं।

कुछ दूसरे ब्लॉगर्स भी दूसरी तरह के मनोरंजन में लगे हुए हैं।
आपकी यह सोच सराहनीय है कि आप ब्लॉगिंग का प्रयोग मुददों के बारे में जागरूकता लाने में करना चाहती हैं।
हमारा आपसे कोई विरोध नहीं है लेकिन इतनी इल्तेजा ज़रूर है कि नफ़रतों को मिटाने के लिए हम जो कर रहे हैं , औरतों को सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए हम जो कर रहे हैं, आप उसे भी समझने की कोशिश करें।
आपकी मंशा को हम समझें और हमारी सोच को आप समझें और एक दूसरे को सहारा दें तो नारी और बच्चों के लिए और अपने बूढ़ों के लिए हम कुछ ठोस कर सकते हैं।
हम प्रश्न से अलग नहीं हुए हैं।
हमने तो अपना नज़रिया देकर आपसे पूछा है कि अब आप बताएं कि आप क्या सोचती हैं ?

लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

 जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...