Sunday, January 23, 2011

नए दौर में भी भेदभाव की पुरानी मानसिकता क्यों पाले हुए हैं हिंदू बुद्धिजीवी ?

@ श्याम जी ! डा. अनवर जमाल साहब की बात ऐतराज़ जताकर इस सारे बखेड़े की शुरूआत करने वाले आप ही तो हैं जबकि किसी भी मुसलमान ने आपकी पुराण संबंधी पोसट पर आज तक कोई सवाल नहीं किया ?
मुसलमानों की इस उदारता और सभ्यता के बावजूद आप इस्लाम को रिजिड मत बताते हैं ?
शर्म नहीं आती आपको इस्लाम को बदनाम करते हुए ?
Shame on you .
अब पूछे गये सवालों के जवाब दीजिए।
@ हरीश जी ! आपने ऐलान किया था कि अधिकतर मुसलमान बुरे होते हैं और आपने कुछ सवाल भी किए थे जिनमें आपने कुरआन पर और मुसलमानों पर ऐतराज किए थे । उनमें से अक्सर सवालों के जवाब आपको दे दिए गए हैं । अब आप बताएँ कि अभी आपकी शंकाएं दूर हुई हैं या उनमें से कोई अभी बाक़ी है ?
कुरआन और मुसलमान के बारे में अब आपकी क्या राय है ?
इतिहास का वह दौर बताईये जबकि वर्णवादी हिंदुओं ने सबको सुखी और निरोग बनाने का प्रयास किया हो ?
झूठी अफ़वाहें फैलाने से क्या फ़ायदा ?

3 comments:

: केवल राम : said...

हम विचारों का आदान प्रदान करें .....यह झगडे तो बढ़ने से बढ़ते रहेंगे ....

Nek Raushani said...

"और अगर तुम से ये काफ़िर लड़ते तो ज़रूर पीठ दिखा कर भागते, फिर इनको कोई यार मिलता न मदद गार. अल्लाह ने कुफ्फार से यही दस्तूर कर रखा है जो पहले से चला आ रहा है, आप अल्लाह के दस्तूर में कोई रद्दो-बदल नहीं कर सकते."
सूरह अल्फतः - ४८, पारा -२६, आयत (२३)

जंग हदीबिया में मुहम्मद ने मक्का के जाने माने काफिरों को रिहा कर दिया जिसकी वजह से इन्हें मदनी मुसलमानों की मुज़ाहमत का सामना करना पड़ा, बस कि मुहम्मद पर अल्लाह की वह्यियों का दौरा पड़ा और आयात नाज़िल ही.
अल्लाह के दस्तूर के चलते मुस्लमान आज दुन्या में अपना काला मुँह भी दिखने के लायक़ नहीं रह गए, कुफ्फारों की पीठ देखते देखते.

ऐ मज़लूम कौम! क्या ये क़ुरआनी आयतें तुमको नज़र नहीं आतीं जो मुहम्मद की छल-कपट को साफ़ साफ़ पेश करती हैं. ?

अपने पड़ोस पकिस्तान के अवाम की जो हालत हो रही है कि मुल्क छोड़ कर गए हुए लोग आठ आठ आँसू रो रहे हैं, इन्हीं आयतों की बेबरकती है उन पर, क्या इस सच्चाई को तुम समझ नहीं पा रहे हो?

ऐ पढ़े लिखे मुसलमानों!
तुम अपने तालीमी सार्टी फिकेट, डिग्रियाँ और अपनी सनदें फाड़ कर नाली में डाल दो, अगर मुहम्मद की इन वाहियों पर ईमान रखते हो. उनकी बातों में हिमाक़त और जेहालत कूट कूट कर भरी हुई है. या फिर नशे के आलम में बक बकाई हुई बातें.
कुरआन यही है जो तुम्हारे सामने है.
हमारे बुजुर्गो के ज़हनों को कूट कूट कर क़ुरआनी अक़ीदे को भरा गया है, इसे तलवार की ज़ोर पर हमारे पुरखों को पिलाया गया है, जिससे हम कट्टर मुसलमान बन गए. इस कुरआन की असलियत जान कर ही हम नए सिरे से जाग सकते हैं.

सारा सच said...

nice

लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

 जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...