Wednesday, December 14, 2011

ख़ंज़र की क्या मजाल जो इक ज़ख़्म कर सके ? - स्वामी रामतीर्थ

शुभ विचार

लोग जीवन में कर्म को महत्त्व देते हैं, विचार को नहीं। ऐसा सोचने वाले शायद यह नहीं जानते कि विचारों का ही स्थूल रूप होता है कर्म अर्थात् किसी भी कर्म का चेतन-अचेतन रूप से विचार ही कारण होता है। जानाति, इच्छति, यतते—जानता है (विचार करता है), इच्छा करता है फिर प्रयत्न करता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसे आधुनिक मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है। जानना और इच्छा करना विचार के ही पहलू हैं ।

आपने यह भी सुना होगा कि विचारों का ही विस्तार है आपका अतीत, वर्तमान और भविष्य। दूसरे शब्दों में, आज आप जो भी हैं, अपने विचारों के परिमामस्वरूप ही हैं और भविष्य का निर्धारण आपके वर्तमान विचार ही करेंगे। तो फिर उज्ज्वल भविष्य की आकांक्षा करने वाले आप शुभ-विचारों से आपने दिलो-दिमाग को पूरित क्यों नहीं करते।

ख़ंज़र की क्या मजाल जो इक ज़ख़्म कर सके।
तेरा ही है ख़याल कि घायल हुआ है तू।।

स्वामी रामतीर्थ

Monday, December 12, 2011

स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य जी का नायाब वीडियो देखा ब्लॉगर्स मीट वीकली 21 में।


उनका प्रवचन सही बात सामने लाता है।
दूसरे लिंक भी अच्छे हैं और सबसे अच्छा तब लगता है जब हमें अपनी पोस्ट के लिंक भी यहां दिखाई देते हैं। जिसके लिए हम प्रेरणा जी के शुक्रगुज़ार हैं।
ब्लॉगर मीट वीकली सच में ही उम्दा बन पड़ी है। ऐसे आयोजन इंसान के सामने इंसानियत के उसूल रखते हैं और इसमें मंदिर मस्जिद की समस्या सच्चा समाधान भी बताया गया है।

ब्लॉगर्स मीट वीकली (21) Save Girl Child

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  • Monday, December 12, 2011

  • by 
  • prerna argal

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  • Saturday, December 10, 2011

    पत्रकार अडियार को इमरजेंसी के दौर में जेल जाना पड़ा और वहां कुरआन पढ़ने का मौक़ा मिला तो इस्लाम के उसूल सामने आ गए।

    इस्लाम कबूल करने के पहले अब्दुल्लाह अडियार डी.एम.के. के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोली' के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी.एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की।

    जनाब अब्दुल्लाह अडियार महरहूम तमिल भाषा के प्रसिद्ध कवि, प्रत्रकार, उपन्यासकार और पटकथा लेखक थे। उनका जन्म 16 मई 1935 को त्रिरूप्पूर (तमिलनाडु) में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा कोयम्बटूर में हुई। वे नास्तिक थे, लेकिन विभिन्न धर्मों की पुस्तकें पढ़ते रहते थे।

    किसी पत्रकार और साहित्यकार को विभिन्न धर्मों के बारे में भी जानकारी रखनी पड़ती है। जनाब अब्दुल्लाह अडियार अध्ययन के दौरान इस परिणाम पर पहुंचे कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है और मनुष्य के कल्याण की शिक्षा देता है। आखिरकार 6 जून 1987 ई। को वे मद्रास स्थित मामूर मस्जिद गये और इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने के पहले वे डी।एम।के। के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी।एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था।

    जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की। इमरजेंसी के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और काफी प्रताडि़त किया गया। जेल में उन्होंने जनाब यूसुफ अली का कुरआन मजीद का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा और उससे काफी प्रभावित हुए। इस्लाम (इस्लाम जिससे मुझे प्यार है) पुस्तिका लिखी, जिसका बाद में हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, सिन्धी, मलयालम और उर्दू में अनुवाद हुआ। उनकी पत्नी थयममल जो ईसाई थीं, इस पुस्तिका को पढ़कर मुसलमान हो गयीं। इसे पढ़कर उ.प्र. के एक जमीदार 1987 ई. में मुसलमान हो गये। जनाब अब्दुल्लाह अडियार को पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान आमंत्रित किया और विशेष अतिथि के रूप में उनका स्वागत किया। वे प्रखर वक्ता भी थे और इस्लाम पर धाराप्रवाह बोलते थे। उनके ब्रिटेन में अनेक संभाषण हुए, जिनका विषय था हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का पवित्र जीवन। इनके कैसेट उपलब्ध हैं।

    वे तमिलभाषियों के आमंत्रण पर श्रीलंका और सिंगापुर भी गये। 1932 में तमिलनाडु सरकार ने तमिल साहित्य के विशिष्ट पुरस्कार 'कलाईमम्मानीÓ से उन्हें पुरस्कृत किया। इमरजेंसी के बाद उन्होंने 'नीरोतमÓ (पत्रिका) का प्रकाशन किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ। उन्होने नीरोतम प्रकाशन से ही 'तंगागुरूदुनÓ(पत्र� ��का) भी प्रकाशित की। जनाब अडियार इस्लाम को एकमात्र मुक्ति मार्ग के रूप में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने मद्रास में इस्लामिक दावा सेन्टर कायम किया। वे 6 करोड़ तमिल जनता को इस्लाम का संदेश पहुंचाने के लिए एक इस्लामी टी.वी. चैनल की स्थापना हेतु प्रयासरत रहे। 20 सितम्बर 1996 (जुमा के दिन) को कोडम्बकम में उनकी मृत्यु हो गयी।
    (इस्लामिक वेबदुनिया)

    Monday, December 5, 2011

    प्रेरणा जी के हुनर का क़ायल कर गई ब्लागर्स मीट वीकली 20


    ब्लागर्स मीट वीकली 20 में हमारी पोस्ट 
    (भारत की ताक़त, प्यार ही प्यार बरसा हरिद्वार में) को शामिल किया गया है।
    इसके अलावा भी हमारी दीगर पोस्ट वहां देखी जा सकती हैं।
    दूसरे लिंक भी अच्छे हैं।

    ख़ास बात : सर्दियों में आंवले का मुरब्बा, गुलकंद, चंदन का अवलेह, संतुलित मात्रा में मक्खन व मिसरी का सेवन, जौ, परवल, करेला, सेंधा नमक, मुनक्का, पुराना गुड़, सोंठ, अजवायन, लहसुन, अनार, अमलताश, नई मूली, अदरक, सिरका, मधु आदि दिल की सेहत के लिए फायदेमंद हैं । सर्दियां बलकारक व रसायन औषधियों के प्रयोग का सही मौसम है इसलिए प्रतिदिन च्यवनप्राश, अश्वगंधा चूर्ण, नागबला चूर्ण, अर्जुन का चूर्ण आदि का सेवन हृदयरोगियों के लिए बहुत लाभकारी हैं ।

    Wednesday, November 30, 2011

    अजमेर की दरगाह शरीफ - श्रुति अग्रवाल


    दीदार गरीब नवाज की मज़ार का
    श्रुति अग्रवाल 
    दरगाह अजमेर शरीफ...एक ऐसा पाक-शफ्फाक नाम है जिसे सुनने मात्र से ही रूहानी सुकून मिलता है...अभी रमजान का माह चल रहा है...इस माह-ए-मुबारक में हर एक नेकी पर 70 गुना सवाब होता है। रमजानुल मुबारक में अजमेर शरीफ में हजरत ख्वाजा मोईनुद्‍दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह की मजार की जियारत कर दरूर-ओ-फातेहा पढ़ने की चाहत हर ख्वाजा के चाहने वाले की होती है,लेकिन रमजान की मसरूफियत और कुछ दीगर कारणों से सभी के लिए इस माह में अजमेर शरीफ जाना मुमकिन नहीं है। ऐसे सभी लोगों के लिए धर्मयात्रा में हमारी यह प्रस्तुति खास तोहफा है।
    फोटो गैलरी देखने के लिए क्लिक करें-
    दरगाह अजमेर शरीफ का भारत में बड़ा महत्व है। खास बात यह भी है कि ख्वाजा पर हर धर्म के लोगों का विश्वास है। यहाँ आने वाले जायरीन चाहे वे किसी भी मजहब के क्यों न हों, ख्वाजा के दर पर दस्तक देने के बाद उनके जहन में सिर्फ अकीदा ही बाकी रहता है। दरगाह अजमेर डॉट काम चलाने वाले हमीद साहब कहते हैं कि गरीब नवाज का का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि लोग यहाँ खिंचे चले आते हैं। यहाँ आकर लोगों को रूहानी सुकून मिलता है। 


    भारत में इस्लाम के साथ ही सूफी मत की शुरुआत हुई थी। सूफी संत एक ईश्वरवाद पर विश्वास रखते थे...ये सभी धार्मिक आडंबरों से ऊपर अल्लाह को अपना सब कुछ समर्पित कर देते थे। ये धार्मिक सहिष्णुता, उदारवाद, प्रेम और भाईचारे पर बल देते थे। इन्हीं में से एक थे हजरत ख्वाजा मोईनुद्‍दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह। 
    ख्वाजा साहब का जन्म ईरान में हुआ था अपने जीवन के कुछ पड़ाव वहाँ बिताने के बाद वे हिन्दुस्तान आ गए। एक बार बादशाह अकबर ने इनकी दरगाह पर पुत्र प्राप्ति के लिए मन्नत माँगी थी। ख्वाजा साहब की दुआ से बादशाह अकबर को पुत्र की प्राप्ति हुई। खुशी के इस मौके पर ख्वाजा साहब का शुक्रिया अदा करने के लिए अकबर बादशाह ने आमेर से अजमेर शरीफ तक पैदल ख्वाजा के दर पर दस्तक दी थी...
    तारागढ़ पहाड़ी की तलहटी में स्थित दरगाह शरीफ वास्तुकला की दृष्टि से भी बेजोड़ है...यहाँ ईरानी और हिन्दुस्तानी वास्तुकला का सुंदर संगम दिखता है। दरगाह का प्रवेश द्वार और गुंबद बेहद खूबसूरत है। इसका कुछ भाग अकबर ने तो कुछ जहाँगीर ने पूरा करवाया था। माना जाता है कि दरगाह को पक्का करवाने का काम माण्डू के सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी ने करवाया था। दरगाह के अंदर बेहतरीन नक्काशी किया हुआ एक चाँदी का कटघरा है। इस कटघरे के अंदर ख्वाजा साहब की मजार है। यह कटघरा जयपुर के महाराजा राजा जयसिंह ने बनवाया था। दरगाह में एक खूबसूरत महफिल खाना भी है, जहाँ कव्वाल ख्वाजा की शान में कव्वाली गाते हैं। दरगाह के आस-पास कई अन्य ऐतिहासिक इमारतें भी स्थित हैं। 

    धार्मिक सद्‍भाव की मिसाल- धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले लोगों को गरीब नवाज की दरगाह से सबक लेना चाहिए...ख्वाजा के दर पर हिन्दू हों या मुस्लिम या किसी अन्य धर्म को मानने वाले, सभी जियारत करने आते हैं। यहाँ का मुख्य पर्व उर्स कहलाता है जो इस्लाम कैलेंडर के रजब माह की पहली से छठी तारीख तक मनाया जाता है। उर्स की शुरुआत बाबा की मजार पर हिन्दू परिवार द्वारा चादर चढ़ाने के बाद ही होती है

    देग का इतिहास- दरगाह के बरामदे में दो बड़ी देग रखी हुई हैं...इन देगों को बादशाह अकबर और जहाँगीर ने चढ़ाया था। तब से लेकर आज तक इन देगों में काजू, बादाम, पिस्ता, इलायची, केसर के साथ चावल पकाया जाता है और गरीबों में बाँटा जाता है।
    लिंक पर जाएँ - http://hindi.webdunia.com/religion/religiousjourney/articles/0710/06/1071006038_1.htm

    Tuesday, November 29, 2011

    तुम में से कोई उस समय तक वास्तविक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही पसन्द न करे जो वह अपने लिए पसन्द करता है .


    इंसानियत के सुनहरे उसूल हैं पैग़म्बर मुहम्मद साहब सल्ल. की शिक्षाएं

    अल्लाह तआला उस पर रहम नहीं करता जो दूसरों पर रहम नहीं करता है |


    तुम में से कोई उस समय तक वास्तविक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही पसन्द न करे जो वह अपने लिए पसन्द करता है .

    वह जो पेट भर खाता है जबकि उसका पड़ोसी भूखा रहता है वह मुसलमान नहीं |

    सच्चा और ईमानदार व्यापारी ईशदूतों, सदाचारियों, सिद्दीकों और शहीदों के साथ होगा |

    ताक़तवर वह नहीं जो दूसरों को पछाड़ दे बल्कि ताक़तवर वह है जो गुस्सा पर क़ाबू पा ले |

    अल्लाह तुम्हारे जिस्मों और तुम्हारी सूरतों को नहीं देखता बल्कि वह तुम्हारे दिलों को देखता है |

    अल्लाह तुम्हारे तुम्हारी सूरतों और मालों को नहीं देखता बल्कि वह तुम्हारे दिलों और कर्मों को देखता है |

    Monday, November 28, 2011

    भारत की ताक़त , प्यार ही प्यार बरसा हरिद्वार में

    पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी की संस्था गायत्री परिवार की तरफ़ से हमें निमंत्रण मिला।
    उनके जन्मशताब्दी समारोह में पहुंचे। उनकी कलश यात्रा में भी शामिल हुए।
    हमारे अलावा दूसरे ज़िलों से भी मुसलमान यहां पहुंचे थे। सबसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।
    हिंदू मुस्लिम क़रीब आए इस महाकुंभ में।
    प्यार मुहब्बत की अनोखी मिसाल देखी सभी ने और भारत की ताक़त यही है।
    आप इसे यूट्यूब पर देख भी सकते हैं

    Sunday, November 27, 2011

    इस्लामी नए साल को मनाने का तरीका बेवाओं (विधवाओं), बेसहारा लोगों की मदद करना है .

    इस्लामी नया साल मुबारक . 
    दुनिया के हर मजहब या कौम का अपना-अपना नया साल होता है। नए साल से मुराद (आशय) है पुराने साल का खात्मा (समापन) और नए दिन की नई सुबह के साथ नए वक्त की शुरुआत। नए वक्त की शुरुआत ही दरअसल नए साल का आगाज (आरंभ) है। 
    इस्लामी कैलेंडर में जिलहिज के महीने की आखिरी तारीख को चाँद दिखते ही पुराना साल विदाई के पायदान पर आकर रुखसत हो जाता है और अगले दिन यानी मोहर्रम की पहली तारीख से इस्लामी नया साल शुरू हो जाता है।

     नए साल का मतलब इस्लाम मजहब में 'बेवजह का धूमधड़ाका करना या फिजूल खर्च करना या नाच-गानों में वक्त बर्बाद करना नहीं है बल्कि अल्लाह (ईश्वर) की नेमत (वरदान) और फजल (कृपा) की खुशियाँ मनाना है।' 

    इस्लामी नए साल को मनाने का तरीका यह है कि बेबसों, बेवाओं (विधवाओं), बेसहारा लोगों की मदद करना, जरूरतमंदों और यतीमों (अनाथ बच्चे-बच्चियों) की दिल से सहायता करना और जुबान से चुप रहना यानी सहायता करके प्रचार के ढोल नहीं पीटना, बीमारों, बूढ़ों और अपंगों-अपाहिजों यानी विकलांगों तथा निःशक्तों की मदद करना, बुजुर्गों का सम्मान करना अपना कर्तव्य (फर्ज) पूरी मुस्तैदी और ईमानदारी से निभाना। इस्लामी नया साल यानी सब रहें खुशहाल!

    मुसलमान होकर भी आदमी गिर सकता जहन्नम में

     मुसलमानों में मुफ़लिस (दरिद्र) वास्तव में वह है जो दुनिया से जाने के बाद (मरणोपरांत) इस अवस्था में, परलोक में ईश्वर की अदालत में पहुंचा कि उसके पास नमाज़, रोज़ा, हज आदि उपासनाओं के सवाब (पुण्य) का ढेर था। लेकिन साथ ही वह सांसारिक जीवन में किसी पर लांछन लगाकर, किसी का माल अवैध रूप से खाकर किसी को अनुचित मारपीट कर, किसी का चरित्रहनन करके, किसी की हत्या करके आया था। फिर अल्लाह उसकी एक-एक नेकी (पुण्य कार्य का सवाब) प्रभावित लोगों में बांटता जाएगा, यहां तक उसके पास कुछ सवाब बचा न रह गया, और इन्साफ़ अभी भी पूरा न हुआ तो प्रभावित लोगों के गुनाह उस पर डाले जाएंगे। यहां तक कि बिल्कुल ख़ाली-हाथ (दरिद्र) होकर नरक (जहन्नम) में डाल दिया जाएगा।
    http://www.islamdharma.org/article.aspx?ptype=A&menuid=15
    सो ज़ुल्म से बचो ताकि उसके नुकसान से बच सको.

    Saturday, November 26, 2011

    वह कभी टंकी पर नहीं चढ़ी ...


     क्या बड़ा ब्लॉगर टंकी पर ज़रूर चढता है ?

    ऐसी मान्यता क्यों बन गई है कि बड़ा ब्लॉगर वही कहला सकता है जो कि टंकी पर चढ  जाए और ज़ोर ज़ोर  से चिल्लाए-'ब्लॉग वालो, तुमसे मेरी ख़ुशी  देखी नहीं जाती, तुम मुझसे जलते हो, मेरी टिप्पणियों से जलते हो, लो मैं चला/चली।' 

    Friday, November 25, 2011

    गर्भाशय कैंसर से बचाते हैं बच्चे !


    ऐसी महिलाओं में गर्भाशय कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं जिनके या तो कम बच्चे हैं या फिर बच्चे हैं ही नहीं। वर्तमान में प्रतिवर्ष 7,530 महिलाओं में गर्भाशय कैंसर की पुष्टि होती है जबकि 1975 में यह संख्या 4,175 थी।

    समाचार पत्र 'डेली मेल' के मुताबिक चिकित्सकों का कहना है कि महिलाओं का अपने करियर में आगे बढ़ने की वजह से बच्चों को जन्म नहीं देना या कम बच्चों पैदा करना गर्भाशय कैंसर के मामले बढ़ने का मुख्य कारण है।

    Wednesday, November 23, 2011

    मज़दूर की मज़दूरी उसके शरीर का पसीना सूखने से पहले दे दो

    अल्लाह कहता है कि परलोक में मैं तीन आदमियों का दुश्मन हूंगा। 
    एक: जिसने मेरा नाम लेकर (जैसे-‘अल्लाह की क़सम’ खाकर)  किसी से कोई वादा किया, फिर उससे मुकर गया, 
    दो: जिसने किसी आज़ाद आदमी को बेचकर उसकी क़ीमत खाई; 
    तीन: जिसने मज़दूर से पूरी मेहनत ली और फिर उसे पूरी मज़दूरी न दी।

    हदीस-शास्त्र !



    Monday, November 21, 2011

    Sunday, November 20, 2011

    ब्लॉग परिषद की तैयारियां कैंसिल कर दी गई हैं, अपना सुझाव अपने पास ही रखें.


    क्योंकि पहले ही से जो परिषदें हैं, वे राजनीति का अखाड़ा बनी हुई हैं,
    सो कोई भी सुझाव हमें चाहिए ही नहीं।
    अपना सुझाव अपने पास ही रखें।

    मछली को ज़िंदा भी निगल सकती हैं हसीनाएं , चित्र सहित ...


    मछली को ज़िंदा भी खाते और खिलाते हैं हमारे कुछ भाई-बहन !
    देखिए -
    Treatment for asthma, live fish for wonder cure, Thousands swallow

    Treatment for asthma 
     Hundreds and thousands of people jostled in Hyderabad on Monday to swallow medicine stuffed inside live fish .

    Saturday, November 19, 2011

    क्या कांग्रेस ही छीन रही है हिंदुस्तानी मुसलमानों से उनका स्वाभिमान ? या दूसरी पार्टियां भी ऐसा ही कर रही हैं ?


    आज यह सवाल वे लोग भी पूछ रहे हैं जो कि ख़ुद भारतीय मुसलमानों के स्वाभिमान पर और उनकी धार्मिक परंपराओं पर चोट करते रहते हैं।
    इसे कहते हैं घड़ियाली आंसू बहाना।
    जिनके पास खुद स्वाभिमान नहीं है, 
    वे भी स्वाभिमान की चिंता करते दिखते हैं और वह भी उन लोगों के स्वाभिमान की जिन्हें वे मांसाहार के कारण विदेश चले जाने का सुझाव देते हैं।
    पता नहीं ये किसे धोखा देते हैं ?

    Friday, November 18, 2011

    इनका एजेंडा हिडेन बिलकुल नहीं है ...


    सुज्ञ जी ने भी कुर्बानी के विरोध में पोस्ट लगाई है मगर एक फ़र्क़ है. 
    शिल्पा जी अपने लिए जो अधिकार चाहती हैं  , ठीक वही अधिकार  दूसरे के लिए वह नहीं मानतीं मगर सुज्ञ जी के ब्लॉग पर ऐसा नहीं है,  
    मुलाहिज़ा कीजिये -


    पशु-बलि : प्रतीकात्मक कुरीति पर आधारित हिंसक प्रवृति

    http://niraamish.blogspot.com/2011/11/mass-animal-sacrifice-on-eid.html

    Thursday, November 17, 2011

    मूंछें हों तो नत्थूलाल जैसी , वरना न हों ,

    ठीक ऐसे ही कुर्बानी पर बहस हो तो ऐसी जैसी शिल्पा मेहता जी ने की है .
    देखें उनकी पोस्ट :
    "कुर्बानी क्या होती है ?
    अलबत्ता हमारा कमेन्ट उन्होंने छापा नहीं है.
    हमने उसमें कहा था की बकरीद के मौके पर जो लोग अहिंसा का पाखण्ड रचाते हैं खुद पूरे साल मक्खी , मच्छर  और चूहे मारते रहते हैं . शहद भी ये लोग खाते हैं और ...
    अंडा मछली भी लुत्फ़ के साथ खाते हैं .
    फिर भी ये चिल्लाते हैं.

    खाओ अंडा , बजाओ डंडा

    दुश्मनों की कमर पर 
    यह बात हमने कही है इस पोस्ट में

    Balanced diet for Indian soldiers. अँडा खाओ देश बचाओ Ayaz Ahmad

    Tuesday, November 15, 2011

    पहले से ज्यादा मांस खा रहे हैं भारतीय


     

    बदलते वक्त के साथ भारत में खाने में मांस का इस्तेमाल भी बढ़ा है. पहले जहां लोग भैंस या गाय का मांस नहीं खाते थे वहीं अब शौक के लिए भी लोग खा रहे हैं. बड़े रेस्तरां में सूअर और गोमांस मिलने लगा है.

     
    धार्मिक मनाही और शाकाहारी संस्कृति के बावजूद भारतीय पहले से अधिक मांस का इस्तेमाल करने लगे हैं. आहार के बदलाव और हाइजीन प्रक्रिया उन्नत होने से ऐसे बदलाव हो रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन यानि एफएओ कहती है कि भारत में मांस की प्रति व्यक्ति खपत 5 से लेकर 5.5 किलोग्राम सालाना हो गई है.
    रिकॉर्ड संकलन शुरू होने के बाद से यह सबसे उच्चतम है. इससे पता चलता है कि विकासशील देशों में प्रोटीन युक्त आहार की तरफ लोगों का झुकाव हो रहा है.जानकार कहते हैं कि आर्थिक विकास की वजह से तेजी से अमीर हो रहे लोग, देश विदेश यात्रा कर चुके लोगों के कारण से मांस के इस्तेमाल में तेजी आ रही है. मांस के ज्यादा उपयोग होने से रेस्तरां और सुपरमार्केट के पास उपभोक्ताओं को देने के लिए विभिन्न प्रकार के उत्पाद हैं. 
    वक्त के साथ स्वाद बदला
    मुंबई के एक मशहूर विदेशी व्यंजन रेस्तरां के जयदीप मुखर्जी कहते हैं, "संकोच को हटाकर भारतीय अब ज्यादा साहसिक हो रहे हैं. भैंसों और सूअर के मांस का टिक्का लोग पसंद कर रहे हैं." अब यह रेस्तरां ऐसे सप्लायर की तलाश में हैं जो इसके फिनिक्स मिल शॉपिंग मॉल में स्थित रेस्तरां के लिए तीतर, बटेर और बतख का मांस दे सके.
    फूड चेन नेचर्स बास्केट के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित खट्टर कहते हैं, "जहां पहले मांस के उपयोग के लिए माता पिता की मंजूरी चाहिए होती थी, अब पश्चिमी देशों का प्रभाव और उदार दृष्टिकोण की वजह से लोग मांस खाने लगे हैं." खट्टर के मुताबिक मांसाहारी होना अब भोग विलास नहीं रहा. घरेलू मांस उत्पादन में सुधार हुआ है और अब हाइजीन प्रक्रिया होने की वजह से ग्राहकों का विश्वास भी बढ़ा है. एफएओ के मुताबिक भारत में सालाना 1.06 करोड़ टन मांस और मछली का उत्पादन होता है, लेकिन  देश में अभी भी शाकाहारी लोगों की संख्या कहीं अधिक है.
    गाय और सुअर के मांस का चलन बढ़ा   
    देश में कितने शाकाहारी हैं इसका कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है. लेकिन 2006 में द हिंदू अखबार ने देशभर में एक सर्वे कराया. सर्वे से पता चला कि देश की 40 फीसदी आबादी डेयरी उत्पादों और अंडों का इस्तेमाल करती हैं लेकिन मांस का इस्तेमाल नहीं करती. भारत में हिंदू धर्म में गाय की पूजा होती है. इस वजह से भारत के कई राज्यों में गाय के वध पर पाबंदी है. फास्ट फूड विक्रेता मैकडोनाल्ड भारत में बीफ बर्गर नहीं बेचता है.
    यहां तक की हाउसिंग सोसाइटी उन लोगों को मकान किराये पर या नहीं बेचती हैं जो मांसाहारी होते हैं. अमेरिका स्थित खाद्य और कृषि नीति अनुसंधान संस्थान के मुताबिक भारत में दस पहले जहां ब्रॉयलर चिकन की प्रति व्यक्ति खपत करीब 1 किलोग्राम थी वही अब बढ़कर 2.26 किलोग्राम हो गई है. मांस का बड़े पैमाने में मिलना अजय मुखोपाध्याय जैसे लोगों के लिए वारदान साबित हो रहा है. 39 वर्षीय मुखोपाध्याय को बीफ करी बेहद पसंद है.
    मुखोपाध्याय  कहते हैं, "मुझे भुना हुआ गोमांस पसंद है. वह रसदार और लजीज होता है." एशिया के मुकाबले भारत में प्रति व्यक्ति मांस की खपत औसतन कम है. एशिया में औसतन 27 किलोग्राम प्रति व्यक्ति खपत होती है. एफएओ के मुताबिक बाकी दुनिया में हर साल 38 किलोग्राम प्रति व्यक्ति खपत होती है.
    रिपोर्ट:एएफपी/आमिर अंसारी
    संपादन:एस गौड़
    बशुक्रिया -  http://www.dw-world.de/dw/article/0,,15238044,00.html

    आखिरकार हुआ यह कि...

    मैं जिस जहाँ को बदलने की बात करता था
    उसने आख़िर हौले-हौले मुझे बदल डाला



    -हिमांशु मोहन 

    Monday, November 14, 2011

    लो आ गई ब्लॉगर्स मीट वीकली 17 भी, शुक्रिया प्रेरणा जी का


    शाकाहार और मांसाहार पर बहुत सारी पोस्ट के अलावा बच्चों के दिन की मुबारकबाद देते हुए।
    रंग बिरंगी पोस्ट बहुत सी जानकारी देती हैं।
    प्रेरणा जी का और सभी लेखकों का शुक्रिया।
    हमारी ढेर सारी पोस्टें भी यहां दिख रही हैं।
    एक बार फिर शुक्रिया प्रेरणा जी का।

    Sunday, November 13, 2011

    कुल्टा औरत की पहचान , पहले और अब



  • एक लाजवाब व्यंग्य 

  • अच्छी नारी को सुल्टा नहीं कहा जाता तो फिर बुरी नारी को कुल्टा क्यों कहा जाता है ?
    इस बात को हम आज तक नहीं जान पाए लेकिन यह बात ज़रूर जानते हैं कि बालों के समूह को लट कहते हैं और यह भी सच है कि मर्द के लिए लट बोला जाता है तो औरत के लिए भी लट और लटें ही बोला जाता है। ऐसा नहीं है कि मर्द के लिए तो लट बोला जाए और औरत के लिए लटा और लटाएं बोला जाता हो।
    पुराने ज़माने में अगर कोई औरत कुल्टा पाई जाती थी तो समाज के चौधरी साहब उसकी लटाएं काट दिया करते थे यानि कि उसकी चोटी काट दिया करते थे ताकि उसे दूर से देखते ही सब जान जाएं कि यह औरत कुल्टा है और उससे सदा दूर ही रहें।
    इसी महान व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि परंपरागत यौन रोगों के अलावा एड्स जैसे किसी सर्वथा नए यौन रोग दुनिया में चाहे कहीं भी पैदा हुए लेकिन भारत पर ऐसा एक भी इल्ज़ाम नहीं आने पाया।
    कुछ कुल्टा औरतों की चोटियां गईं , सो गईं। थोड़ा बहुत मानवाधिकारों का हनन हुआ सो हुआ लेकिन मानव बच गया , मानवता बच गई।
    ज़माना बदला तो यह रस्म भी बदल गई।
    अब समाज के किसी चौधरी और पंचायत की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। जो औरत कुल्टा होती है, आज वह अपनी चोटी ख़ुद ही काट लेती है।
    पहले औरत चाहती थी कि उसका कुल्टापन छिपा रहे ताकि उसकी इज़्ज़त बची रहे लेकिन आज कुल्टा चाहती है कि लोग उसके कुल्टापन को जान लें क्योंकि आज कुल्टापन उसकी तरक्क़ी में सहायक है न कि रूकावट।
    ... लेकिन यह कोई कंपलसरी रूल नहीं है कि जिसके बाल कटे हों वह कुल्टा ही हो। बहुत सी औरतें अच्छी और शरीफ़ होती हैं लेकिन अपने बाल काट लेती हैं, बस ऐसे ही, एक नए लुक की ख़ातिर।
    ...और यह भी ज़रूरी नहीं है कि जिसके सिर पर चोटी लहरा रही हो वह शरीफ़ ही हो, लंबी चोटी वाली औरत कुल्टा भी हो सकती है।
    आजकल बड़ा कन्फ़्यूझन है, पहले ऐसा नहीं था।
    हमने तो यही पाया है कि मर्दों की ही तरह औरतों में भी अच्छी और बुरी दोनों तरह की ख़सलत पाई जाती है और कौन अच्छी और कौन बुरी है, इसका फ़ैसला आजकल किसी के बाल देखकर बिल्कुल भी न किया जाए।

    आपका क्या ख़याल है ?
    Written By - 
    http://hbfint.blogspot.com/2011/11/blog-post_7253.html

    Saturday, November 12, 2011

    गुलछर्रे मुबारक, कमेंट ऑप्शन बंद बिल्कुल भी नहीं है


    कोई देश तीर्थ के लिए मशहूर है दुनिया में और कोई दुनिया की दौलत के लिए.
    दौलत के भूखे तीर्थ का देश छोड़कर चले जाते हैं ऐसे देश में जहां वे अपनी आस्थाओं पर प्रहार होते चुपचाप देखते रहते हैं.
    वहां गाय काटी जाती है और वे चुप रहते हैं सिर्फ़ माल की ख़ातिर.
    वहां बैठकर वे गऊ रक्षा की बातें करते हैं अपने ब्लाग पर केवल उस देश के लोगों के लिए जहां से भागे हुए हैं.
    यह है इनकी नैतिकता.
    ये गंगा को छोड़कर गए , ये हिमालय को छोड़कर गए, ये अपनी बूढ़ी मां को छोड़कर गए, ये अपने रिश्ते नातों को छोड़कर गए, ये सब कुछ छोड़कर गए सिर्फ़ एक माल की ख़ातिर.
    ये अपना ज़मीर कुचल कर विदेश में रहते हैं और फिर भी नैतिकता का उपदेश पिलाते हैं अपने देश के लोगों को.
    तुम माल की बातें करो, नैतिकता की बातें हम कर लेंगे.
    तुम्हें सीखना हो धर्म और नैतिकता तो हमसे सीखो.
    या फिर ख़ामोश ही रहो.
    जिस मैदान में तुम्हें कोई तजर्बा ही नहीं है.
    उसमें बात क्यों करते हो ?
    क्यों विदेशियों के साथ प्यार से रहते हो ?
    और देश में हिंदू मुस्लिमों के दरम्यान नफ़रत की आग भड़काते हो ?

    जो तीर्थ, गंगा और हिमालय ही छोड़ गया माल के लिए,
    उसे हक़ भी क्या है किसी को उपदेश देने का ?
    कुछ त्याग किया होता तो बोलते हुए अच्छे भी लगते.

    गुलछर्रे मुबारक हों आपको।
    उड़ाओं ख़ूब गुलछर्रे ...

    Thursday, November 10, 2011

    क्या आप मूत्र पीने के शौक़ीन हैं ?


    मल मूत्र का नाम आते ही आदमी घृणा से नाक भौं सिकोड़ने लगता है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जो कि मूत्र पीते हैं।
    मूत्र पीने को आजकल बाक़ायदा एक थेरेपी के रूप में भी प्रचारित किया जाता है।
    मूत्र का सेवन करने वालों में आज केवल अनपढ़ और अंधविश्वासी जनता ही नहीं है बल्कि बहुत से उच्च शिक्षित लोग भी हैं और ऐसे लोग भी हैं जो कि दूसरे समुदाय के लोगों को आए दिन यह समझाते रहते हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए लेकिन खुद कभी अपने पीने पर ध्यान नहीं देते कि वे क्या पी रहे हैं और क्यों पी रहे हैं ?
    बहरहाल यह दुनिया है और यहां रंग बिरंगे लोग हैं।
    सबकी अक्ल और सबकी पसंद अलग अलग है।
    जो लोग पेशाब पीते हैं , उन्हें भला कौन रोक सकता है ?
    देखिए एक लिंक -


    (Coen Van Der Kroon) 
    Urine therapy consists of two parts: internal appication (drinking urine) and external application (massaging with urine). Both aspects comple-ment each other and are important for optimal results. The basic principle of urine therapy is therefore quite simple: you drink and massage yourself with urine. Even so, there are a number of different ways to apply urine therapy. After your initial experiences, you will be able to determine. Throughout the civilized world, blood and blood products are used in the medical world without evoking the repugnance associated with urine. We often use prepacked cells, plasma, white blood cells and countless other blood components. Urine is nothing other than a blood product. 

    क्या दिव्या जी भारत आएंगी अपने वतन पर शहीद होने के लिए ?

    यह आह्वान कर रही हैं डा. दिव्या श्रीवास्तव जी।
    अच्छी प्रेरणा है।
    पोस्ट पढ़ने के लिए गए तो देखा कि 39 कमेंट भी हो गए हैं लेकिन किसी ने भी यह नहीं कहा कि वतन की नौजवां तो आप भी हैं, आप भी शहीद होने के लिए अपने वतन आ जाईये न !

    इसी का नाम है पर उपदेश कुशल बहुतेरे !!
    आजकल के नेता लोग इसी तरकीब से काम चला रहे हैं।
    खुद को बचाए रखेंगे और लोगों से कहेंगे कि ‘चढ़ जा बेटा सूली पर राम भली करेगा‘
    लेकिन अब जनता की आंखें कुछ कुछ खुलने लगी हैं।
    वह चाहती है कि जो शहीद होने की प्रेरणा दे रहा है पहले इस रास्ते पर वह खुद तो चलकर दिखाए !!!

    क्या दिव्या जी भारत आएंगी अपने वतन पर शहीद होने के लिए ?
    इसे हम भी पूछ रहे हैं और आप भी पूछिए .
    अगर वे नहीं आतीं और खुद थाईलैंड में रहकर विदेशी मुद्रा कमा रही हैं तो दूसरों को भी बताएं कि वे अपना देश छोड़कर कैसे अपना भविष्य बेहतर बना सकते हैं ?
    जिस काम का उन्हें तजुर्बा है, उस काम की सलाह देना ज़्यादा ठीक है बनिस्बत शहादत की प्रेरणा देने के , कि जो काम उन्होंने न तो किया है और न ही कभी करना है।

    Wednesday, November 9, 2011

    त्रिया की बदबूदार पोस्ट


    जैसे कि बहादुरी को मर्दानगी और डरकर भाग जाने को बुज़दिली कहा जाता है , ठीक ऐसे ही पति की वफ़ादार औरत को सती और बेवफ़ा को त्रिया कहा जाता है। औरत और मर्द, दोनों में ही दोनों तरह के लोग हमेशा से पाए जाते हैं। ब्लॉगिंग की दुनिया में भी इन्हें देखा जा सकता है।
    ब्लॉगिंग किसी भी भाषा में और किसी भी देश में की जा रही हो लेकिन सभी ब्लॉगर अच्छे, सच्चे और नेक नहीं होते।
    कुछ लालची और ग़ददार भी होते हैं।
    ये लोग अपने ऐब छिपाने के लिए दूसरों पर बेवजह इल्ज़ाम लगाते रहते हैं और इस तरह  उनकी पोस्ट्स से नफ़रत और बदबू फैलती रहती है।
    जो आदमी अपनी बीवी का और जो औरत अपने शौहर की वफ़ादार नहीं है और ग़ैरों के साथ इश्क़ फ़रमा रहे हैं, इनसे किसी नेकी और सुधार की उम्मीद करना ही बेकार है।
    बस इनसे होशियार रहने की ज़रूरत है।
    नीचे जिस पोस्ट का लिंक है, वह ऐसी ही किसी त्रिया चरित्र ब्लॉगर की कारस्तानी है , आप देखें और अपनी राय न भी दें तो भी चलेगा।
    10 things I hate about India

    मैदानी क्षेत्रों में मांस क्यों खाया जाए ?


    हिंदू भाई बहनों में कुछ जो शाकाहारी हैं, वे ये सवाल अक्सर पूछते हैं। उनके सवालों का जवाब देती है यह पोस्ट

    बौद्धिक बौनेपन का ख़तरा 


    इसे पढ़कर आपकी  तसल्ली ज़रूर हो जाएगी।

    Tuesday, November 8, 2011

    विज्ञान के युग क़ुरबानी पर ऐतराज़ क्यों ?

    ZEAL: ईद मुबारक
    विज्ञान के युग क़ुरबानी पर ऐतराज़ क्यों ?
    ब्लॉगर्स मीट वीकली 16 में यह शीर्षक देखकर लिंक पर गया तो उन सारे सवालों के जवाब मिल गए जो कि क़ुरबानी और मांसाहार पर अक्सर हिंदू भाई बहनों की तरफ़ से उठाए जाते हैं।
    पता यह चला कि अज्ञानतावश कुछ लोगों ने यह समझ रखा है कि फल, सब्ज़ी खाना जीव को मारना नहीं है। जबकि ये सभी जीवित होते हैं और इनकी फ़सल को पैदा करने के लिए जो हल खेत में चलाया जाता है उससे भी चूहे, केंचुए और बहुत से जीव मारे जाते हैं और बहुत से कीटनाशक भी फ़सल की रक्षा के लिए छिड़के जाते हैं।
    ये लोग दूध, दही और शहद भी बेहिचक खाते हैं और मक्खी मच्छर भी मारते रहते हैं और ये सब कुकर्म करने के बाद भी दयालुपने का ढोंग रचाए घूमते रहते हैं।
    यह बात समझ में नहीं आती कि जब ये पाखंडी लोग ये नहीं चाहते कि कोई इनके धर्म की आलोचना करे तो फिर ये हर साल क़ुरबानी पर फ़िज़ूल के ऐतराज़ क्यों जताते रहते हैं ?
    अपने दिल में ये लोग जानते हैं कि हमारी इस बकवास से खुद हमारे ही धर्म के सभी लोग सहमत नहीं हैं। इसीलिए ये लोग कमेंट का ऑप्शन भी बंद कर देते हैं ताकि कोई इनकी ग़लत बात को ग़लत भी न कह सके।
    सचमुच यह लेख बहुत अच्छा है,

    Saturday, October 29, 2011

    हमारी वाणी को नफ़रत फैलाने वाली ऐसी पोस्ट को प्रकाशित नहीं करना चाहिए

    ZEAL: 'लाश' खाने के शौक़ीन हैं आप ?
    कायस्थों में मांसाहार प्रचलित है, कुछ नहीं भी खाते होंगे जैसे कि डा. दिव्या नहीं खातीं लेकिन उन्होंने मांसाहारियों को राक्षस और दरिंदा घोषित कर दिया और इस सिलसिले में उन्होंने राष्ट्रभक्तों तक को नहीं बख्शा।
    संसद भवन के रेस्टोरेंट में गोरक्षकों को भी मांसाहार करते देखा जा सकता है।
    उन्होंने बक़र ईद पर कुरबानी की भी निंदा कर डाली।
    हमारी वाणी का दावा है वह किसी भी धर्म की निंदा वाली पोस्ट प्रकाशित नहीं करेगी लेकिन उसने डा. दिव्या की पोस्ट को प्रकाशित किया और उसे सादर अपनी हॉट लिस्ट में जगह भी दी।
    यह ग़लत बात है।
    जो लोग खुद न घर के हैं और न घाट के हैं, मोटा माल कमाने के लालच में विदेश भागे हुए ये खुदग़र्ज़ लोग अब लोगों को बता रहे हैं कि मांसाहार करने वाले वाले दरिंदे और राक्षस हैं।
    उनका यह कथन निंदनीय है।
    हमारी वाणी को नफ़रत फैलाने वाली ऐसी पोस्ट को प्रकाशित नहीं करना चाहिए।

    जो हमारे देशभक्तों को राक्षस और दरिंदा कहे, वह कहीं खुद ही ग़ददार या दिमाग़ी दिवालिया तो नहीं है ?


    यह सच है कि हैदर अली, टीपू सुल्तान, बहादुर शाह ज़फ़र, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद, सरहदी गांधी खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान और कर्नल शाहनवाज़ जैसे बहुत से लोगों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और ये सब मांसाहारी थे। आज़ादी की हिफ़ाज़त की ख़ातिर आज भी हमारे जो जांबांज़ लोग सरहदों पर
    खड़े हैं, उनमें भी अधिकतर मांसाहारी ही हैं। 
    देशवासियों में भी अधिकतर लोग मांसाहारी हैं और समुद्र किनारे जितने भी प्रदेश हैं, उनके निवासियों का मुख्य भोजन भी मछली आदि जलीय जीव हैं।
    जो कोई मांसाहारियों को राक्षस और दरिंदा कहता है, वह वतन के शहीदों और रखवालों को और अधिकतर भारतीयों को राक्षस और दरिंदा कहता है और ऐसे आदमी के ग़ददार होने में कुछ शक नहीं है या फिर वह जाहिल और पागल है।
    ऐसा कुछ नहीं है तो फिर मनोरोगी तो वह है ही।
    इस विषय पर पूरी संतुष्टि देता हुआ एक ब्लॉग :

    Monday, October 24, 2011

    क्या आत्महत्या करके मरने वाले लोगों की जान की कोई क़ीमत ही नहीं है ?


    हिन्दी ब्लोगर्स फ़ोरम इंटरनेश्नल  पर जमा किए गए लिंक्स हमेशा दिलो दिमाग़ को कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
    आत्महत्या करके मरने वाले लोगों की तादाद उनसे ज़्यादा है जो कि विदेशी आतंकवादियों का निशाना बनकर मरते हैं।
    इसके बावजूद इन पर न तो कोई ध्यान देता है और न ही इन्हें बचाने के लिए कोई योजना ही बनाई जाती है।
    क्या इनकी जान की कोई क़ीमत ही नहीं है ?
    देखिये -

    Saturday, October 22, 2011

    अपने समाज के अच्छे लोगों को परेशान मत करो


    किरण बेदी जी बिज़नेस क्लास का टिकट लेकर इकॉनॉमी क्लास में सफ़र कर रही हैं तो इससे देश की अर्थव्यवस्था पर क्या बुरा असर पड़ा ?
    अगर वह कुछ रक़म बचा कर इसे ज़रूरतमंदों को दे रही हैं तो यह एक तारीफ़ के लायक़ बात है।
    भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने वालों को इतना मत सताओ कि इस देश में कोई भी सही बात के लिए आवाज़ उठाना ही छोड़ दे।
    छोटी छोटी बातों को तूल वे लोग दे रहे हैं जो देश का माल हड़प किये बैठे हैं।
    इनकी चालबाज़ी से सावधान रहना चाहिए।
    अन्ना के मददगारों को तोड़ने की साज़िश के तहत यह सब हो रहा है।

    Thursday, October 13, 2011

    नैतिक समाज का निर्माण बाजार नहीं कर सकता


    ऐसे ही घूमते हुए 'गोपाल सिंह चैहान' के लेख पर नज़र पड़ गयी ,
    आप भी देखिये और बताइए कि कैसा है यह लेख ?
    http://www.commutiny.in/mediafeatures/media

    मीडिया साक्षरता: एक नई उम्मीद

    इस देश के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि आज के दौर में हम सभी 'नॉलेज सोसायटी' का हिस्सा हैं, जिसमें ज्ञान के एक बड़े हिस्से को समाज के सभी वर्गों तक पंहुचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मीडिया के कंधे पर है। लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में भी मीडिया से इस तरह के योगदान की अपेक्षा पहले भी थी और आज भी है। किसी भी नैतिक समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि उसका आधार एक सही ज्ञान की जड़ों से जुड़ा हो। यूनेस्को की एक रिपोर्ट "The World Ahead: Our Future in the Making", में यह साफ रेखांकित किया गया है कि किसी भी नैतिक समाज का निर्माण बाजार नहीं कर सकता।
    यह अलग बात है कि यदि आज हम पहले से अधिक एक असमान समाज की सच्चाई में जी रहे हैं तो इसकी जिम्मेदारी बाजार के अलावा मीडिया के ऊपर भी है। उदारीकरण की प्रेरणा से भारत में पिछले कुछ सालों से उपजी 'सूचना क्रांति' की सबसे सफल संतान 'मीडिया' ने सभी ज्ञान परंपराओं को पछाड़ते हुए समाज की शिक्षा की दिशाओं को एक नये ढर्रे में मोड़ दिया। समाचार, दृश्य और विश्लेषण की त्रिआयामी जकड़ आज हर आदमी को यह जानने के लिए मजबूर कर रही है कि देश और विश्व में इस समय क्या चल रहा है। घटनाएं व्यक्तियों से ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगी हैं। धीरे-धीरे पैसे की बेशुमार आवक से इसमें फैशन, ब्यूटी, अपराध, हत्याएं इस कदर शामिल होती गयीं जहां से सच्चाई और नैतिकता का विचार ही एक अपराध बोध की तरह लगता है। उसने ज्ञान का हिस्सा बनने से कहीं ज्यादा बाजार का हिस्सा बनना पसंद किया। यही कारण है कि आज स्कूली या अन्य औपचारिक, अनौपचारिक शिक्षा माध्यमों से जुड़े चितंक, लेखक, विश्लेषक या नीति निर्देशक 'मीडिया साक्षरता' को पाठ्यक्रम का आवश्यक अंग मानने लगे हैं। वो इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस देश में पढ़ने वाले छात्र यह समझें कि समाज और संस्कृति की चेतना में मीडिया आज क्या भूमिका निभा रहा है।
    'मीडिया साक्षरता' इस देश के लिए एक नयी अवधारणा है। लेकिन विश्व के कई हिस्सों में विशेषकर विकसित राष्ट्रों में बहुत सालों से इसको लेकर प्रयोग किये जा रहे हैं। भारत में 'मीडिया साक्षरता' पर कितना काम हुआ है और इसके क्या परिणाम दिखाई दे रहे हैं, अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर देखा जा सकता है कि एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) के अलावा अन्य संस्थाओं, स्कूलों के अलावा बड़ी संख्या में अध्यापकों और शिक्षा-शोध से जुड़े लोग इसको लेकर काफी गंभीर हैं।

    Monday, October 10, 2011

    शेखचिल्ली का बाप कौन है भाई ?

    ताऊ रामपुरिया की तरह ही कोई साहब शेखचिल्ली का बाप बने हुए घूम रहे हैं ब्लॉग संसार में .
    उन पर हमारी नज़र पड़ी ब्लॉगर्स मीट वीकली में, वहां हम अभी गए थे टिपण्णी करने तो देखा कि वह भी कुछ कह रहे हैं .
    खैर , हमने कहा कि :-
    @ प्रेरणा जी , यह सच है कि आपका लिंक्स को पसंद करना और उन्हें पेश करना दोनों ही काम निहायत सलीक़े का निशान हैं .
    यह मंच ऐसे ही ऊंचाईयां छुए, यही दुआ है.
    दिलों को जोड़ने की यह मुहिम बहुत मुबारक है और रूपचंद शास्त्री जी और अनवर जमाल साहब की मेहनत भी काबिल ए तारीफ़ है,

    शुक्रिया .
    October 10, 2011 8:21 PM 

    ब्लॉगर्स मीट वीकली (12) Tajmahal

    Posted on
  • Monday, October 10, 2011

  • by
  • DR. ANWER JAMAL

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  • Saturday, October 8, 2011

    लोग आलोचनात्मक टिप्पणियों को पचा नहीं पाते

    यह बात सही है 
     लोग आलोचनात्मक टिप्पणियों को पचा नहीं पाते है अक्सर उन्हें या तो प्रकाशित नहीं किया जाता या फिर हटा दिया जाता है | कई बार तो लोग आलोचनात्मक टिप्पणी करने वाले को ही भला बुरा कहने लगते है | किंतु क्या कभी किसी ने इस बात पर भी ध्यान दिया है की आलोचना है किस बला का नाम क्योंकि यहाँ तो यदि कोई आप की बात से असहमत हो जाये या आप की विचारों के विपरीत विचार रख दे,  जो उसके अपने है तो लोग उसे भी अपनी आलोचना के तौर पर देखने लगते है , जबकि वास्तव में कई बार ऐसा नहीं होता है है कि दूसरा ब्लॉगर आप को कोई टिप्पणी दे रहा है जो आप के विचारों से मेल नहीं खा रहा है तो वो आप की आलोचना ही करना चाह रहा है | कई बार इसका कारण ये होता है की वो बस उस विषय में अपने विचार रख रहा है जो संभव है की आप के सोच से मेल न खाता हो , कई बार सिक्के का दूसरा पहलू भी दिखाने का प्रयास किया जाता है | 
    शुक्रिया मैंगो पीपुल 
    http://mangopeople-anshu.blogspot.com/2011/10/mangopeople_07.html

    लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

     जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...