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What should be man's food ? शाकाहार के लिए जीव हत्या क्यो ? Ayaz Ahmad

sugh जी शाकाहार के लिए खेतों मे उपजाए अन्न के लिए क्या जीवों की हत्या करना ठीक है या गलत ? खेतों बीज डालने से लेकर फसल काटने तक कितने जीवों की हत्या होती है इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है । खेतों मे जब हल चलाया जाता है कितने जीव मरते है, उसके बाद कीटनाशक के प्रयोग से कितने जीवों को मार दिया जाता है फसलो को बचाने के नाम पर कितनी नीलगाय मार दी जाती है या क्रूरता से घायल कर दी जाती है । क्या इन सब संसाधनों पर इन जीवों का भी हक नही है फिर इन्हे अधिकार के बजाए अकाल मौत क्यो मिलती है? गाय के दूध पर किसका अधिकार है ? एक माँ के दूध पर उसके बच्चे का अधिकार होता है या किसी और का ?फिर शाकाहार के नाम पर मनुष्य उस बच्चे के हिस्सा पी जाता है क्या यह जीवों के प्रति हिंसा नही है ? माँ के दूध के अभाव मे जैसे मनुष्य का बच्चा बीमार होकर कमज़ोर हो जाता है और सारी उम्र पनप नही पाता क्या पशुओं के बच्चों के साथ यह स्थिति नही होती ? फिर शाकाहार के नाम पर यह दोहरा पैमाना क्यों ? आप क्यो उन बछड़ोँ के लिए संघर्ष नही करते और उन दूसरे जीवों के लिए संघर्ष नही करते जो खेती के नाम पर मार दिए जाते है और जो फसलों को बोनेँ और ढोने मे पशुओं का प्रयोग किया जाता है क्या वह उनके प्रति हिंसा नही है ? शाकाहार के लिए मारे जाने वाले जीवों के न्यूनतम पैमाना क्या होना चाहिए और इनकी हत्या कम हो इसकी विधि क्या होनी चाहिए ? ये की समस्या पूरे विश्व की है इसलिए इसका हल भी ऐसा होना चाहिए जो पूरे विश्व पर लागू हो सके ऐसा हल न हो जो सिर्फ मैदानों मे लागू हो सके और पहाड़ी स्थानों पर लागू न किया जा सके ।

Comments

Anonymous said…
NICE
Ghulam Kundanam said…
इन्सान से गलतियाँ होती है, इसका मतलब यह नहीं है कि हम जानबूझ कर गलतियाँ करें. पूर्ण अहिंसा का पालन संभव नहीं है. जहाँ तक संभव हो हमें अधिक से अधिक अहिंसा का पालन करना चाहिए.

-ग़ुलाम कुन्दनम,
सिटिज़न ऑफ़ आजाद हिंद देश (पाकिस्तान+इंडिया+बंगलादेश)
http://www.facebook.com/photos.php?id=100001040727520#!/profile.php?id=100001040727520
DR. ANWER JAMAL said…
धर्म के नाम पर चल रहे आडम्बर से घबराकर ईश्वर और धर्म से किनारा करना ठीक नहीं है। धर्म का उसके वास्तविक रूप में बोध कीजिये। इससे प्रेम उत्पन्न होगा, सारा जग आपको अपना नज़र आएगा। तब आपको न तो जीवन का मोह होगा और न ही मौत का भय। तब आप अविनाशी ईश्वर के सामीप्य को अनुभव करेंगे, सच्ची शांति का आपको अनुभव होगा, जिसे आपसे कोई नहीं छीन सकता। नफ़रतों ने अगर सरहदें खींची हैं तो आपकी मुहब्बत उन्हें गिरा देगी। राजनीति ने आज तक जितनी सरहदें खींची हैं उनकी उम्रें कभी लम्बी नहीं हुई हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश की सरहदें भी स्थायी नहीं हैं। इन्हें गिराने के लिए तो मुहब्बत का सिर्फ़ एक धक्का ही काफ़ी है। दुनिया के कई देशों में ऐसा हो भी चुका है। हमें अपनी नफ़रतों को जीतना होगा। नफ़रत एक शैतानी अमल है और मालिक के पाक नाम से शैतान दूर भागता है। सबका मालिक एक है और सबके लिये उसकी नीति भी एक ही है। एक मालिक का नाम करेगा इस बिखरी हुई मानव जाति को एक।
एकता में ही शक्ति है और शक्ति से ही नेतृत्व है। एशिया के हिन्दू-मुस्लिमों की एकता उन्हें विश्व का सिरमौर बनाएगी। अब न राजनीति से और न ही कूटनीति से बल्कि भारत का उद्धार होगा धर्मनीति से। इसके लिये परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण पहनी शर्त है।
http://vedquran.blogspot.com/2010/08/submission-to-god-for-salvation-anwer.html
DR. ANWER JAMAL said…
परमेश्वर हरेक को हर हाल में देख रहा है और वह उसे उसके किये कर्मों का फल अवश्य ही देगा, यह विचार आदमी को बुराई से बचाता है और अच्छा नागरिक बनाता है। इस विचार के कारण आदमी न सिर्फ़ सबके सामने बुराई करने से बचता है बल्कि तन्हाई में भी पाप नहीं करता, जुर्म नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि कोई देखने वाला आदमी चाहे न हो लेकिन वह परमेश्वर उसे यहां भी देख रहा है।
DR. ANWER JAMAL said…
इनसान जो कुछ करता है या तो वह ईश्वर के आदेश से करता है या फिर अपने मन की इच्छा से। जो आदमी ईश्वर को नहीं मानता, वह उसके आदेश को भी नहीं मानता। ऐसा आदमी जो कुछ करता है अपने मन-बुद्धि के आधार पर करता है। जिस काम को वह लाभकारी समझता है करता है और जिसे कष्टकारी मानता है उसे नहीं करता। वह हानि-लाभ के आधार पर अपना सही-ग़लत तय करता है और इस तरह समाज में हर आदमी का सही-ग़लत एक दूसरे से अलग हो जाता है।
1.ईश्वर और परलोक को न मानने वाले व्यक्ति ने दुनिया में जब कोई काम ईश्वर के आदेश से किया ही नहीं तो उसे ईश्वर से कोई पुरस्कार मिलने का औचित्य ही क्या है ?
2.समस्त ब्रह्माण्ड ईश्वर का राज्य है वह अकेला इसका स्वामी है। किसी के राज्य में रहते हुए उस राज्य के राजा को न मानना बग़ावत है और बग़ावत ऐसा संगीन जुर्म है जो हरेक नेकी को खा जाता है। क्या एक बाग़ी सख्त सज़ा का हक़दार नहीं होता ?
3.आदमी जिस बात को अच्छा समझ रहा है, ज़रूरी नहीं कि वह बात वास्तव में अच्छी हो। अच्छा वह है जिसे परमेश्वर अच्छा निश्चित करे। अपने मन से किसी चीज़ को अच्छा समझ लेना और उसे पूरा करना ‘वासना‘ कहलाता है। ईश्वर के आदेश से कटने के बाद इनसान का हरेक काम वासना मात्र बनकर रह जाता है। क्या वासनापूर्ति भी कभी कल्याणकारी होती है भला ?
DR. ANWER JAMAL said…
मैदानी क्षेत्र का कोई दार्शनिक केवल मैदान वालों की ज़रूरत को सामने रखकर ही सोच सकता है जबकि ईश्वर के सामने ऐसे इलाक़ों में रहने वाले भी होते होते हैं जहां दाल-सब्ज़ी नहीं होती, इसीलिये धर्म में सदा से मांसाहार की अनुमति रही है। सिक्खों के गुरू भी मांसाहारी थे। जो आदमी मांसाहारियों को पापी मानता है वह नहीं जानता कि कितनी बड़ी हस्तियों को पापी कह रहा है ?
विचारणीय पोस्ट
Mahak said…
Ghulam Kundanamn जी की बात से सहमत

और @अयाज़ भाई
सुज्ञ जी ने आपके द्वारा उठाये गए प्रश्नों का जवाब बहुत पहले ही दे चुके हैं की -

" हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। "
Mahak said…
किसी जीव का मांस खाने का मतलब है उसकी हत्या कर देना क्योंकि बिना जीव की हत्या करे, उसे पीड़ा पहुंचाए उसका मांस खाना असंभव है लेकिन शाकाहार में ऐसा नहीं है ,हम जिस पेड़ से शाकाहार ग्रहण करते हैं वो बरसों जीवित रहता है , मेरे खुद के घर के बाग में अमरुद का वृक्ष लगा हुआ है जो हर साल हमें बहुत मीठे अमरुद देता है तो इसका मतलब मैंने उसकी हत्या नहीं कर दी, वो आज भी वैसा ही है जैसा छह साल पहले था बल्कि दिन ब दिन और बड़ा और हरयाली से परिपूर्ण होता गया ,हम उसे रोजाना पानी आदि देते हैं और समय-२ पर माली आदि से उसकी देखभाल भी करवाते हैं ना की उसे किसी प्रकार का कष्ट देते हैं

इसके और तर्कशील उत्तर के सन्दर्भ में अनुराग शर्मा जी के जवाब को दे रहा हूँ -

अभी तक वर्णित दृश्यों में मैंने शाकाहार के बारे में अक्सर होने वाली बहस के बारे में कुछ आंखों देखी बात आप तक पहुंचाने की कोशिश की है। आईये देखें इन सब तर्कों-कुतर्कों में कितनी सच्चाई है। लोग पेड़ पौधों में जीवन होने की बात को अक्सर शाकाहार के विरोध में तर्क के रूप में प्रयोग करते हैं। मगर वे यह भूल जाते हैं कि भोजन के लिए प्रयोग होने वाले पशु की हत्या निश्चित है जबकि पौधों के साथ ऐसा होना ज़रूरी नहीं है।

मैं अपने टमाटर के पौधे से पिछले दिनों में बीस टमाटर ले चुका हूँ और इसके लिए मैंने उस पौधे की ह्त्या नहीं की है। पौधों से फल और सब्जी लेने की तुलना यदि पशु उपयोग से करने की ज़हमत की जाए तो भी इसे गाय का दूध पीने जैसा समझा जा सकता है। हार्ड कोर मांसाहारियों को भी इतना तो मानना ही पडेगा की गाय को एक बारगी मारकर उसका मांस खाने और रोज़ उसकी सेवा करके दूध पीने के इन दो कृत्यों में ज़मीन आसमान का अन्तर है।

अधिकाँश अनाज के पौधे गेंहूँ आदि अनाज देने से पहले ही मर चुके होते हैं। हाँ साग और कंद-मूल की बात अलग है। और अगर आपको इन कंद मूल की जान लेने का अफ़सोस है तो फ़िर प्याज, लहसुन, शलजम, आलू आदि मत खाइए और हमारे प्राचीन भारतीयों की तरह सात्विक शाकाहार करिए। मगर नहीं - आपके फलाहार को भी मांसाहार जैसा हिंसक बताने वाले प्याज खाना नहीं छोडेंगे क्योंकि उनका तर्क प्राणिमात्र के प्रति करुणा से उत्पन्न नहीं हुआ है। यह तो सिर्फ़ बहस करने के लिए की गयी कागजी खानापूरी है।
Anonymous said…
घर में मच्छर मरने की कोइल, मैट, रिफिल आदि का प्रयोग करना चाहिए या नहीं ?

क्या मच्छर के जीवित रहने के लिए मनुष्य उसे अपना रक्तपान करने दे ?
Anonymous said…
क्या मुर्गे बकरे गाय तुम्हारा रक्तपान करते हैं?
Anonymous said…
बिल्ली कबूतर, मुर्गा खाती है और बकरे गाय शेर चीते खाते है उन्हें अहिंसा का पाठ सिखाना चाहिए
Anonymous said…
बहुत खूब , तो तुमने मान ही लिया की बिल्ली और शेर चीते की तरह तुम भी एक जानवर हो , मनुष्यता और पशुता में कोई फर्क ही नहीं होता है ,क्यों यही कहते हो ना तुम
Anonymous said…
हम ये नहीं कहते बल्कि गलत समझते हो,

इए संसार में प्रकर्ती का नियम है की हर कोई एक दूसरे पर आश्रित है


बस इतना समझ लो
Anonymous said…
जब हम तुम जानवारों को मारकर खाएं तो वो प्रकर्ती का नियम हो जाता है और जब शेर ,बाघ आदि हम पर हमला करके हमें मारकर खाना चाहें और आदमखोर हो जाएँ तो हम तुम उन्हें गोली मार देते हैं

ये प्रकर्ती का नियम सिर्फ जानवरों पर ही क्यों लागू होता है मनुष्यों पर क्यों नहीं ? क्या मनुष्य जाती आप्रकर्तिक हैं ??
Anonymous said…
गांधी जी के अहिंसा का नियम शायद प्रभावी नहीं या पूर्ण नहीं तो
फिर अहिंसा को मनष्य की जरुरत अनुसार दुबारा परिभाषित कर लो,

किसी प्राण वाले जीव (वनस्पति, व् जंतु) की वे हत्या जो मनुष्य के सवस्थ और जीवित रहने हेतु की जाए वो अहिंसा के रूप में स्वीकार की जायेगी !

इसमें मनुष्य की मनुष्य द्वारा हत्या भी स्वीकार्य है यदि जान माल की रक्षा व समाज में किसी अपराध को रोकने हेतु किसी के प्राण लिए जाए (अर्थात आत्म रक्षा के लिए व कानून किसी को सजा ए मौत दे) तो उसे अहिंसा ही माना जाए
जानवर भी प्रकति के नियम में बंधे है

और वो इसका पालन करते है अर्थात वो भी जीवित रहने व् आत्म रक्षा के लिए किसी के प्राण हर लेते है ये सत्य है इसे सभी स्वीकार कर सकते है ( जो सत्य को स्वीकार करना चाहता है )
Anonymous said…
मनुष्य स्वस्थ एवं जीवित पूर्णतः शाकाहारी होकर भी रह सकता है ,इसके लिए जीवों की हत्या करने की कोई आवश्यकता नहीं

मनुष्य की मनुष्य द्वारा हत्या तभी जायज़ हो सकती है अगर वो उन कारणों में की गई हो जो तुमने बताएं हैं

लेकिन जो अंत में तुमने कहा है वो कैसे सही है , क्या शेर,बाघ आदि को मनुष्य को मारकर खाने की आजादी दी जा सकती है ?,तुम्हारे मुताबिक तो अगर वे हमारे प्राण हरना चाहें तो हमें इसे प्रक्रति का नियम मानकर खुशी-२ अपने प्राणों का समर्पण कर देना चाहिए बिना कोई प्रतिकार या आत्मरक्षा का प्रयास किये की लो भाई हमें खा लो ,हमें तुम्हारे भोजन के लिए ही पैदा किया गया है
Anonymous said…
पहेली बात सैनिक युद्ध के समय कहाँ कहाँ नहीं भटकते उन्हें ट्रेनिंग के समय जीवो का शिकार करके खाना सिखाया जाता है, क्यों ? ताकि मनुष्य जीवित रहे !

दूसरी बात यदि कोई हिंसक जानवर मनुष्य पर हमला करता है तो उस पशु को क्या कोई अदालत सजा देती है ?
Anonymous said…
मजबूरी की बात अलग होती है लेकिन जब हमारे तुम्हारे पास शाकाहार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तो फिर मांसाहार की इतनी जिद्द क्यों भई ,सिर्फ अपने जीभ के स्वाद की खातिर किसी की हत्या बिलकुल भी जायज़ नहीं कही जा सकती ,जितना हमें अपना जीवन प्यारा है उतना ही दूसरे जीवों को भी है

दूसरी बात का जवाब तो पहले ही दिया जा चुका हूँ की जब कोई हिंसक जानवर मनुष्य पर हमला करता है तो उसे जेल आदि की सज़ा ना देकर सीधे गोली मारी जाती है ,क्यों ,क्योंकि उस समय मनुष्य को कोई प्रकर्ति का नियम निभाने की नहीं सूझती ,उस समय उसे कुछ सूझता है तो किसी भी प्रकार से अपने प्राणों की रक्षा और उसके प्राण लेने का प्रयास करने वाले की हत्या ताकि वो अन्य मनुष्यों के प्राण ना ले ले

इस समय कहाँ चला जाता है ये प्रकर्ति का नियम ?? हम ये क्यों सोचते हैं की सिर्फ हमें ही जीने का अधिकार है ,हमारा जीवन ही बहुत महत्वपूर्ण है और दूसरे का जीवन बहुत सस्ता, जैसे चाहे जब चाहे अपने पेट की खातिर उसे कुर्बान कर दो
Anonymous said…
ये सत्य है की मनुष्य को इस धरती पर सब जीवो पर अधिकार प्राप्त है मनुष्य सब जीवो में सबसे बढकर बुधिजीवी प्राणी है यदि मनुष्य ही इस धरती पर है तो वो जहां कही भी रहता है उसे अपने रहने के अनुकूल स्थान बना लेता है और जहां संभव नहीं वहाँ वो प्रक्रति से समझोता भी करता है

(जिसका नाम मजबूरी देता है और मजबूरी का नाम महात्मा गन्दी दे कर गाँधी जी को भी अपने कर्मो में घसीट लेता है )


अगर शाकाहार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तो भारत में इतने लोग पोशान्हीनता के शिकार क्यों है ? सभी लोग शाकाहार रहकर सवस्थ नहीं रह सकते, उदहारण के लिए एक व्यक्ति को सवस्थ रहने के लिए रोज जितने विटामिन्स, प्रोटीन, मिनरल्स आदि की आवश्यकता होती उसके लिए उसे प्रचुर मात्र में भोजन चाहिए जिसमे सब्जी, सलाद, चावल, फल, दूध इत्यादि सम्मिलित किये होने चाहिए और भारत जैसे देश में इतना भिजन एक व्यक्ति करता है तो उसे कितना खर्च करना पडेगा ? गरीब आदमी जो रोज के ५० -१०० रूपये कमाता है खर्च कर सकता है ?

उसको सस्ता मांस आवश्यकता की पूरित के लिए कोई जंतु का मांस यदि सप्ताह में एक दो बार मिल जाता है तो उसके शरीर में तत्वों की पूर्ति हो जाती है और ये कई डाक्टरों से मिल कर जाना है की सप्ताह में एक बार मांसाहारी भोजन करने से शरीर में तत्वों की कमी पूर्ति हो जाती है

मुसीबते परेशानी वो ही लोग पैदा करते है जो सीमा से बहार कार्य करते है, आती हर चीज़ की बुरी है जैसे इच्छा पूर्ति के लिए दना दन मुर्गे हलाल करो, और रोजाना मुर्ग मुसल्लम खाओ तो वो उसके लिए भी हानिकारक है और प्रक्रति के लिए भी और हद से आगे बड़े हुए लोग ही होते है ये खराबी पैदा करने वाले लोग है
Anonymous said…
कुछ शब्दों की टाइपिंग सही न होने के कारन एडिट करके कमेन्ट दुबारा पोस्ट किया है

ये सत्य है की मनुष्य को इस धरती पर सब जीवो पर अधिकार प्राप्त है मनुष्य सब जीवो में सबसे बढकर बुधिजीवी प्राणी है यदि मनुष्य ही इस धरती पर है तो वो जहां कही भी रहता है उसे अपने रहने के अनुकूल स्थान बना लेता है और जहां संभव नहीं वहाँ वो प्रक्रति से समझोता भी करता है

(जिसका नाम मजबूरी देता है और मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी दे कर गाँधी जी को भी अपने कर्मो में घसीट लेता है )


अगर शाकाहार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तो भारत में इतने लोग पोषणहीनता (कुपोषण) के शिकार क्यों है ? सभी लोग शाकाहार रहकर सवस्थ नहीं रह सकते, उदहारण के लिए एक व्यक्ति को सवस्थ रहने के लिए रोज जितने विटामिन्स, प्रोटीन, मिनरल्स आदि की आवश्यकता होती उसके लिए उसे प्रचुर मात्र में भोजन चाहिए जिसमे सब्जी, सलाद, चावल, फल, दूध इत्यादि सम्मिलित किये होने चाहिए और भारत जैसे देश में इतना भोजन एक व्यक्ति करता है तो उसे कितना खर्च करना पडेगा ? गरीब आदमी जो रोज के ५० -१०० रूपये कमाता है क्या खर्च कर सकता है ?
कभी किसी सायकल रिक्शा वाले, किसी बोझा ढोनेवाला मजदूर से, खेतों में काम करने वाले मजदूरों से मिल कर बातचीत कर उनका हाल जान कर की वो क्या खाते है और उसके बाद वो कैसे पाने शरीर को काम के योग्य बनाए रखते है

उसकी आवश्यकता पूर्ति सस्ता मांस कोई जंतु का मांस यदि सप्ताह में एक दो बार मिल जाता है तो उसके शरीर में तत्वों की पूर्ति हो जाती है और ये कई डाक्टरों से मिल कर जाना है की सप्ताह में एक बार मांसाहारी भोजन करने से शरीर में तत्वों की कमी पूर्ति हो जाती है
जिन गरीब मजदूरों को भोजन प्रायाप्त मात्रा में नहीं मिलता वो फिर सस्ती देसी शराब अथवा और कोई नशीले पदार्थ के सेवन के आदि होते है अन्यथा वो तो काम ही नहीं कर पाए और जयादतर मजदूर श्रेणी के लोग नशे के आदि होते है ये तो कोई छुपी बात नहीं है

मुसीबते परेशानी वो ही लोग पैदा करते है जो सीमा से बहार कार्य करते है, अती हर चीज़ की बुरी है जैसे इच्छा पूर्ति के लिए दना दन मुर्गे हलाल करो, और रोजाना मुर्ग मुसल्लम खाओ तो वो उसके लिए भी हानिकारक है और प्रक्रति के लिए भी, और ये हद से आगे बड़े हुए लोग ही होते है और ये ही खराबी पैदा करने वाले लोग है
Anonymous said…
महक साहब बहुत सारे जीवों की आयु एक दिन या इससे कुछ अधिक होती है क्या उन्हे खा लेना ठीक है और यह मांसाहार नही होगा क्या
सुज्ञ said…
स्वस्थ चर्चा तभी है,जब जो जवाब दिये जा चुके है,चर्चा वहां से आगे बढाई जाय।
फ़िर भी यहां पहली ही टिप्पणी में Ghulam Kundanam साहब नें स्पष्ठ कर दिया है।
इन्सान से गलतियाँ होती है, इसका मतलब यह नहीं है कि हम जानबूझ कर गलतियाँ करें. पूर्ण अहिंसा का पालन संभव नहीं है. जहाँ तक संभव हो हमें अधिक से अधिक अहिंसा का पालन करना चाहिए
बाद में महक जी नें भी मेरा मंतव्य दोहराया है।
" हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। "
आपसे तथ्यों पर मनन नहिं हो पाता तो,
आपके सामने कुतर्क ही रखता हूं…॥
अगर शाकाहार में मांसाहार से भी अधिक हिंसा आपको प्रतीत होती है, तो अपने भोजन से शाकाहार हा पूरा त्याग(परहेज)कर दिजिए।
भाई सवाल यह पूछा गया है कि
गाय का दूध उसके बच्चे से छीनकर पीना हिंसा है कि नहीं ?
##अपने भोजन के लिये फ़सल पाने के विचार से बैल को हल में जोतना, खेत के केंचुए काट देना, चूहेमार दवा और कीटनाशक दवा छिड़कना हिंसा है कि नहीं ?
##पेड़ के फल उसका बीज हैं जैसे कि मनुष्य का वीर्य। अगर वीर्य नहीं पिया जा सकता तो फिर फल क्यों खाये जाते हैं ? और क्या किसी का बीज ही नष्ट कर देना हिंसा में आएगा कि नहीं ?
## और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब केंचुए आदि मारना भी हिंसा है लेकिन जीवित रहने के लिये उन्हें मारने की अनुमति सुज्ञ जी दे रहे हैं तो फिर क्यों न इतना बड़ा एक ही जीव मार लिया जाए जो बहुत लोगों को काफ़ी हो जाए ?
#### अब यह बताया जाए कि ‘न्यूनतम हिंसा‘ का पैमाना कौन तय करेगा , सुज्ञ जी ?
सुज्ञ said…
किसी भी विचार का अविवेकी अर्थघटन नहिं किया जाना चाहिए।
मैने कहीं भी 'मारने की अनुमति नहिं दी'
ऐसे पापकारी वचन मेरे हो ही नहिं सकते।
सुक्ष्म अहिंसा के बारे में जानना चाह्ते हो तो जैन दर्शन के साहित्य को एक बार देख लेना चाहिए,जहां बडे विस्तार से सुक्ष्म अहिंसा के उल्लेख मिल जायेंगे।
‘न्यूनतम हिंसा‘ का पैमाना तो आप खुद ही तय कर लिजिये, मैने तो कहा ही है"अगर शाकाहार में अधिक हिंसा आपको प्रतीत होती है, तो अपने भोजन से शाकाहार हा पूरा त्याग(परहेज)कर दिजिए।"
Dr. Ayaz Ahmad said…
sugyसाहब जवाब के लिए मेरी आज की पोस्ट पढ़ें
Dr. Ayaz Ahmad said…
@ सुज्ञ जी !
1-विश्व मानव एक ही परिवार हैं। जब आप लोग ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘ कहते हैं तो क्या आपका यह दायित्व नहीं बनता कि आप अगर मांसाहार की निन्दा करें तो फिर यह भी चिन्ता करें कि लगभग 700 करोड़ का यह पूरा परिवार क्या खायेगा ?
2-मैंने टी.वी. पर देखा है कि तरूण सागर जी महाराज जैन समाज के लोगों को अचार खाने पर धिक्कारते हुए कह रहे थे कि जब तुम मूली-गाजर बनोगे और लोग तुम्हें मसाले लगाकर डिब्बे में बन्द करेंगे , तब कैसा लगेगा ?
3-मसाले तो पकाते समय सब्ज़ी में भी डाले जाते हैं और उन्हें स्वादिष्ट भी बनाया जाता है। क्या सब्ज़ियों को मसाले लगाकर अचार डालना और उन्हें पकाना जैन भोजन पद्धति में निषिद्ध है ?
4-यह सही है कि हम जैन समाज के बारे में कम जानते हैं , इसीलिए आपके सामने सवाल रखा है। हमें न कोई ऐतराज़ है और न ही उपहास करना हमारा तरीक़ा है। हम सिर्फ़ अपना विचार रख रहे हैं और आपका विचार जो भी है उसे जानना चाहते हैं ।
5-भोजन के संबंध में आपके और हमारे विचार में अन्तर है । हमने तो कभी आपके ‘विचारों‘ का विश्लेषण नहीं किया लेकिन जब आपने हवाला दिया तो हमने पूछ लिया कि इस विचार की व्यवहारिकता क्या है ?
6-लाखों लोग तो सब्ज़ी खा सकते हैं लेकिन करोड़ों लोगों की खाद्य समस्या कैसे हल करेंगे आप जैन दर्शन के अनुसार ?
धर्म वही होता है जिसका पालन सर्वत्र किया जा सके।
सुज्ञ said…
जैसा आप कम जानते है, वैसे ही परिपूर्ण जानकारी का यहां भी अभाव है, मैं नहिं चाहता आपको जल्दबाज़ी में सतही जानकारी दी जाय,और उसके मन माफ़िक़ अर्थघटन हों जाय। जो कि किसी भी विचारधारा के साथ अन्याय होगा।
ये कैसी गलती है जो बार बार होती रहती है

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