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Jain opinion about man's food. क्या भोजन के संबंध मे जैन विचार व्यवहारिक और आदर्श है ? Ayaz Ahmad


सुज्ञ जी ! जैन दर्शन का आदर्श आचरण जैन साधु है जो न तो टूथब्रश करते है और न साबुन से नहाते है, अपने बाल अपने हाथों से फाड़ते ताकि जीव हत्या न हो । भिक्षा माँगकर खाते हैं 24 घंटे मे सिर्फ एक बार वह भी खड़े खड़े हथेली पर लेकर जो मात्र दो ग्रास होता है ।
संक्षेप मे यह है जैन साधुओ का आहार संबंधी आचरण । यह न तो शरीर की आवश्यकता को पूरा करता है और न इसे संतुलित और पोष्टिक आहार कहा जा सकता है जिसे मनुष्य के लिए साइंटिस्ट ज़रूरी बताते है । ऐसे आहार से मनुष्य की काया जर्जर होती चली जाती है ऐसा आहार शरीर को पुष्ठ नही नष्ट करता है ।
1. क्या आप चाहते है कि सभी भारतीय ऐसा आहार ग्रहण करें और कमजोर हो जाए और शत्रु देश के लोग आ दबाएं ?
2.क्या विश्व मे सभी के लिए यह व्यवस्था व्यवहारिक और आदर्श है ?
3.सुज्ञ जी ! क्या आप स्वयं भी भोजन संबंधी इस जैन विचार के अनुसार ही खाते पीते है ?

Comments

सुज्ञ said…
अहंमद साहब,
मैने तो सुक्ष्म अहिंसा पर जैन दर्शन के अध्यन का हवाला दिया था।लेकिन आपने तो बहूत शिघ्र जैन साधु के आचार व आहार का विश्लेषण ही प्रस्तूत कर दिया।
लगता है बहूत ही जल्दबाज़ है आप,इतने सतही अनुसंधान पर हम कैसे चर्चा करेंगे?
और जैन साधु व जैन ग्रहस्थ के आहर में भी फ़र्क होता है।
सुज्ञ said…
एक बार पुनः आग्रह करता हूं, हम जिस विषय पर लिखें पूरी जानकारी प्राप्त कर लें। कम जानकारी के आधार पर हम सही बात पर नहिं पहूंच पाते।

लगे हाथ आपके प्रश्नों के जवाब भी देता चलूं
1.वीरता और बहादुरी साहस में होती है,खा खा के मोटे होने से नहिं।
2. अब विश्व की बात कहां से प्रकट हुई,किसने ठेका लिया पुरे विश्व का ?
3.जैन भोजन संबंधी आचार कोई बहूत दुष्कर कार्य नहिं है। भारत में लाखों लोग इस विधी से जीते भी तो है।
Ayaz sahab, jain sadhuon ka Dharm aur Jain grahasth ka Dharm alag-alag hota hai, aise hi jaise hinduon mein bhi sadhuon ka dharm alag aur aam-jan ka alag.
aap dono ko eksath milakar kyon dekh rahe hain?
vaise mere khayal se hamein apne dharm se matlab hona chahie, dusre dharm ko unke log dekhenge.

rahi bat Sugy ki, to unke dharm ke hisab se mansahar galat hai, to aapko kya problem hai?

Aapka dharm ijazat deta hai, to keval aapko. Isse unka koi talluk nahi hai.

aap log apne-apne dharm par charcha kyon nahi karte hain?
Dr. Ayaz Ahmad said…
@ सुज्ञ जी !
1-विश्व मानव एक ही परिवार हैं। जब आप लोग ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘ कहते हैं तो क्या आपका यह दायित्व नहीं बनता कि आप अगर मांसाहार की निन्दा करें तो फिर यह भी चिन्ता करें कि लगभग 700 करोड़ का यह पूरा परिवार क्या खायेगा ?
2-मैंने टी.वी. पर देखा है कि तरूण सागर जी महाराज जैन समाज के लोगों को अचार खाने पर धिक्कारते हुए कह रहे थे कि जब तुम मूली-गाजर बनोगे और लोग तुम्हें मसाले लगाकर डिब्बे में बन्द करेंगे , तब कैसा लगेगा ?
3-मसाले तो पकाते समय सब्ज़ी में भी डाले जाते हैं और उन्हें स्वादिष्ट भी बनाया जाता है। क्या सब्ज़ियों को मसाले लगाकर अचार डालना और उन्हें पकाना जैन भोजन पद्धति में निषिद्ध है ?
4-यह सही है कि हम जैन समाज के बारे में कम जानते हैं , इसीलिए आपके सामने सवाल रखा है। हमें न कोई ऐतराज़ है और न ही उपहास करना हमारा तरीक़ा है। हम सिर्फ़ अपना विचार रख रहे हैं और आपका विचार जो भी है उसे जानना चाहते हैं ।
5-भोजन के संबंध में आपके और हमारे विचार में अन्तर है । हमने तो कभी आपके ‘विचारों‘ का विश्लेषण नहीं किया लेकिन जब आपने हवाला दिया तो हमने पूछ लिया कि इस विचार की व्यवहारिकता क्या है ?
6-लाखों लोग तो सब्ज़ी खा सकते हैं लेकिन करोड़ों लोगों की खाद्य समस्या कैसे हल करेंगे आप जैन दर्शन के अनुसार ?
धर्म वही होता है जिसका पालन सर्वत्र किया जा सके।
सुज्ञ said…
शहरयार साहब ने बिल्कूल सही कहा है।
अयाज साहब,
1-‘वसुधैव कुटुंबकम्‘ के भाव को भी हम इतना उपरी और मात्र मानव तक ही सिमित नहिं रख सकते। मांसाहार का समर्थन भी 700 करोड़ की भुख का समाधान नहिं है।
2-तरूण सागर जी,सही कह रहे है,पर बहूत ही गहनता से समझने की आवश्यकता है।
3-मै पुन: याद दिलाता हूं कि पूरी जानकारी के बिना चर्चा सार्थक नहिं हो सकती। यहां दर्शनों में अनुज्ञा या निषिद्ध एसे दो उपदेश ही नहिं होते। गहराई तक जाना आवश्यक है।
5-यह हमारे विचारों का विश्लेषण नहिं हम किसी दर्शन-विशेष की बात कर रहे है। हमने हवाला इसलिये दिया कि आप अहिंसा के एक विशेष दृष्टिकोण को जान लें।
6- मैने जैन दर्शन किसी पर लादने या उससे खाद्य समस्या के हल की कोई बात नहिं की। और मै जानता हूं वहां तक जैन दर्शन में आहार के प्रचार या मान्यता के प्रचार का यह तरीका है ही नहिं।
सुज्ञ said…
जैसा आप कम जानते है, वैसे ही परिपूर्ण जानकारी का यहां भी अभाव है, मैं नहिं चाहता आपको जल्दबाज़ी में सतही जानकारी दी जाय,और उसके मन माफ़िक़ अर्थघटन हों जाय। जो कि किसी भी विचारधारा के साथ अन्याय होगा।
@हंसराज "सुज्ञ" जी,
आप भी भला किन लोगों से तर्क-वितर्क करने लगे...इन लोगों के साथ किसी भी विषय पर चर्चा करना, समझिए कि एक तो अपना कीमती समय को फिजूल व्यर्थ करना और दूसरा मानो अपनी बुद्धि का दीवाला निकलवाना है....कुतर्क को आप कभी तर्क से नहीं जीत सकते......मुख्य बात ये है कि जब इनके पास किसी तर्क का कोई जवाब नहीं होता तो ये लोग चर्चा से ही घधे के सिर से सींग की माफिक भाग खडे होते हैं....आप ही देखिए आपने कितने तर्कपूर्ण तरीके से अपने ब्लाग पर एक पोस्ट लिखी..."मासाँहार का भ्रमजाल"... जिसमे आपने इन लोगों के कुतर्कों का बेहद सार्थक रूप में सिलसिलेवार जवाब दिया...लेकिन बताईये इन लोगों में से कौन ऎसा है जिसने उस पोस्ट को पढने के बाद उसके पक्ष/विपक्ष में कुछ कहा हो, वहाँ टिप्पणी रूप में या अपने ब्लाग पर ही कुछ लिखा हो.....इन लोगों से किसी प्रकार की सार्थक चर्चा की उम्मीद करना ही बेमानी है, क्यों कि ये लोग कभी भी किसी चर्चा को आपके छोडे सूत्र से आगे बढाने का प्रयास ही नहीं करेंगें...बस उसे छोडकर एक नया सूत्र पकडकर कोई दूसरा ही राग अलापने लगेंगें.....
टोटली टाईम वेस्ट.....
सुज्ञ said…
पंडित जी,
आपने मुझे दो बार चेताया, मैं आभार व्यक्त करता हूं आपका।
एक कोने में कहीं बचा रह गया था कि सार्थक चर्चा हो सकती है। देख रहा हूं कि आत्मअवलोकन की जगह उसी तरह के छिद्रानवेषण को ही ये चर्चा मानते है।
एक बार पुनः आभार शर्मा जी
Mahak said…
@प्रिय अयाज़ भाई

आप मांसाहार के बहुत बड़े समर्थक मालूम होते हैं , अभी कुछ समय पहले ही मैंने भी मांसाहार पर एक पोस्ट लिखी थी उसके कुछ अंश यहाँ भी प्रस्तुत करना चाहूँगा अगर आप बुरा ना मानें तो और साथ ही आपसे उनके जवाब भी पाना चाहूँगा
Mahak said…
ज़्यादातर मांसाहारी समर्थक लोगों का सबसे बड़ा तर्क यही होता है कि क्योंकि इंसान सबसे सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान जीव है तो उसे जैसे मर्ज़ी हक है जीने का ,संसाधनों को प्रयोग करने का और ये सब उसी के लिए बने हैं
तो जनाब आपके संसाधनों को इस जैसे मर्ज़ी हक के मुताबिक प्रयोग करने के कारण ही आज पूरी दुनिया पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मंडरा रहा है और साथ ही मेरा आपसे एक सवाल है कि आज इंसान सबसे सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान जीव है ,अगर कल को इंसान से सर्वश्रेष्ट और बुद्धिमान जीव इस पृथ्वी पर आ जाएँ और वे भी यही तर्क दें कि हम सबसे सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान हैं तो इसलिए हमें तुम्हे मारकर खाने का हक है तो क्या उनकी इस दलील को आप मान लेंगे ? हो जायेंगे आप तैयार अपने आप को और अपने बीवी बच्चों को उनके सुपुर्द करने के लिए ताकि वे आपको मारकर और पकाकर खा सकें ?

सच में मेरे मुताबिक तो इंसानियत के नाम पे धब्बा है ये मांसाहार और जीव-हत्या या फिर बलि आदि , हम खुद को एक सुई भी चुभायें तो दर्द होता है और बेजुबान और निरीह पशुओं को सिर्फ इसलिए क़त्ल कर दिया जाए कि वे खाने में बहुत स्वादिष्ट लगते हैं और हमारे शरीर को प्रोटीन आदि प्रदान करते हैं ,शर्मनाक है ये सब

मुझे तो लगता है कि इन सब तर्कों के बल पर एक दिन ऐसा आएगा जब हम इंसानी मांस को भी जायज़ ठहरा देंगे और इंसान इंसान को ही मारकर खाने लगेगा
Mahak said…
प्रतिदिन हज़ारों जानवरों को बूचड़खानों में बड़ी ही निर्ममता के साथ क़त्ल कर दिया जाता है ,जिस प्रकार हमें दर्द होता है उसी प्रकार प्रत्येक जीव को भी दर्द होता है ,सिर्फ अपनी जीभ के स्वाद के लिए किसी जीव को मारना कैसे जायज़ है ? मुझे तो समझ नहीं आता कि मांसाहारियों कि आत्मा उन्हें इजाजत कैसे देती है किसी दूसरे प्राणी को खाने के लिए ? ,क्या उनके अंदर एक बार भी आवाज़ नहीं आती कि इंसान होकर भी तुम ये राक्षसी कृत्य कर कैसे सकते हो ?

वैज्ञानिकों ने अपने शोधों के ज़रिये ये सिद्ध किया है कि ऐसा कोई विटामिन ,कोई प्रोटीन और कोई मिनरल नहीं है जो कि हमें शाकाहार से प्राप्त ना हो सकता हो ,और अगर एक बार के लिए हम मान भी लें कि चलिए साहब ऐसा कोई तत्व है भी जो कि हमें शाकाहार से प्राप्त ना होता हो तो भी उसके लिए बेचारे निरपराध जीवों कि हत्या को कैसे उचित माना जा सकता है ? ,क्या हम इसी आधार पर किसी और जीव को अपनी हत्या करने कि आजादी दे देंगे ?

WHO ( World Health Organisation ) कि रिपोर्ट ये बात कहती है कि मांसाहार से 159 तरह कि बीमारियाँ होने का खतरा है जिनमें से प्रमुख हैं हृदयरोग, उच्च रक्तचाप और किडनियों का खराब होना
Mahak said…
कुछ समय पहले मैं एक चैनल पे एक debate देख रहा था इसी मुद्दे पे जिसमें कि एक महाशय द्वारा तर्क दिया गया कि अगर जीवों को मारकर नहीं खाया जाएगा तो उनकी संख्या बहुत अधिक बढ़ जायेगी और फिर ये धरती पूरी तरह से उनसे ही भर जायेगी और मनुष्य के अस्तित्व पर खतरा खड़ा हो जाएगा तो इसका बहुत ही बढ़िया और आत्मा को झकझोर देने वाला जवाब दिया उस debate में मौजूद साध्वी भगवती जी ने कि-मेरे भाई इसके लिए प्रकृति ने अपने आप ही व्यवस्था कि हुई है शेर ,बाघ,लकडबघा,गिद्ध, मगरमच्छ आदि जीवों को उत्पन करके और साथ ही एक बात बताओ ,जनसख्या तो आज मनुष्यों कि भी बहुत अधिक बढ़ गई है इस पृथ्वी पे और लगातार बढती जा रही है तो क्या इसका मतलब मनुष्यों को एक दूसरे को खाना शुरू कर देना चाहिए ? इस पर उन महाशय कि बोलती बंद हो गई

अब कुछ मांसाहार समर्थक इस तर्क को भी आगे ले आते हैं कि साहब हिंसा तो वनस्पति आहार अर्थात शाकाहार में भी है ही ,वैज्ञानिकों ने ये सिद्ध किया है कि पेड़-पौधों में भी जीवन है फिर हिंसा तो इसमें भी हुई

तो इसका सुज्ञ जी के द्वारा बहुत ही सुन्दर जवाब दिया गया कि- " हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। "
Mahak said…
बड़े ही दुःख की बात है की आज भारत में भी पेट को कब्रिस्तान बनाने वाले ये कत्लखाने जगह-२ खुले हुए हैं ,बताइये ये तो वो देश है जिसमें छत्रपति शिवाजी ने जब एक कसाई को एक गाय को कष्ट पहुंचाते हुए देखा तो उसी समय अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया था लेकिन आज उसी देश में ऐसे लोगों का सिर काटने कि बजाये हज़ारों गायों को प्रतिदिन काटा जा रहा है , मैं यहाँ पर किसी धर्मविशेष की भावना को प्रदर्शित नहीं कर रहा हूँ बल्कि मेरा तो मानना है कि जो लोग सिर्फ गौवध को बंद करवाने कि बात करते हैं उन्हें इसकी बजाये सभी जीव-जंतुओं कि हत्या पर रोक लगाने कि मांग करनी चाहिए चाहे वो आहार के लिए कि जाती हो या फिर बलि के नाम पर कामाख्या देवी के मंदिर में भैसों के सिर काटने कि कुप्रथा हो या कुर्बानी को आधार बनाकर हज़ारों बकरों को बकरीद के नाम पर मारा जाता हो ,हर प्रकार कि जीव-हत्या बंद कि जाए

इन बलि,कुर्बानी आदि कि प्रथा और परम्पाराओं के नाम पर अन्य प्राणियों कि जगह क्यों ना आपकी और आपके बच्चों कि बलि दी जाए ताकि आपको भी उस दर्द का अहसास हो जिससे कि इन बेजुबान ,लाचार ,निरीह और निर्दोष प्राणियों का गुजरना पड़ता है, जो व्यवहार आप अपने लिए नहीं चाहते क्या हक है आपको वैसा व्यवहार दूसरे प्राणी के साथ करने का ?
Anonymous said…
सबसे पहेली बात ये है की व्यक्ति कौन सी थ्योरी को मानते है साईंस की या आत्मा परमात्मा की ?

पहेले ये स्पष्ट हो तो सवालों का जवाब उसी के अनुसार उसे मिल जाएगा.

यदि दो विरोधाभास विचारधारा को अगर सही मान लिया जाता है तो विचारों में विरोधभास तो अपने आप ही आ जाएगा

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