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बाबरी मस्जिद या राम मंदिर : बौद्धिक दृष्टि में DR.AYAZ AHMAD

रामचंद्र जी एक राजा थे उन्होने शासन किया और चले गए । बाबर एक बादशाह था उसने शासन किया और चला गया । हकनामा की बाबरी मस्जिद से संबंधित पोस्ट पर चल रही बहस पढ़ कर मन मे एक सवाल उठा वह मैं ब्लाग जगत के सभी बुद्धिजीवियों के सामने रख रहा हूँ । बाबर इस देश मे आक्रमणकारी के तौर पर आया वह कब आया और कब तक उसने शासन किया और कब उसकी मृत्यु हुई यह सब ऐतिहासिक तथ्य मैं भी जानता हूँ और आप सब बुद्धिजीवी भी जानते ही होंगे लेकिन श्रीरामचंद्र जी कब पैदा हुए और कब से कब तक उन्होने शासन किया और कब उनकी मृत्यु हुई ये मैं नही जानता मगर यहाँ पर कुछ बुद्धिजीवी ऐसे मौजूद है जो यह भी जानते है कि अयोध्या मे रामचंद्र जी किस जगह पैदा हुए इसलिए वह ऊपर दिए गए सवालो के जवाब भी जानते होंगे । भारत एक धर्म प्रधान देश है धर्म और न्याय एक दूसरे के पूरक है धर्म ही सही न्याय कर सकता है इसलिए सभी न्याय पूर्वक विचार करें । और उपरोक्त सवालो के जवाब दें

Comments

Dr. Ayaz ahmad said…
धर्म ही सही न्याय कर सकता है राष्ट्रवाद नही।
आस्था अपरक्राम्य होती है.
Anonymous said…
मिंया अयाज अहमद आप ये कह रहे है की रामचंद्र जी के बारे में कोई यह नहीं कह सकता की वे कहाँ और कब पैदा हुए थे लेकिन आप बाबर के बारे में जानते है . तो मिंया अगर तुम्हारे अन्दर ईमान नाम की कोई चीज ज़रा सी है तो इमानदारी से इस सवाल का जबाब दो ;
मिंया शरीफ खान ने लिखा की मस्जिद उस जमीन पर नहीं बनाई जा सकती जो ......... बला-बला , अब एक मुसलमान यह बता दो की उस आकर्मंकारी बाबर ने मस्जिद के लिए वह जमीन कैसे पाई थी ?

अगर वह मिंया शरीफ खान के बताये तरीक से नहीं पाई गई तो वह मस्जिद अवैध हुई न या नहीं ?
Anonymous said…
और मिंया ये देश धर्मप्रधान नहीं धर्मनिरपेक्ष देश है , जिसे मुसलमान अपनी सहूलियत के हिसाब से धर्म-प्रधान और धर्मनिरपेक्ष समय-समय पर बनाते रहते है. तुम्हारे धर्म की किताब कुरआन तो अल्लाह की कही हुई बाते हो गई और जो हिन्दुओं के धर्म की किताबो में लिखा है वो सब बकवास . किसी ने ठीक ही कहा है ;
जिसका न कोई दीन-ईमान होता है,
वो मुस्लमान होता है .
जिसके दिल में न अपने देश और
दूसरे के धर्म का सम्मान होता है ,
वो मुस्लमान होता है.
Anonymous said…
koi jawab nahin dega? is liye bhi kiyonke iska jawab sabko Pata he.
Parul gupta said…
Ek sawal aur jiska yeh jawab nahin denge HANUMAN ke hote huye Mandir kese ban gaya?
Laxman said…
Birth dat of Rama : ?????
Period: ????
Anonymous said…
एक बात पर तो लगभग सभी हिंदू और दूसरे धर्म के लोग एकमत होते है कि मुसलमान कट्टर होते है, और ये सभी जानते है कि इस्लाम पाँच बातो पर है कलिमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज, और मुसलमानो को अक्सर सभी ने देखा है कि इनको पूरा करने के लिए वो किस हद तक नियमो का पालन करते है क्योकि मुसलमान मानते है कि अगर इन नियमो का पालन नही किया गया तो वो काम करना फ़िजूल होगा उसका कोई फायेदा नही होगा बल्कि कुछ मामलो मे तो हराम हो जाएगा, जैसे रोज़ा रखने के लिए सुबह से शाम तक भूखा पयासा और हर बुरी बात से बचना, हज करना है तो उस के लिए हज का महीना मे मक्का मदीना कि यात्रा करनी होगी किसी और महीना मे अगर मक्का मदीना कि यात्रा कि तो वो हज नही होगा (उमरा हो सकता है)
Anonymous said…
इसी तरह नमाज़ के लिए सभी जानते है कि मुसलमान वज़ु ( हाथ मुँह पैर धोना) करता और कोई सॉफ कपड़ा बिछाता है क्योकि ये नमाज़ कि शर्तो मे से है अगर इसे पूरा नही किया तो नमाज़ नही होगी, इसी तरह मुसलमान ये भी जानता है कि जो जगह नाज़ाएज तरीके से ली गई, हथियाई गयी, या विवादित थी तो वो वहाँ मस्जिद नही बनाई जाएगी क्योकि वहाँ नमाज़ ही नही होगी, और यही बात शरीफ सहाब ने अपने लेख मे हाई लाइट करके लिखी है और कि अगर वहाँ मस्जिद थी तो वो जगह ज़ोर ज़बरदस्ती या नाजायज़ कब्ज़े वाली नही हो सकती बल्कि किसी कीं खरीदी हुई या अपनी सहमति से दी हुई हो सकती है
Anonymous said…
1526 मे बाबर आया तो उसका युध इब्राहिम लोधी से हुआ पानीपत मे मतलब पहेले से ही एक मुसलमान शासक था और ये युध दो मुसलमानो के मध्य लड़ा गया जो कि धर्म के नाम पर या शरीयत के नाम नही लड़ा गया इसलिए ये कोई धार्मिक युध नही था और ना ही लूट पाट के लिए ये युध हुआ अगर ऐसा होता तो बाबर यहाँ नही बस्ता लूट पाट करके वापस चला जाता, ये युध राज्य के विस्तार के लिए लड़ी गयी लड़ाई मात्र थी और इतिहासकार इस बात पर एक मत है !
Anonymous said…
लेकिन जायदातर हिन्दुओ के दिमाग़ मे एक ही बात आती है या बताई जाती है कि कोई आक्रमणकारी आया उसने तोड़ फोड़ मचाई और उसने मंदिर तोड़ डाले,

लेकिन कई लोगो ने सवाल उठाया और ये कई बार कई लोगो ने साबित किया है कि अगर मंदिर तोड़े गये तो सारे मंदिर क्यो नही तोड़े गये ?

इस से ये बात साबित हो जाती है कि जो भी मंदिर टूटे होंगे और उनकी जगह पर मस्जिद बनी होगी तो वो ज़मीन या तो खरीद ली गयी होगी या उस ज़मीन के मालिक या मंदिर के पंडित मुसलमान बन गया होगा धर्म परिवतर्न के बारे मे सभी हिंदू कहते ही है कि आज के मुसलमान के पूर्वज हिंदू ही थे

आज कई कट्टर हिंदू कट्टर मुसलमान बन गये है, जिन्होने मस्जिद तोड़ी थी वो ही अब मस्जीदे बना रहे तो उस समय भी संभव है कि कई कट्टर हिंदू मुसलमान बन गये हो अपनी इच्छा से,और जिस ईंट गारे पत्थरो से मंदिर बना हुआ था उसी ईंट गारे पत्थरो से उन्होने ही उसी जगहो पर जहाँ मंदिर थे उसकी जगह मस्जिद बना ली होगी
Anonymous said…
क्या कोई हिंदू इन पहलुओ को मानने के लिए या इन पर गौर फ़िक्र या सोचने के लिए भी अपने मन मष्तिक को तैयार कर पाएगा ?
Anonymous said…
कब नज़र मे आएगी बे दाग सब्ज़ कि बहार !
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातो के बाद !!
जहाँ बाबरी थी वहाँ खुदाई की जाय और जिसके प्रमाण मिले, चाहे मस्जिद या मन्दीर जो भी हो को आप मानेंगे?

अगर हाँ तो फिर कोई लफड़ा ही नहीं.

अगर ना तो जो प्रत्यक्ष को मानने से मना करे वह भगवान के अस्तित्त्व को क्या मानेगा?
बीते युग की बतें तो जाने दीजिए...अप इस वर्तमान युग की ही बात ले लीजिए कि अफगानिस्तान में मुसलमानों द्वारा बामियान बुद्ध की विशाल मूर्ती को बारूद से उडा डाला गया, जिसे समूचे विश्व नें देखा...कह दीजिए कि वो भी झूठ है ?
DR. ANWER JAMAL said…
@संजय बेंगाणी जी की बात सोलह आने सही है। जो सुबूतों से साबित हो उसे मानना ही देशप्रेमी नागरिकों का कर्तव्य है। जो लोग कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी उसका इन्कार करें वे न धार्मिक हैं और न ही सही नागरिक। ईमान शब्द ही अम्न के माद्दे से बना है , अम्न को क़ायम रखने की ज़िम्मेदारी दूसरों से ज़्यादा मुस्लिमों की है,बेगुनाह इन्सान की जान हरेक इमारत से ज़्यादा क़ीमती है चाहे वह इमारत किसी मस्जिद की ही क्यों न हो ?
धर्म का काम है कल्याण करना और धार्मिक संतों का काम है धर्म के अनुसार मार्गदर्शन करना। देश के हिन्दू मुस्लिम संतों आलिमों को चाहिये कि वे नेताओं को धर्म के नाम पर आग भड़काकर अपनी अपनी पार्टी के तवे पर राजनीति की रोटी सेकने से रोकें। अगर धर्मपुरूषों के रहते हुए भी धर्म के नाम पर ‘चर्मण्वती‘ ,जैसी खून की नदियां देश में बहती रहीं तो फिर देश को धर्म और संतों से क्या फ़ायदा मिलेगा ? इसे देखकर तो नास्तिकों की शंकाओं को और ज़्यादा बल मिलेगा।
DR. ANWER JAMAL said…
@ भाई वत्स जी की बात भी ठीक है । बामियान के विशाल बुत को गिराना भी ग़लत और निंदनीय है। इसे तो महमूद ग़ज़नवी ने भी न ढहाया था क्योंकि वह तो सोना चांदी पर हाथ साफ़ करने का आदी था और यहां तो सिर्फ पत्थर था। इसमें भी सोमनाथ के बुत की तरह हीरे मोती , सोना चांदी भरा होता तो इसे भी तोड़कर वह अपने ख़ज़ाने में भर लेता।
DR. ANWER JAMAL said…
अब आप लोग पोस्ट के मूल विषय पर भी अपने विचार रखें कि
श्री रामचन्द्र जी अयोध्या में अब से कितने समय पहले पैदा हुए थे ?
यह काल निर्धारण बहुत ज़रूरी है, इससे मीर बाक़ी के काम के सही या ग़लत होने का बड़ा संबंध है। उम्मीद है कि इस सवाल को अब और घुमाने-टलाने का प्रयास नहीं किया जाएगा।
Dr. Ayaz ahmad said…
अनवर जमाल साहब ने सही कहा अभी तक किसी भी बुद्धिजीवी ने मूल प्रश्न का उत्तर नही दिया
@संजय बेंगाणी, जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक एक भी ऐसा साक्ष्य नहीं मिले जिससे यह तस्दीक हो कि वहाँ कोई मंदिर थी. दुसरा राम की ऐतिहासिकता पर देश के प्रधानमंत्री जी का बयान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. वही अगर हम वास्तविक रूप से पूर्वाग्रह को अलमारी में बंद करके ये जान लें कि रामकथा को हिंदी भाषा क्षेत्र में हालांकि रामचरितमानस ने लोकप्रिय बनाया, तथापि अवधी भाषा का यह महाकाव्य वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य रामायण पर आधारित है. मूल राम महाकाव्य कोई समरूप रचना नहीं है. मूल रूप से इसमें 6,000 श्लोक थे, जिन्हें बाद से बढ़ा कर 12,000 और अंतत: 24,000 कर दिया गया. विषयवस्तु के आधार पर इस ग्रंथ के आलोचनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि यह चार अवस्थाओं से होकर गुजरा था. इसकी अंतिम अवस्था 12वीं शताब्दी के आसपास की बतायी जाती है और सबसे आरंभिक अवस्था ईपू 400 के आसपास की हो सकती है. किंतु यह महाकाव्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ग विभक्त, पितृसतात्मक और राज्यसत्ता आधारित समाज के व्यवस्थित कार्यचालन के लिए कतिपय आदर्श निर्धारित करता है. यह शिक्षा देता है कि पूत्र को पिता की, छोटे भाई को बड़े भाई की और पत्नी को पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए. यह इस बात पर बल देता है कि विभिन्न वर्णों के लिए जो कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उन्हें उनका पालन अवश्य करना चाहिए और वर्ण-जाति संबंधी कर्तव्यों से भटक जानेवालों को जब भी जरूरी हो निर्मम दंड दिया जाना चाहिए और अंत में यह राजा सहित सभी को आदेशि करता है कि धर्म के जो आदर्श राज्य, वर्ण और परिवार के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए निर्दिष्ट किये गये हैं, उन्हीं के अनुसार चलें. विभीषण अपने कुल, जो गोत्र आधारित समाज के सदस्यों को एक साथ बांधे रखने के लिए सर्वाधिक आवश्यक था, के प्रति निष्ठा की बलि देकर भी धर्म नाम की विचारधारा में शामिल हुआ. वाल्मीकि द्वारा निर्दिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड जैन, बौद्ध और अन्य ब्राह्मण महाकाव्यों और लोक कथाओं में भी दृष्टिगोचर होते हैं, महाकाव्य और लोक कथाएं भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में मानदंडों, अवस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, पर उनमें उल्लिखित कुछ ही राजाओं व अन्य महान विभूतियों की ऐतिहासिकता को पुरातत्व, शिलालेखों, प्रतिमाओं और अन्य स्त्रोतों के आधार पर सत्यापित किया जा सकता है.
दुर्भाग्य से हमारे पास इस तरह का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 1800 के बीच एक ऐसी अवधि, जिसे पुराणों की परंपरा पर काम करनेवाले कुछ विद्वानों ने राम का काल बताया है, अयोध्या में राम की ऐतिहासिकता को सिद्ध कर सके.
@@पी डी वत्स जी, आपका यह कहना जायज़ है कि अफगानिस्तान में जो हुआ वह गलत हुआ. मैं खुद यह मानता हूँ लेकिन सिर्फ इस बिनाह पर यह कहना कि 'इसलाम' अथवा मुसलामानों ने हिंदू संस्कृति को लगभग पूरी तरह से विनष्ट कर दिया था, यह इतिहास और इस्लाम-विरोधी लोगों का एक और मिथ्याकरण है. अगर हम आंतरिक और बाहरी कारकों की अनुक्रिया में भारतीय संस्कृति के विकास और संश्लेषण की प्रक्रिया को देखें तो पता चलता है कि मध्यकाल में संस्कृति की निश्चित तौर पर प्रगति हुई. यहां हम भारतीय इसलामी कला, वास्तु, साहित्य आदि के विकास की, जिससे हम ब्लॉगर्स तो कम लेकिन इतिहास के विद्यार्थी भली-भांति परिचित हैं, अधिक चर्चा नहीं करेंगे. पर यदि हम केवल ब्राह्मण संस्कृति और संस्कृत साहित्य के अध्ययन की प्रगति तथा भारतीय आर्य और द्रविड़ भाषाओं के विकास की समीक्षा करें, तब भी मध्यकाल भारतीय इतिहास का निर्विवाद रूप से महान रचनात्मक काल सिद्ध होगा. सुलतानों और मुगल राजाओं के शासनकाल में ही बंगाल सहित भारत के प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षेत्र ने अपनी सांस्कृतिक पहचान विकसित की और इस तरह भारतीय संस्कृति के बहुरंगी वितान में अपना योगदान किया. असल में क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्य के विकास की दृष्टि से मध्यकाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था. हिंदू संस्कृति केवल दो अलग-अलग द्वीपवत क्षेत्रों में, उत्तर में मिथिला में और दक्षिण में विजयनगर में पुष्पित-पल्लवित हुई. पर संस्कृत की सबसे अधिक पांडुलिपियां हमें'मुसलिम' शासित राज्य कश्मीर से प्राप्त हुई हैं, जहां के पंडितों को फारसी और संस्कृत दोनों में समान रूप से प्रवीणता प्राप्त थी. अगर तर्क यह है कि नालंदा की समस्त बौद्ध पांडुलिपियां मुसलमानों द्वारा नष्ट कर दी गयी थीं, तब गुजरात के सुलतानों के समय क्यों जैन पांडुलिपियों को भली-भांति संरक्षित रखा गया? ऐसी अधिकतर पांडुलिपियां, जिनके आधार पर प्राचीन भारतीय विरासत का उद्धार हुआ खास कर कश्मीर, पश्चिमी और दक्षिणी भारत तथा मिथिला और पूर्वी भारत में सुलतानों और मुगलों के शासन के दौरान, लिखी गयीं और संरिक्षत की गयीं. जिसे आधुनिक 'हिंदू नवजागरण' कहा जाता है, वह इन मध्यकालीन पांडुलिपियों के बिना संभव ही न हुआ होता.

तुर्क सुल्तानों और मुगल बादशाहों के शासनकाल में, मूल रचनाओं के अलावा न केवल महाकाव्यों, काव्यों, धर्मसूत्रों और स्मृतियां पर बल्कि श्रोतसूत्रों और गुह्यसूत्रों, दर्शन, तर्क शास्त्र, व्याकरण, खगोल विज्ञान, गणित आदि सहित वैदिक ग्रंथों पर भी अनेकानेक विद्वत्तापूर्ण टीकाएं लिखी गयीं. प्राचीन पाठों पर टीकाएं लिखने की प्रक्रिया में टीकाकारों ने काफी कुछ मौलिक योगदान किया. यही नहीं, तर्क शास्त्र की नव्यन्याय प्रणाली, जिसके लिए भारत प्रसिद्ध है न केवल मिथिला में विकसित हुई, बल्कि सुलतानों के शासन के अंतर्गत बंगाल में भी उसका विकास हुआ. धर्मशास्त्र के टीकाकारों ने समाज में हो चुके परिवर्तनों को यथोचित लक्षित किया और धर्मशास्त्र के प्रावधानों की तदनुसार व्याख्या करने का प्रयास किया. निश्चय ही भारत में उत्तर मध्यकाल के दौरान ठीक उस तरह की सामाजिक और आर्थिक प्रगति नहीं हुई, जिस तरह की ग्रति पश्चिमी यूरोप के देशों में हुई थी. किंतु यह बात लगभग संपूर्ण एशिया के बारे में सच है, जिसका कि केवल एक हिस्सा इसलामी शासकों के शासन के अंतर्गत था. फिर भारत में ही मुसलिम शासन को क्यों भला-बुरा कहा जाये?
इतिहास बतलाता है कि शासक वर्ग चाहे किसी भी धर्म के रहे हों, उनका यह विशेषाधिकार रहा है कि वे अपनी प्रजा को और अपने दुश्मनों को लूटें और उनका उत्पीड़न करें और जो मालमत्ता मिले उसकी मुख्यत: शासक वर्ग के ऊपरी तबकों के सदस्यों के बीच बंदरबांट कर लें. अगर इसलामी बादशाहों और राजाओं ने हिंदू मंदिरों की लूटपाट की तो इतिहासकार इस तथ्य को नजरअंदाज करके उनके प्रति कोई सद्भावना पैदा नहीं कर सकते. पर ऐसी लूटपाट के कारणों का विश्लेषण करना होगा और उनकी व्याख्या करनी होगी जैसा कि मोहम्मद हबीब ने अपनी पुस्तक सुल्तान महमूद आफ गजनीन में महमूद गजनी द्वारा की गयी लूटपाट के मामले में किया है. साधारण व्यक्ति भी इस बात को देख सकता है कि चाहे सभी हिंदू मंदिरसोमनाथ और तिरुपति के मंदिरों की तरह समृद्ध न रहे हों तो भी आम तौर पर मसजिदों के मुकाबले मंदिर कहीं अधिक समृद्ध हुआ करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में, सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां, 300 हजाम और बहुत से पुजारी थे. इस मंदिर के स्वामित्व में 10 हजार गांव थे. पर मसजिदों की वास्तु संबंधी बनावट ही ऐसी है कि संपत्ति संग्रह के लिए वहां कोई जगह नहीं होती. यह तो प्रार्थना के लिए एक खुली इमारत होती है. मंदिरो में संपदा के संचय के कारण ही कुछ हिंदू राजा कीमती धातुओ से बनायी गयी मूर्तियों को ध्वस्त करने और राजकोष के लिए धन संपत्ति पर कब्जा करने के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में कश्मीर के शासक हर्ष ने ऐसा ही किया था. उसने एक अधिकारी नियुक्त किया था, जिसका काम मूर्तियों को ध्वस्त करना था (देवोत्पाटन). ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति और कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में अंधविश्वासपूर्ण युक्तियों से भोले-भाले लोगों से पैसा उगाहने के लिए सुझाये गये उपायों से यह विचार खारिज हो जाता है कि हिंदू शासक वर्ग के लोग अपनी प्रजा के प्रति लगातार सहिष्णु रहते आये थे. पतंजलि केमहाभाष्य, यानी ईसा पूर्व 400 के लगभग के पाणिनी के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी पर ईसा पूर्व 150 के लगभग लिखित उनकी टीका के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अपना खजाना भरने के लिए मौर्य शासक धातु मूर्तियों को पिघलाते थे. अत: धन की अदम्य लालसा के चलते मौर्यों और अन्य शासकों ने धार्मिक मूर्तियों की पवित्रता तक को नहीं बख्शा.
Shah Nawaz said…
यार आप लोग क्यों यह निर्धारण करने में लगे हुए हो की वहा मंदिर था या नहीं? जबकि यह केस कोर्ट में चल रहा है, जहाँ सभी सबूतों और पक्षों को अच्छी तरह से देखा परखा जाएगा. मेरे विचार से अपने देश के कानून पर विश्वास जताते हुए, उसके फैसले को मन्ना ही सबसे उत्तम कार्य है. वैसे भी यहाँ ब्लॉग जगत में उस पर चर्चा करने से कडुवाहट बढ़ने के अलावा और कोई हल तो मुझे नज़र नहीं आता है..... क्या आपको नज़र आता है?

मेरे विचार से किसी भी धर्म अथवा महापुरुष के खिलाफ बातें ना तो करनी चाहिए और ना ही बर्दाश्त करनी चाहिए. हिन्दू धर्म के महापुरुष इस्लाम के और इस्लाम धर्म के महापुरुष हिन्दू धर्म के भी हो सकते हैं, इसकी पूरी सम्भावना है. इस हिसाब से एक-दुसरे को बुरा कहना अपने आप को ही बुरा कहना है.
और आखिर में डॉ अनवर जमाल का सम्पूर्ण समर्थन करते हुए सवाल पूछना चाहता हूँ कि अब आप लोग पोस्ट के मूल विषय पर भी अपने विचार रखें कि श्री रामचन्द्र जी अयोध्या में अब से कितने समय पहले पैदा हुए थे ? यह काल निर्धारण बहुत ज़रूरी है, इससे मीर बाक़ी के काम के सही या ग़लत होने का बड़ा संबंध है।

और अगर आप लोगों ने जवाब नहीं दिया तो वर्तमान में चल रही स्वच्छ सन्देश की लेख-श्रृंखला (Non-Muslim Thoughts about Islam-Part 1) के बाद यह सवाल पुनः उठाऊंगा....

उम्मीद है कि इस सवाल को अब और घुमाने-टलाने का प्रयास नहीं किया जाएगा।
शाह नवाज़ भाई मीडिया का इस्तेमाल हक के लिए करना गलत नहीं... अगर आप आंकड़ों पर नज़र डालेंगे कि इतिहास से लेकर वर्तमान में कौन कितनी कडवाहट घोल चुका है. सोचे समझे फिर किसी निर्णय पर पहुंचे. क्या आप अखबार में रोज़ रोज़ ये नहीं पढ़ते कि आज फलां जगह फलां मंदिर बनाने की क़सम खाई गयी, इतने लोगों ने मंदिर आन्दोलन के लिए गाँव गाँव शिविर लगाये... वगैर वगैरह

वहीँ क्या आपने कहीं ये सुना कि फलां लोगों ने शहीद मस्जिद को बनवाने की कसमें खाईं, इतने लोग इकट्ठे हो गए और मस्जिद बनवाने के आन्दोलन में हिस्सा लिया वगैरह वगैरह !!!

मैं भारत देश का एक ज़िम्मेदार पढ़ा-लिखा नौजवान हूँ और मैं इतनी तो समझ रखता ही हूँ कि सत्य क्या है... हाँ आपका यह कहना कि ऐसी बातें करने से माहौल खराब होगा... तो ये बात लाखों गैर - मुस्लिम ब्लॉगर्स के सोचने विषय होना चाहिए या गिनती के टी मुस्लिम ब्लॉगरों के !!!
कुछ अन्य तथ्य भी यहाँ बताना चाहता हूँ जो मैंने पिछले साल अपने ब्लॉग पर लिखा था कि ईसा पूर्व 1000-800 के ग्रंथ अथर्ववेद (10.2.31-33) में अयोध्या का सबसे पहला उल्लेख मिलता है और वह भी एक काल्पनिक नगर के रूप में. इसे देवताओं की नगरी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आठ चक्रों से घिरी है और नौ प्रवेश द्वारों से सज्जित है, जो सभी ओर से प्रकाश में घिरे हैं. संयुत्त निकाय (नालंदा संस्करण, खंड-3, पृष्ठ-358, खंड-4,पृष्ठ-162) में, जो लगभग ईसा पूर्व 300 का पालि ग्रंथ है, अयोध्या को गंगा नदी के कि नारे बसा हुआ दरसाया गया है, जिसका फैजाबाद जिले में सरयु नदी के किनारे बसी अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नही है. आरंभिक पालि ग्रंथ इस विचार का समर्थन नहीं करते कि गंगा शब्द का इस्तेमाल सरयू सहित सभी नदियों के लिए आम अर्थ में किया गया है. वे मही (गंडक ) और नेरजरा (फल्गू) नदियों सहित, जिनके किनारों पर बुद्ध ने पर्यटन किया था, बहुत-सी नदियों का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं. इनमें सरभू अथवा सरयू का भी उल्लेख है, पर एक ऐसे संदर्भ में, जिसका अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नहीं. वाल्मीकि रामायण के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक, मुनीशचंद्र जोशी ने अयोध्या को सरयू से कुछ दूरी पर ढूंढ़ निकाला. वाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड ईसा की आरंभिक सदियों में रचा गया है. उसके अनुसार अयोध्या सरयू से अध्यर्घ योजना दूर है. यह सस्कृंत अभिव्यित बालकांड (22.11) में भी मिलती है और टीकाकारों के मुताबिक इसका अर्थ है 6 कोस अथवा 12 मील. वे इसका अर्थ डेढ़ योजन लगाते हैं. इससे पुन: उलझन उठ खड़ी होती है क्योंकि वर्तमान अयोध्या तो सरयू तट पर स्थित है. यह नदी पूर्व की ओर बहती है तथा बलिया और सारन जिलों में इसे पूर्वी बहाव को घाघरा कहते हैं. सारन जिले में जाकर यह गंगा में मिल जाती है. सरयू अपना मार्ग बदलती चलती है. जिसकी वजह से कुछ विद्वान बलिया जिले के खैराडीह इलाके को अयोध्या मानना चाहते हैं. सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा अयोध्या की अवस्थिति के संबंध में प्रस्तुत साक्ष्य से भी कठिनाइयां उठ खड़ी होती हैं. उनके अनुसार अयोध्या कन्नौज के पूर्व दक्षिणपूर्व की ओर 600 ली (लगभग 192 किलोमीटर) दूर पड़ती थी और गंगा के दक्षिण की ओर लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित थी. अयोध्या को लगभग गंगा पर स्थित बता कर चीनी यात्री संभवत: उसकी अवस्थिति के बारे में आरंभिक बौद्ध परंपरा की ही पुष्टि करते हैं.
और आखिर में डॉ अनवर जमाल का सम्पूर्ण समर्थन करते हुए सवाल पूछना चाहता हूँ कि अब आप लोग पोस्ट के मूल विषय पर भी अपने विचार रखें कि श्री रामचन्द्र जी अयोध्या में अब से कितने समय पहले पैदा हुए थे ? यह काल निर्धारण बहुत ज़रूरी है, इससे मीर बाक़ी के काम के सही या ग़लत होने का बड़ा संबंध है।

और अगर आप लोगों ने जवाब नहीं दिया तो वर्तमान में चल रही स्वच्छ सन्देश की लेख-श्रृंखला (Non-Muslim Thoughts about Islam-Part 1) के बाद यह सवाल पुनः उठाऊंगा....

उम्मीद है कि इस सवाल को अब और घुमाने-टलाने का प्रयास नहीं किया जाएगा।
Mahak said…
शाहनवाज़ भाई से पूरी तरह सहमत हूँ , इस तरह की चर्चाएं करने से आपसी खटास और कड़वाहट के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा


महक
Mahak said…
इसने ये किया ,उसने वो किया ,इस मुस्लिम ने हिंदुओं को मारा ,उनके मंदिर तोड़े ,उस हिंदू ने मुस्लिमों को मारा आदि आदि बातों से कुछ नहीं मिलना
जो चीजें इतिहास में हुई उनका नतीजा उन्हें ही भुगतने दो जो उस समय थे ,वो वर्तमान की पीढ़ी यानी के हम सब क्यों भुगते और क्यों अपना समय व्यर्थ करें उस पर ?
हमें इतिहास की बजाये अपना वर्तमान ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि भविष्य में हमारा उदहारण देकर कोई ये ना कह सके की इस मुस्लिम ने ऐसा किया था और इस हिंदू ने ऐसा किया था

please let us now unite as Indians not as Hindus or Muslims

अगर हम एक हो गए तो दोनों धर्मों में जो भी नफरत फैलाने वाले तत्व हैं वो अपने आप पराजित हो जायेंगे क्योंकि उनकी सफलता सिर्फ एक ही चीज़ पर टिकी हुई है -हमारी अनेकता पर
जिस दिन ये अनेकता सम्पूर्ण रूप से एकता में तब्दील होगी उस दिन एक भी कट्टरपंथी या नफरत फैलाने वाला हिम्मत नहीं कर सकेगा ऐसा करने की

जो भी लोग गलत करते हैं तो ये मत देखो की ये हमारे धर्म के हैं या उसके धर्म के ,हिंदू हैं या मुस्लिम ,ये देखो की जो वे कर रहे हैं वो इंसानियत के खिलाफ है और हमारी एकता के प्रति खतरा है ,इसलिए बिना अपने धर्म का या उसके धर्म का सोचे उनका विरोध करो

हर धर्म में अच्छे और बुरे लोग हैं,हमारा फ़र्ज़ क्या
बनता है की उन बुरे लोगों की वजह से उस धर्म के अच्छे लोगों को भी बुरा कहें ?,उन बुरे लोगों की सज़ा उन अच्छे लोगों को भी दी जाए ? या फिर उन अच्छे लोगों को साथ में जोड़कर उन बुरे लोगों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ा जाए


महक
धन्यवाद, ऐसे लेख हिन्दुओं को जागरूक और सतर्क बनाए रखने में सहायक होते हैं।
टिप्पणियों को देख कर यह पता चलता है कि तथ्यों की तोड़ मरोड़, सन्दर्भ से कटी पेशकश और सुविधानुसार तथ्यों को छिपा कर बेहूदे प्रलाप करना इनके लिए सामान्य हैं चाहे पढ़े लिखे हों या अनपढ़।
इनकी मानसिकता कभी नहीं बदलेगी।
VICHAAR SHOONYA said…
वाह जनाब आपने तो एक विदेशी लुटेरे के नाम पर बनी ईमारत के समर्थन में हिन्दू आस्था के केंद्र भगवान श्री राम के अस्तित्व पर ही swaliya nishan laga दिया.

itna kyon pareshan होते हैं. mamala adalat में है. सभी bhartiy nagrik kort के fasle को manege. aap apni kalpnaon में kyon भगवान श्री राम पर vichaar करते हैं. uske लिए हिन्दू ही kafi हैं. aap तो allah पर apna dhyan kendrit karen. aap praman mang रहे ho कि भगवान राम kab paida hue, kahan paida hue. ऐसी ही khujali kisi dusare gadhe को ho और वो इस बात का praman mange कि जो pavitra avaj ya sandesh pagambar mohammad ne सुना था वो allah का ही था तो kya koi इस बात को pramanit कर payega.

और ye batao ki praman diye jane par kya aap log use swikar kar lete ho. pakistan ke sachche muslmano ko anek praman diye gaye kya unhone abhi tak unhe swikar kiya hai. apke ek dharm guru Osama Bin laden ko atakvadi nahin balki sataya hua nirdosh vyakti manate hain to treta yug me paida huye shri ram ke vishay me koi praman aap swikar karloge.

chhodo yaar in baton को और कुछ ese vishay पर apana dhyan kendrit kro jisse apka आपके samaj का और desh का कुछ bhala ho.

कुछ prerna indoneshiya के sachche musalmanon से lo जो aaj भी भगवान श्री ram कि jiwani का gun gan करते हैं और fal ful रहे हैं और idhar aap लोग ho जो ram कि dharti पर paida hokar एक विदेशी लुटेरे का तो समर्थन करते ho पर ram के अस्तित्व पर anguli uthate ho.
Anonymous said…
किसी ने ठीक ही कहा है ;
जिसका न कोई दीन-ईमान होता है,
वो मुस्लमान होता है .
जिसके दिल में न अपने देश और
दूसरे के धर्म का सम्मान होता है ,
वो मुस्लमान होता है.
nilesh mathur said…
अयाज़ साहब छोडिये इन सब बातों को, नफरत तो बहुतों ने फैलाई है आइये हम आपस में भाईचारा बढ़ाने कि बातें करें!
Dr. Ayaz ahmad said…
@गिरीवेश राव जी हमारा भी मकसद समाज मे जागरूकता लाना ही है और रही बात सही गलत तथ्यो की तो आप सही तथ्यो से अपनी बात रखे हम वह भी सबके सामने रखेगेँ कृप्या मूल प्रश्न का उत्तर भी दें @ विचार शून्य जी आप भी बात का जवाब देने के बजाए दूसरे विचार हमें बता रहे है हम सब भारतीय है हमे अपने सही इतिहास की जानकारी होनी ही चाहिए आप भी यह मानते होंगे की सभी भारतीय महापुरुष भारतीय मुसलमानो के भी पूर्वज है सिर्फ आप ही के नही।
नहीं मिलेगा उत्तर ! देख लीजिएगा !!

मेरे विचार में धर्म एक ऐसा मसला है, जिसके चक्कर में व्यक्ति अपनी सारी बौद्धिकता को एकांगी बना देता है। इसलिए इन बातों में पड़ना वक्त को बर्बाद करने के अलावा कुछ भी नहीं। क्योंकि ऐसी बहसों से न कुछ साबित हो सकता है और न ही कोई परिणाम ही निकलता है।

…………..
स्टोनहेंज के रहस्यमय… ।
चेल्सी की शादी में गिरिजेश भाई के न पहुँच पाने का दु:ख..
impact said…
जो लोग प्रण करते हैं की 'मंदिर वहीं बनायेंगे' कम से कम अपने किसी धर्मग्रन्थ में दिखा दे की राम लला जी 'वहीं' पैदा हुए थे.
Anonymous said…
ज़ाहील का मतलब क्या होता है ? ज़ाहील किसे कहते है ? ज़ाहील, ज़ाहीलिया, ज़ाहीलियत,
DR. ANWER JAMAL said…
@ विचार शून्य भाई ! बिल्कुल आपको हक़ है यह पूछने का कि क्या सुबूत है कि कुरआन ईश्वर की वाणी है। जैसे ईश्वर की तरह कोई नहीं होता ऐसे ही कोई भी उसके जैसी वाणी बनाने में समर्थ नहीं है। इसके संबंध में आप मेरा विस्तृत लेख देख सकते हैं।
इस स्पष्टीकरण के बाद उम्मीद है कि कोई न कोई भाई जन्मडेट भी बताने को राज़ी हो जाएंगे। प्लीज़ अब तो बता ही दीजिये।
Aslam Qasmi said…
डाक्टर अयाज़ ने एक अहम् सवाल उठाया ,इस पर टिपण्णी भी खूब आइ परन्तु जवाब किसी ने नहीं दिया , वजह यह हे कि इसका जवाब हे ,नहीं , और जवाब इस लिए नहीं कि अभी तो यह भी तय नहीं हुआ कि राम पैदा भी हुए हैं या नहीं , यह सवाल डॉ0 अयाज़ के सवाल से भी गंभीर हे ,परन्तु इन सवालों को कोई इस लिए नहीं उठता कि किसी कि भावनाओं को ठेस न पहुंचे ,हम ने इस को उठाने कि हिम्मत तब कि जब स्वयं कुछ हिन्दू विद्वानों ने इस परकार के सवाल उठाने आरम्भ कर दिए ,जैसा कि मालूम होगा कि मुख्य मंत्री करूणानिधि ने कहा था कि राम का अस्तित्व एसा ही झूट हे जैसा हिमालय का सच , समुद्र सेतु के मसले पर स्वयं भारत सरकार ने शपत पत्र के द्वारा कहा था कि राम एक अफ्सान्वी किरदार हे और उस के होने का कोई एतिहासिक परमाण नहीं हे , फिर उस ने वह शपत पत्र जल्दी में वापस भी लेलिया,था . क्यों कि उस पर कट्टरपंथियों ने वाविला मचा दिया था , परन्तु इस से यह तो पता चल ही गया कि राम कितने एतिहासिक हें ,राम को महात्मां गाँधी भी एतिहासिक नहीं मानते थे और उन्हों ने अपने द्वारा निकाले जा रहे अख़बार ,हरिजन में राम को एक अफ्सान्वी किरदार लिखा था ,तफसील और हवाले के लिए आप मेरी किताब ,जिहाद या फसाद , का अध्यन कर सकते हें..
ऐसे मैं सवाल खड़ा होता हे कि जब राम ही नहीं हुए तो जन्म भूमि कैसी ? परन्तु कौन मानता हे और कौन सुनता हे , यहाँ तो जिसका डंडा उस की भेंस हे , लेकिन सच बहरहाल सच हे ,
खून आखिर खून हे टपकेगा तो जम जाएगा
.
.
.
"बाबर इस देश मे आक्रमणकारी के तौर पर आया वह कब आया और कब तक उसने शासन किया और कब उसकी मृत्यु हुई यह सब ऐतिहासिक तथ्य मैं भी जानता हूँ और आप सब बुद्धिजीवी भी जानते ही होंगे लेकिन श्रीरामचंद्र जी कब पैदा हुए और कब से कब तक उन्होने शासन किया और कब उनकी मृत्यु हुई ये मैं नही जानता"

आदरणीय अयाज अहमद साहब,

आपका सवाल ही गलत है...

राम इस मामले में उपास्य हैं ठीक उसी तरह जैसे कि मस्जिद में अल्लाह की उपासना होती है... अब यह मामला तो आस्था व आस्था प्रतीकों का है...और आस्था प्रतीकों व उपास्यों की पैदाइश का दिन व जगह नहीं पूछी जाती!

रही बात विवादित इमारत को बनाने-बिगाड़ने-तोड़ने-दावा करने वालों की... तो यदि इन सब में बाबर व मीर बाकी ऐतिहासिक शखसियत हैं... तो दूसरे पक्ष के दावा करने वाले भी सचमुच के आदमी ही हैं।

भारत एक धर्म प्रधान देश है धर्म और न्याय एक दूसरे के पूरक है धर्म ही सही न्याय कर सकता है।

भारत धर्मप्रधान है यह मानता हूँ परंतु धर्म और न्याय एक दूसरे के कभी पूरक नहीं रहे और न ही धर्म सही न्याय कर सकता है... इस मामले में मैंने कभी यहाँ पर... लिखा भी था...

भगवा पक्ष:-
१-विवादित धर्मस्थल के मामले में अदालत का आदेश यदि हमारे पक्ष में आया तो हम उसे मानेंगे अन्यथा नहीं क्योंकि आस्था के फैसले अदालतों द्वारा नहीं दिये जा सकते।

हरा पक्ष:-
१-विवादित धर्मस्थल मामले में यदि अदालत का फैसला हमारे पक्ष में है तो मानेंगे अन्यथा नहीं क्योंकि हमारे धर्मग्रंथ के अनुसार जो जगह एक बार हमारा पूजास्थल बन गई वह सृष्टि के अंत तक पूजास्थल ही रहेगी।

अब आप बताइये निर्णय कैसे होगा ?


आभार!


...
Dr. Ayaz ahmad said…
प्रवीण शाह जी यह ठीक है इस्लाम मे जायज तरीके से बनी मस्जिद के स्थान पर कुछ और नही बन सकता पर मुसलमानो ने फिर भी कभी अदालत की अवहेलना की बात नही की । हमेशा यही कहा है कि हम अदालत के निर्णय का सम्मान करेंगे अगर साक्ष्यो के अभाव मे कुछ विरुद्ध भी फैसला आता है तब भी संविधान के दायरे मे रहकर ही मुस्लिम आगे बढ़ेंगे । अब दूसरा पक्ष क्या कहता है यह तो वही जाने ईश्वर उन्हे सदबुद्धि देगा हमारी तो यही दुआ है । इस्लाम तो विश्व शांति चाहता है इसलिए हमारा यकीन भी लड़ाई झगड़े मे नही है।
DR. ANWER JAMAL said…
देवबंद के आलिम श्री रामचन्द्र जी और श्री कृष्ण जी का सम्मान करते हैं और कहते हैं कि हो सकता है कि वे अपने दौर के नबी रहे हों क्योंकि कुल 1,24,000 नबी हुए हैं। इसलाम में नबी का पद इनसानों में सबसे बड़ा होता है।
ईश्वर, धर्म और महापुरूषों ने सदा लोगों क्षमा,प्रेम और त्याग की तालीम दी है। उनके नाम पर लड़ना-लड़ाना खुद को मालिक की नज़र से गिराना है।
कोर्ट कुछ भी फ़ैसला दे या देश में आग लगाउ तत्व कुछ भी कहें, मुसलमान को यह देखना है कि वह शांति को कैसे क़ायम रखेगा क्योंकि शांति उसके धर्म ‘इसलाम‘ का पर्याय है, शांति भंग करना या उसे होते देखना स्वयं इसलाम पर चोट करना या होते देखना है, जिसे कोई मुसलमान कभी गवारा नहीं करता और न ही उसे करना चाहिये।
वक्त की ज़रूरत है शांति। शांति बनी रहे तो देश का बौद्धिक विकास मानव जाति को उस मक़ाम पर ले जाकर खड़ा कर देगा जहां वे सत्य का इन्कार न कर सकेंगे। बहुत से पाखण्ड तो हमारे देखते-देखते दम तोड़ भी चुके हैं और बाक़ी कुरीतियां अपने समय का इंतेज़ार कर रही हैं। मुसलमान भी सब्र करें और वे काम करें जो करने के काम हैं और उस पर फ़र्ज़ किये गये हैं।
इनमें सबसे पहला काम हरेक जुर्म और पाप से तौबा है, अपना सुधार निखार और विकास है , दूसरों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करना है जैसा कि एक मुसलमान अपने लिये पसंद करता है। देश उनका दुश्मन नहीं है और न ही सारे देशवासी और थोड़ा बहुत उठापटख़ तो हर घर में चलती ही है, उसे हिकमत और सूझबूझ से सुलझाना चाहिये।
देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को कोई समझे या न समझे मुसलमान को तो समझना ही चाहिये। श्री रामचन्द्र जी ने भी यही संदेश अपने आचरण से दिया है, उनके अच्छे आचरण को अपनाना उनके प्रति अपने अनुराग को प्रकट करने के लिये मैं सबसे उपयुक्त तरीक़ा मानता हूं।
हदीस पाक में आया भी है कि हिकमत मोमिन की मीरास है, जहां से भी मिले ले लो।
DR. ANWER JAMAL said…
राम और रामचन्द्र जी में अन्तर है , कृपया अजन्मे ईश्वर और जन्म लेने वाले दशरथपुत्र को आपस में गड्डमड्ड न करें। सर्वज्ञ ईश्वर ही उपासनीय है वही सृष्टिकर्ता है । रामचन्द्र जी उपासक थे , उपासनीय नहीं। यह बात हिन्दू धर्मग्रंथों से ही प्रमाणित है।
Sharif Khan said…
P.N. Subramanian said...
मिंया शरीफ खान ने लिखा की मस्जिद उस जमीन पर नहीं बनाई जा सकती जो ......... बला-बला , अब एक मुसलमान यह बता दो की उस आकर्मंकारी बाबर ने मस्जिद के लिए वह जमीन कैसे पाई थी ?
अगर वह मिंया शरीफ खान के बताये तरीक से नहीं पाई गई तो वह मस्जिद अवैध हुई न या नहीं ?

जनाबे आली आप की बात के जवाब में इतना ही कहना काफी है कि राजशाही के नियमानुसार जीते हुए देश कि पूरी ज़मीन का मालिक राजा ही होता था इसलिए उसको पूरा अधिकार होता था कि किसी भी ज़मीन के किसी भी हिस्से का जैसा चाहे प्रयोग करे.
Ghulam Kundanam said…
मंदिर मस्जिद विवाद का हल वही सूफी, संत, फ़कीर मिलकर निकल सकते हैं जिनका सियासत और पैसों से कोई मतलब नहीं हो, जिनका कोई बैंक अकाउंट नहीं हो, जो अल्लाह - इश्वर के करीब हों, जिनमें कबीर जैसी स्पस्टवादिता हो, निडर हों, समाधान दोनों सम्प्रदायों के लिए सम्मानजनक हों, और सबसे अहम बात यह हों कि वहां के मूल निवासियों के हित में हो. हमें मिलकर यैसे सूफी, संत, फ़कीर लोगों की तलास करनी चाहिए.

-ग़ुलाम कुन्दनम,
सिटिज़न ऑफ़ आजाद हिंद देश (पाकिस्तान+इंडिया+बंगलादेश)
http://www.facebook.com/profile.php?id=100001040727520&v=wall
Anonymous said…
Hi Thanks for such a perfect submit and the evaluation, I'm completely impressed! Maintain stuff like this coming.
Dr. shyam gupta said…
सब बेकार की कहानियां होरही हैं...सीधा सा उत्तर है कि----

---आपको कैसे पता कि बाबर यहां कब आया---अन्ग्रेज़ की लिखी किताब से ही न ...क्या किताब/इतिहास लिखने वाला बाबर के टाइम में मौज़ूद था? इतिहास की किताबों में पूरा सच नहीं, झूठ भी होता है...
--- इसी प्रकार जब से किताबें लिखना प्रारम्भ हुआ है .. राम का जन्मस्थल ..जन्म समय सब उनमें लिखा हुआ है.. दोनों में एक को सच दूसरे को झूठ क्यॊं माना जाय...
---- इसलिये अपने देश की बात को सच ..आकरमणकारी को झूठ माना जाना चाहिये...
Ghulam Kundanam said…
अयोध्या मसले का समाधान मैंने अपने दो नोट में लिखा है लिंक है:-

1. http://www.facebook.com/note.php?note_id=170258016323398
2. http://www.facebook.com/note.php?note_id=164288403587026


Jai Anna….. Jai Awam..…
Jai Janta.....Jai Janlokpal...
ॐ . ੴ . اللّٰه . † …….
Om.Onkar. Allâh.God…..
Jai Hind! Jai Jagat (Universe)!

Regards!
-Ghulam Kundanam,
9931018391.
ravi said…
aap ram ji ko mante hoo kehteho oh ek raja the or lakho varsh pehle the yani aapne ram ke astitv ko mana . ab aap uneh kiya mante hoo ye aap ki marji . lekin oh hindino ke bhagvan he or un bhagvan ka janam ayodhiya me hua or oh unka rajiye or nivas esthan tha yni ayodhiya bhagvan ram ki nagri thi. ye aap mante hoo . too ye hinduno ka lakho varsh purana tirth esthal huva.jab ye hinduno ke bhagvan ki tirth esthali he dharm esthali he janam esthali he . too us nagri us esthan par masjit kinyo . ?
ravi said…
bharat ne kabhi kisi par hamla nahi kiya oh apni jamin par hi raha muslim bahar se aaye unhone bharat ki bhumi par akrman karke kabja kiya too galat muslim huve na dusro ki jamin par kabja karna. kuch varsho pehle ye sirf hindu rasht tha muslim ka namo nishan nahi tha. too masjit ka hak kese or ram too lakho varsh pehle se the too es desh or ayodhiya par pehla huk hindu or ram ji ka banta he na . jab muslim hi es desh me nahi the too masjit kanah se aayi . ye saaf he ki akrman karke banayihe . or ye aaj bhi ho raha he . chalaki se dadagiri se beimani se agar iman dar hote too hindu rasht par hamla hi kinyo kiya or kiya too hindu dharm isthal hi mele masji banake liye . aapko aap ke logo ne galat jankari dekar bhramit kiya gaya he or kiya jaraha he .
ravi said…
ab hinduno ko muslim sikhanyenge gi hindu dharm kiya he . samne walo ko goli maro or usi ko galat bata do kiya baat he .
ravi said…
aap log ne itihas ko hi badal diya apni kalpnik budhi ke itihas se. hum jo ke rahe he esa hua hoga esliye essa kiya hoga andaje se woh sahi he or puri duniya kai praman sahit itihas ko janti he itihas ke panno me darj he jisko matr 500 saal hi huve he jada purani baat bhi nahi he . usse aap galat bata rahe he . itihas thoda parivartan or parivardhan ho sakta he jese hajaro varsh purane itihas me 100% sachai me 80se 75 % sachai rahe or 20-25% baad me kalpnik daldi jasake lekin pura hitihas hi galat hoo nye nahi ho sakta . satiye ko pura mitane ki kosis milekhch log jarur karte he lekin mita nahi pate uska koi na koi praman mil hi jata he .
ravi said…
wese koi kisi ko goli mare or usi par arop lagaye ye too hasiya prad he . humare desh par kuch warsh pehle akraman kiya or phir usse apna bhi batane lage itna hamara tha etna tumahara banta he . jabki kisi ke ghar par koi kabaja kare too uska kuch bhi nahi hota he usko bahar hi jana niyay he . wapas jana hi niyay he . me pure hindustan ki baat kar raha hoo . ram janam esthan or ayodhiya ki too baat chodh doo . janam esthan ki baat kinyo kare puri ayodhiya hi ramji ki thi hinduno ke bhagvan hinduno ka tirth esthal . kisi ke desh ( ghar ) ko na sahi uske tirth esthal (ek kamra ya kona ) ko too insniyat ke naate chodh doo .
ravi said…
sarif khan ji apne too satiye dharm or insaniyat ki paribhasa hi badal di aapka matlab jiske pass jada takat he oh apni takat ka upyog karke kuch bhi kar sakta he . kisi ki jamin par kabja karna hathiyana akrman karna unke dharm isthal ko todhkar apne esthan banna ese aap acha kese keh sakte he koi mandir todh kar masjit banata he too oh ye apni jid apni takat or apni dadagiri or dabdaba dikhane ke liye esa karta he dham ki bhavna se nahi kinyo ki ishwar to esse swikar karta hi nahi he. pehli baat too kisi desh ya rajiye par jabar dasti or durbhavna se akrman karna hi paap he galat he. bhartiye rajano ne kabhi bharat se bahar kisi desh par hamla nahi kiya hana aniyay ke virudh awaj jarur uthai he or usse sudhara he . dharm ki isthapna ki he. or bharat me bhi kisi raja ne esa ghinona kam kiya he too galat kiya he . lekin aap too bahar se akar kisi ke ghar ko chinte hoo or usse sahi kehte hoo kiya kuran or allaha yahi sikhate he yahi kehte he . ram ji ne sahi tarike se chalne wale rajinyo par akraman nahi kiya . aniyay or adharm se rajiye chalane walo or janta par atiyachar karne walo ko sudhara ya phir us raja ko hatha kar ache raja ko bethaya . or sari prathivi ko apni dekh rekh me chalaya taki koi adharm or paap nahi kar sake. lekin kisi rajiye par kabja ya aniyay todh phodh ya kisi ke dharm ko chinn bhinn nahi kiya todha nahi . satiye santi or sachhe dharm ki isthapna ki or galat riti tarike or anniyay ko roka . apne rajiye me bethkar. lekin babar ne akrman kiya atiyachar kiya adharm kiya mandiro ko todha masjite banai . ye sab papp he or aap kehe rahe he jiska kabja oh kuch bhi kare . ese too koi bhi kisi ke bhi ghar me apni takat se ghush jaye or unki orrto baccho dharm esthal ke saath kuch bhi kare . sabash .tumne too paribhasa hi badal di
ravi said…
vese esvar jo karega vahi hoga kalug he achi chije lupt hogi or adharminyo ke bich me adharmi chij hi bachegi ye isvar ki iccha he . jo dhire dhire aage hoga . behas karne se koi matlab nahi such too such he .baki isvar jab jo chahega vahi karega
sandeep kumar said…
bhaiji ramji ke janam ki date janne se pahle main aap ko ram sabad ka matlab batana chaunga ram sabad ka matlab hai ramahua jo sabhi janghe ramahua hai aur sabhi jangha main aap ka jism bhi aata hai
आपको व हमको सभी को यह पता है कि आक्रमांकारी लुटेरा विदेशी शासक बाबर इस देश की संपत्ति और युवतियो को लूटने कब आया और कितना लूटकर ,किस समय वापस चला गया । क्यो कि यह कई हजारो साल पहले की नहीं बल्कि कुछ सौ साल पहले की बात है, लेकिन यदि हम बात मोहम्मद की करते है तब उसमे आप बाबर की तरह मोहम्मद के सभी खानदान और दूर दूर के कुनबो के प्रामाणिक नाम नहीं बता पाएंगे। क्यो कि मोहम्मद बाबर से काफी पुराना है। लेकिन जब बात हमारे, आपके और इस देश के प्रभु श्री राम की आती है तब आपका उनके बारे मे इस तरह से अज्ञानता दिखाना किसी हद तक मे जायज समझ सकता हू,क्यो कि जब आप मोहम्मद के माता पिता के कुल के बारे मे कोई जानकारी नहीं रखते है तो फिर कई हजार वर्ष पहले श्री रामचन्द्र जी के बारे मे जानने मे आप दिलचस्पी भी क्यो लेंगे? अगर आप वास्तव में अपनी पोस्ट के जरिये जो भावना दिखा रहे है अगर वो सही है तो कई लाख वर्ष पहले बनाए गए श्रीराम सेतु जिसको कि सन 2008 मे नासा ने भी अपनी सेटेलाइट से कवर करके और पूरी तरह छानबीन करके उसको कई लाख पहले बनाया गया मानवनिर्मित सेतु स्वीकार किया है पूरे विश्व के सामने..और आपकी जानकारी के लिए मे आपको बतादू अयोध्या के पुत्र प्रभु श्री राम के द्वारा ही रामसेतु का निर्माण कराया गया था। ये हमारे इतिहासग्रंथो मे हजारो वर्षो से वर्णित है पूरे दृष्टांत सहित ...जैसे कि रामसेतु की लबाई व चौड़ाई भी वर्णित है ...नासा ने भी इसकी पुष्टि की...और श्रीलंका तक के लिए बनाया गया था , ये भी रामायण मे लिखा है , इसकी भी पुष्टि नासा ने की.... और ये भी बतादु , रामायण के अतिरिक्त विश्व की कोई भी धार्मिक या अन्य कैसी भी पुस्तक या प्राचीन शिलालेख आलेख आदि में रामसेतु के निर्माण पर अपने योगदान का आधिपत्य नहीं जताया है और न ही कही वर्णन ही है, तो इस सत्य को आप अस्वीकार नहीं कर सकते ?? और इन सब प्रमाणो के बावजूद इस सत्य को अस्वीकार करते है और राम की प्राचीनता को स्वीकार करने से मना करते है तो ये बिलकुल उस तरह से है कि कोई अनाथ , समझे कि हमे पिता का नाम नहीं पता तो किसी को भी अपने पिता का कुल नाम नहीं पता होगा...

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