Saturday, July 3, 2010

इस्लाम का अंतिम उद्देश्य दुनिया में सत्य और शांति की स्थापना और आतंकवाद का विरोध है:- स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य


हज़रत मुहम्मद सल्ल. की पवित्र जीवनी पढ़ने के बाद मैने पाया कि आप सल्ल. ने एकेश्वरवाद के सत्य को स्थापित करने के लिए अपार कष्ट झेले। मक्का के क़ाफ़िर सत्य धर्म की राह मे रोड़ा डालने के लिए आप को तथा आपके बताए सत्य पर चलने वाले मुसलमानो को लगातार तेरह साल तक हर तरह प्रताड़ित व अपमानित करते रहे। इस घोर अत्याचार के बाद भी आप सल्ल. ने धैर्य बनाए रखा। यहाँ तक कि आपको अपना वतन मक्का छोड़ मदीना जाना पड़ा। लेकिन मक्का के मुश्ऱिक कुरैश ने आप सल्ल. का व मुसलमानो का पीछा यहाँ भी नही छोड़ा। जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो अपनी व मुसलमानो की तथा सत्य की रक्षा के लिए मजबूर होकर आप को लड़ना पड़ा । इस तरह आप पर व मुसलमानो पर लड़ाई थोपी गई। इन्ही परस्थितियोँ मे सत्य की रक्षा के लिए जेहाद (यानी आत्मरक्षा व धर्मरक्षा के लिए धर्मयुद्ध) की आयतेँ और अन्यायी तथा अत्याचारी क़ाफ़िरो और मुश्ऱिको को दंड देने वाली आयतेँ अल्लाह की और से उतरी। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. द्वारा लड़ी गई लड़ाईयां आक्रमण के लिए न होकर, आक्रमण व आतंकवाद से बचाव के लिए थी, क्योंकि अत्याचारियों के साथ ऐसा किए बिना शांति की स्थापना नही हो सकती थी । अल्लाह के रसूल सल्ल. ने सत्य तथा शांति के लिए अंतिम सीमा तक धैर्य रखा और धैर्य की अंतिम सीमा से युद्ध की शुरुआत होती है। इस प्रकार का युद्ध ही धर्मयुद्ध यानी जेहाद कहलाता है। विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि कुरैश जिन्होने आप व मुसलमानो पर भयानक अत्याचार किए थे फतह मक्का के दिन थर थर कांप रहे थे कि आज क्या होगा? लेकिन आप सल्ल. ने उन्हे माफ कर गले लगा लिया । पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. की पवित्र जीवनी से सिद्ध होता है कि इस्लाम का अंतिम उद्देश्य दुनिया में सत्य और शांति की स्थापना और आतंकवाद का विरोध है। अतः इस्लाम को हिंसा व आतंक से जोड़ना सबसे बड़ा असत्य है । यदि कोई ऐसी घटना होती है तो उसको इस्लाम से या संपूर्ण मुस्लिम समुदाय से जोड़ा नही जा सकता। (इस्लाम आतंक या आदर्श 19-20)

18 comments:

Anonymous said...

जैसा की कश्मीर में है शांति.......????

MLA said...

कश्मीर के इश्यु का उपरोक्त लेख से क्या सम्बन्ध भाई? ज़रूरी नहीं की सभी मुसलमान इस्लाम के संदेशों के हिसाब से ही ज़िन्दगी गुज़रते हो....... इस्लाम और मुसलमान एक भी हो सकते हैं और अलग भी.

MLA said...

कश्मीर के इश्यु का उपरोक्त लेख से क्या सम्बन्ध भाई? ज़रूरी नहीं की सभी मुसलमान इस्लाम के संदेशों के हिसाब से ही ज़िन्दगी गुज़रते हो....... इस्लाम और मुसलमान एक भी हो सकते हैं और अलग भी.

सहसपुरिया said...

इस्लाम का अंतिम उद्देश्य दुनिया में सत्य और शांति की स्थापना और आतंकवाद का विरोध है। अतः इस्लाम को हिंसा व आतंक से जोड़ना सबसे बड़ा असत्य है ।

Anonymous said...

अजनबी भाई नाइस पोस्ट कहो

S.M.Masoom said...

achchi post hai

Ayaz ahmad said...

स्वामी जी ने इस्लाम का बिल्कुल सही विश्लेषण किया है

Ayaz ahmad said...

अनामी भाई आप जो कश्मीर का मसला उठाए बैठे हो ,क्या पाकिस्तानी हो?

Anonymous said...

इन्ही परस्थितियोँ मे सत्य की रक्षा के लिए जेहाद (यानी आत्मरक्षा व धर्मरक्षा के लिए धर्मयुद्ध) की आयतेँ और अन्यायी तथा अत्याचारी क़ाफ़िरो और मुश्ऱिको को दंड देने वाली आयतेँ अल्लाह की और से उतरी। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. द्वारा लड़ी गई लड़ाईयां आक्रमण के लिए न होकर, आक्रमण व आतंकवाद से बचाव के लिए थी, क्योंकि अत्याचारियों के साथ ऐसा किए बिना शांति की स्थापना नही हो सकती थी ।

झंडागाडू said...

इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके muslim होने की उम्मीद नहीं।-पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार

झंडागाडू said...

इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके muslim होने की उम्मीद नहीं।-पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार

झंडागाडू said...

इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके muslim होने की उम्मीद नहीं।-पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार

झंडागाडू said...

इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके muslim होने की उम्मीद नहीं।-पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार

HAKEEM YUNUS KHAN said...

रब का मिज़ाज रहमत वाला है। उसका सच्चा बन्दा भी वही है जिसका मिज़ाज रहमत वाला है।

सूबेदार said...

स्वामी जी ने क्या पढ़ा नहीं मालूम लेकिन इस्लाम और शांति,इस्लाम और प्रेम यह समझ से परे है इस समय तो इस्लाम क़ा केवल एक ही अर्थ है हिंसा और आतंकबाद.
हो सकता हो स्वामी जी किराये क़े पढ़ाकू हो .

Ayaz ahmad said...

दीर्घतमा जी आप पूर्वाग्रह से ग्रस्त है इसलिए आपको स्वामी जी ही किराए के लगने लगे आपको शायद पता नही स्वामी जी का भी आपका वाला ही हाल था

Ayaz ahmad said...

लेकिन स्वामी जी ने पूर्वाग्रह छोड़ सच्चे दिल से इस्लाम को पढ़ा और उनकी गलतफहमी दूर हो गई आप भी ऐसा ही करें क्योकि इस्लाम सबकी ज़रूरत है

S.M.Masoom said...

स्वामी जी ने सत्य कहा है. कुरान की नसीहत भी यही है, और स्वामी जी ने कुरान पढ़ के यह बात कही है. मुस्लमान और कुरान अगर एक जैसे हो जाएं तो शायद किसी को कुछ कहने का मौक़ा ही ना मिले.

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