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Showing posts from July, 2010

मेरा भाई शाहनवाज़- डॉ. अयाज़ अहमद

आज १९ जुलाई है आज मेरी ज़िन्दगी का वह दिन है जो मुझे हमेशा याद रहेगा आज ही के दिन मेरा प्यारा भाई शाहनवाज़ अहमद मुझसे हमेशा के लिए जुदा हो गया था एक साल गुज़रने के बाद और उसका होना जैसे कल ही की बात लगती है . इस एक साल का कोई एक दिन कोई पल ऐसा नहीं गुज़रा जिसमे मैंने उसे याद न किया हो. भी वह अपनी यादों के साथ मेरे दिल के करीब है. हर आदमी की अच्छाइयां ही उसकी यादों के साथ आती है और शाहनवाज़ मे तो बहुत सारी अच्छाइयां थी जो मुझे उसे भूलने नहीं देती और रह रह उसकी याद आती रहती है .हम कुल सात भाई बहन थे जिसमे से दो हम यानि एक मै और दूसरा शाहनवाज़ था और बाकी पांच बहने है ज़िन्दगी बहुत हंसी ख़ुशी के साथ गुज़र रही थी लगता था की ज़िन्दगी बड़ी आसान है कयोंकि मेरी सारी मुश्किलात का हल तो शाहनवाज़ था उसके शब्दकोष मे मेरे काम के लिए न नाम का कोई शब्द नहीं था वोह मुझसे तकरीबन १० साल छोटा था मगर घर या क्लिनिक का कोई भी काम हो ही नहीं सकता था उसकी उम्र तकरीबन २० साल थी लेकिन इस छोटी उम्र मे वह बड़े काम आसानी से कर लेता थामरीजों की खिदमत और दीन की दावत उसका शोक था हर साल देवबंद में लगने वाल…

ईश्वर की निगाह में कौन छोटा है ? कौन बड़ा ?DR. AYAZ AHMAD

ईश्वर ने दुनिया को व्यक्ति के लिए एक परीक्षा के तौर पर बनाया है । वह किसी को कुछ देकर परीक्षा ले रहा है और किसी को न देकर। किसी को एक चीज़ ज्यादा दी है, तो किसी को दूसरी चीज़। जब इंसान किसी चीज़ के मिलने पर ईश्वर का शुक्र अदा करता है और न मिलने पर सब्र करता है, तो वह इस परीक्षा में पास हो जाता है । जब इंसान किसी चीज़ के मिलने पर घमंड और न मिलने पर शिकायत करता है , तो वह इस परीक्षा में नाकामयाब हो जाता है। इंसान को ईश्वर ने बनाया है । इंसान को छोटा या बड़ा समझने की असल कसौटी वही होगी जो ईश्वर ने बताई है और वह है तक़वा (piousness) अर्थात ईश्वर का डर, जो इंसान को नेक बनाता है। जो इंसान ज्यादा नेक है वह ज्यादा अच्छा है और जो कम नेक है वह कम अच्छा है। और जो बिल्कुल नेक नही, वह बुरा है । ईश्वर की निगाह में जो इंसान नेक है वह बड़ा है और जो नेक नही है वह छोटा यानी कमतर है। "वास्तव मे अल्लाह के यहाँ तुम मे सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है , जो तुम में सबसे अधिक (अल्लाह का) डर रखता हो"। (क़ुरआन 49:13)

Suicide आत्महत्या की प्रवृत्ति पर रोकथाम का एकमात्र उपाय है इस्लाम - डॉ अयाज़

आत्महत्या आज का एक मात्र सामाजिक मसला है और आज हजारों लोग रोजाना आत्महत्या करते हैं. आखिर वह अपनी जान क्यों लेते हैं ? और क्या चीज़ उन को इस भयानक क़दम को उठाने पर मजबूर करती है, और वह क्या तरीका है जो उनके क़दम को आत्महत्या की तरफ बढ़ने से रोक सके ? इस विषय पर इस्लामी विद्वान् मौलाना मुहम्मदुल्लाह ख़लीली क़ासमी साहब ने भरपूर रौशनी डाली है. उनका ब्लॉग है: http://deoband.livejournal.com/

ADDRESSING THE MENTALITY OF SUICIDE

Muhammadullah Khalili Qasmi

Suicide, or self-killing, is a global phenomenon and has been known in every culture and society. The taking of one’s own life is the most private of acts. Suicide is the extreme step that a human been decides to put an end to his life. It is not only the result of a mere negative thinking or shallow consideration, but one is compelled to take this ‘extreme step’ only when he finds all the roads blocked and no way out.

The recent years have witnessed an alarming rise in the ratio of suicides across the world. Unlike the previous records, youn…

मानवता को पेश आने वाली किसी भी समस्या के समाधान में क़ुरआन मास्टर की (MASTER KEY) है DR.AYAZ AHMAD

बड़े -बड़े पुस्तक भंडार और बड़े -बड़े पुस्तकालय भी क़ुरआन का बदल नही बन सकती ।दुनिया के बड़े-बड़े बुद्धिजीवी ,दार्शनिक, विचारक , और स्कालर पूरी-पूरी ज़िँदगी खपा कर भी जीवन की जिन समस्याओं एवं गुत्थियोँ को सुलझाने में असफल रह गए , उन्हे क़ुरआन ने केवल शब्दों और एक-एक वाक्य में सुलझा दिया है । मानवता को पेश आने वाली किसी भी समस्या के समाधान में क़ुरआन मास्टर की (MASTER KEY ) है। (अबुल आला मोदूदी- हयात व ख़िदमात)

इस्लाम का अंतिम उद्देश्य दुनिया में सत्य और शांति की स्थापना और आतंकवाद का विरोध है:- स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य

हज़रत मुहम्मद सल्ल. की पवित्र जीवनी पढ़ने के बाद मैने पाया कि आप सल्ल. ने एकेश्वरवाद के सत्य को स्थापित करने के लिए अपार कष्ट झेले। मक्का के क़ाफ़िर सत्य धर्म की राह मे रोड़ा डालने के लिए आप को तथा आपके बताए सत्य पर चलने वाले मुसलमानो को लगातार तेरह साल तक हर तरह प्रताड़ित व अपमानित करते रहे। इस घोर अत्याचार के बाद भी आप सल्ल. ने धैर्य बनाए रखा। यहाँ तक कि आपको अपना वतन मक्का छोड़ मदीना जाना पड़ा। लेकिन मक्का के मुश्ऱिक कुरैश ने आप सल्ल. का व मुसलमानो का पीछा यहाँ भी नही छोड़ा। जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो अपनी व मुसलमानो की तथा सत्य की रक्षा के लिए मजबूर होकर आप को लड़ना पड़ा । इस तरह आप पर व मुसलमानो पर लड़ाई थोपी गई। इन्ही परस्थितियोँ मे सत्य की रक्षा के लिए जेहाद (यानी आत्मरक्षा व धर्मरक्षा के लिए धर्मयुद्ध) की आयतेँ और अन्यायी तथा अत्याचारी क़ाफ़िरो और मुश्ऱिको को दंड देने वाली आयतेँ अल्लाह की और से उतरी। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. द्वारा लड़ी गई लड़ाईयां आक्रमण के लिए न होकर, आक्रमण व आतंकवाद से बचाव के लिए थी, क्योंकि अत्याचारियों के साथ ऐसा किए बि…