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इस्लाम ही सबके हक़ पूरे करने का सही रास्ता बताता है

दुनिया मे जितने भी पैग़म्बर (संदेष्टा) उन सब की एक ही आवाज़ थी और वह है हक़ूक़ का पूरा करना , हक़ दो तरह के होते हैं एक अल्लाह के हक़ जैसे इबादत नमाज़ रोज़ा ज़कात वग़ैरा इनका सीधा अल्लाह से संबद्ध है दूसरे हक़ूक़ुलइबाद यानी बंदो के हक़। अल्लाह के जो हक है उन को अदा करने की भी सख्त ताक़ीद की गई है लेकिन इस के बावजूद इस कद्र खतरनाक नही जिस तरह बंदो के हक अदा न करने पर इंसान को बताया गया है ।इसी लिए किसी भी संदेष्टा का तरीका चाहे जो रहा हो पर सारे संदेष्टाओ ने अपनी क़ौमोँ को बंदो के हक की तरफ खास शिक्षा दी है। इबादत रोज़ा नमाज़ ज़कात वगैरा मे कमी रहने पर अल्लाह की रहमत से माफी की उम्मीद है मगर बंदो के हक खा लेने वाले व्यक्ति को माफी की कोई उम्मीद नही है। इसी लिए हज़रत मुहम्मद स.ल.व. ने तमाम मुसलमानो को हिदायत दी कि जो व्यक्ति किसी मुसलमान भाई का जो कोई हक रखता हो और वह हक बुराई करने रुहानी व जिस्मानी नुकसान पहुँचाने का हो या इज़्ज़त का हो या धन से संबंध,किसी का नाहक क़त्ल वगैरा या किसी और चीज़ के बारे मे हो तो उसको चाहिए कि इस हक को आज ही के दिन यानी इस दुनिया मे माफ करा ले इस से पहले वह दिन आए जब न तू दरहम रखता होगा और न दिनार जो उस के हक के बदले के तोर पर दे सके अगर दुनिया मे ही माफ नही कराया तो ज़ालिम के आमालनामे मे जो नेकी होंगी , तो ज़ुल्म के बराबर नेकीया ले ली जाएँगी और मज़लूम या हकदार को दे दी जाएँगी और अगर ज़ालिम नेकीयाँ नही रखता होगा तो इस सूरत मे मज़लूम या हकदार के गुनाहोँ मे से इस के हक के बक़द्र गुनाह लेकर ज़ालिम पर लाद दिए जाएँगे। ( सही बुख़ारी)

Comments

Sharif Khan said…
हक-तल्फ़ी गुनाह है और हक-तल्फ़ी के अलावा कोई बात गुनाह नहीं. क्योंकि जब कोई शख्स गुनाह करता है तो सबसे पहले woh apne nafs के खिलाफ kaam karke apne nafs ka हक marta है.
MLA said…
This comment has been removed by the author.
MLA said…
बहुत अच्छी और हक बात कही आपने डॉ अयाज़ साहब.
डॉ अयाज़ साहब बेहतरीन जानकारी के लिए धन्यवाद
Anonymous said…
nice post
Dr. Ayaz ahmad said…
शुक्रिया MLA साहब,VOICE OF PEOPLEउमर भाई,शरीफ खान साहब और मौलाना असलम क़ासमी साहब

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