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दुनिया को औरत की इज़्ज़त का सबक़ इस्लाम ने दिया

दुनिया को औरत की इज़्ज़त व अहतराम का सबक इस्लाम ने दिया है। हज़रत मुहम्मद स.ल.अ. ने पहली बार इंसानियत को औरतो की अज़मत से वाकिफ कराया दुनिया को सबक़ दिया कि लड़के और लड़कियो की परवरिश मे भेदभाव न करे,लड़कियो को शिक्षा देने का हुक्म दिया। माँ के कदमो के नीचे जन्नत करार दिया। जबकि पश्चिमी सभ्यता ने औरत को सिर्फ ज़िल्लत का और उपभोग का सामान बना दिया औरत को हवस और देखने की चीज़ बना दिया औरत की तरक्की का झंडा बरदार पश्चिम नाज़ुक औरत का लिहाज़ करने के बजाए औरत को मर्द बनाकर बराए नाम तरक्की देना चाहता है। जबकि इस्लाम औरत को कद्र और इज़्ज़त की निगाह से देखने के लिए कहता है। औरतो की वजह से दुनिया मे ज़्यादा बिगाड़ फैले हुए है इसलिए सुधार मे भी औरतो को ज़्यादा बड़ा किरदार अदा करने की ज़रूरत है। अल्लाह ने औरत को कुछ कर गुज़रने की ताकत ज़्यादा दी हुई है अगर औरत अपनी इस ताकत का उपयोग समाज सुधार, गलत रस्मोँ का ख़ात्मा और नैतिकता के बिगाड़ को दूर करने मे करें तो दुनिया मे शांति स्थापित होने से कोई ताकत नही रोक सकती।

Comments

Dr. Ayaz ahmad said…
इस्लाम मे सभी लोगो के हक तय है उनमे औरत भी शामिल है
Shah Nawaz said…
आपने बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया आयाज़ साहब! बहुत खूब!
जिन्दा लोगों की तलाश!
मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!


काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
bahut khoob naye blog ka istaqbal hai !
यह जान के आश्चर्य होगा की जो पश्चिमी सभ्यता जो बराबरी के दर्जे और आज़ादी के नाम पे जो महिलाओं को नग्नता के लिए प्रोत्साहित करती है, उसमें इंग्लैंण्ड में महिलाएँ वोट देने के अधिकार से 1918 तक वंचित रहीं। अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने Bradwell Vs.lllnois (1873) में व्यवस्था दी है कि विवाहित महिलाएँ व्यक्ति की श्रेणी में नहीं हैं और वकालत नहीं कर सकतीं। अमेरिका में 21 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को मत देने की अनुमति अमेरिकी संविधान के 19वें संशोधन (1920) के द्वारा ही मिल पायी।

वर्तमानसम्यता ने महिला के सौन्दर्य तथा आकषर्ण से लाभ उठाते हुए और स्वतंत्रता तथा बराबरी के नाम पर उसे अपने स्वाभाविक तथा मानवीय नियमों के मुकाबले में खड़ा कर दिया है। पश्चिमी महिला जो वेल ड़ोरेन्ट के अनुसार 19 वीं शताबदी के आंरम्भिक काल तक मानवधिनारों से वंचित की, आकस्मिक रूप से लालची लोगों के हाथ लग गई।
E-Guru Rajeev said…
हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

मेरी इच्छा है कि आपका यह ब्लॉग सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छुए. यह ब्लॉग प्रेरणादायी और लोकप्रिय बने.

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शुभकामनाएं !


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