Wednesday, June 30, 2010

इस्लाम ही सबके हक़ पूरे करने का सही रास्ता बताता है

दुनिया मे जितने भी पैग़म्बर (संदेष्टा) उन सब की एक ही आवाज़ थी और वह है हक़ूक़ का पूरा करना , हक़ दो तरह के होते हैं एक अल्लाह के हक़ जैसे इबादत नमाज़ रोज़ा ज़कात वग़ैरा इनका सीधा अल्लाह से संबद्ध है दूसरे हक़ूक़ुलइबाद यानी बंदो के हक़। अल्लाह के जो हक है उन को अदा करने की भी सख्त ताक़ीद की गई है लेकिन इस के बावजूद इस कद्र खतरनाक नही जिस तरह बंदो के हक अदा न करने पर इंसान को बताया गया है ।इसी लिए किसी भी संदेष्टा का तरीका चाहे जो रहा हो पर सारे संदेष्टाओ ने अपनी क़ौमोँ को बंदो के हक की तरफ खास शिक्षा दी है। इबादत रोज़ा नमाज़ ज़कात वगैरा मे कमी रहने पर अल्लाह की रहमत से माफी की उम्मीद है मगर बंदो के हक खा लेने वाले व्यक्ति को माफी की कोई उम्मीद नही है। इसी लिए हज़रत मुहम्मद स.ल.व. ने तमाम मुसलमानो को हिदायत दी कि जो व्यक्ति किसी मुसलमान भाई का जो कोई हक रखता हो और वह हक बुराई करने रुहानी व जिस्मानी नुकसान पहुँचाने का हो या इज़्ज़त का हो या धन से संबंध,किसी का नाहक क़त्ल वगैरा या किसी और चीज़ के बारे मे हो तो उसको चाहिए कि इस हक को आज ही के दिन यानी इस दुनिया मे माफ करा ले इस से पहले वह दिन आए जब न तू दरहम रखता होगा और न दिनार जो उस के हक के बदले के तोर पर दे सके अगर दुनिया मे ही माफ नही कराया तो ज़ालिम के आमालनामे मे जो नेकी होंगी , तो ज़ुल्म के बराबर नेकीया ले ली जाएँगी और मज़लूम या हकदार को दे दी जाएँगी और अगर ज़ालिम नेकीयाँ नही रखता होगा तो इस सूरत मे मज़लूम या हकदार के गुनाहोँ मे से इस के हक के बक़द्र गुनाह लेकर ज़ालिम पर लाद दिए जाएँगे। ( सही बुख़ारी)

Monday, June 28, 2010

न्याय कैसे होगा?

पुरस्कार और दंड के लिए आवश्यक है कि अदालत कायम हो, हिसाब किताब हो, लोगो के पक्ष या विपक्ष मे गवाहियाँ दी जाएँ और न्यायधीश इंसाफ़ के साथ फैसला करे, दुनिया मे अगर इंसाफ़ नही होता या लोगो को उनके कर्म का बदला पुरस्कार या सज़ा नही मिलती तो इसके कई कारण है ,अपराधी पकड़ा नही जाता या उसके विरुद्ध गवाह और उसके अपराधो का ठीक ठीक आकलन नही होता रिश्वत ,सिफारिश दबाव आदि से अपराधी बच निकलता है अगर दंड मिल भी जाए तो उसके अपराधो के लिए काफी नही होता। इसी तरह जो लोग दुनिया मे अच्छे काम करते है और उनके कामों का प्रतिफल नही मिलता तो उसके भी कई कारण हो सकते है । लोगो को उनके द्वारा किए गए अच्छे कामों का पता ही न चला यदि चला भी तब भी लोगो के पास वे साधन ही नही हो जिससे वे अच्छे लोगो को उनके कारनामोँ का उचित पुरस्कार दे पाते। परलोक में इनमे से कोई व्यवधान मौजूद नही होगा। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की अदालत में अपने अच्छे बुरे कार्यो के साथ उपस्थित होगा । केवल ईश्वर की अदालत मे मानव को अपने किए गए कर्मो का सही प्रतिफल मिलेगा । इसी प्रतिफल का नाम स्वर्ग या नरक है

Saturday, June 26, 2010

विश्व पर्यावरण की सुरक्षा इस्लाम ही कर सकता है: प्रिंस चार्ल्स

आक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय मे राजकुमार चार्ल्स ने कहा कि संसार मे global warming रुहानी विश्वास मे कमी के कारण है , इसके लिए सिर्फ बढ़ती आबादी को ही ज़िम्मेदार नही ठहराया जा सकता ।साइंस और टैकनोलोजी को संसार के क़ुदरती निज़ाम की विनाश के लिए गलत प्रयोग किया जा रहा है। पश्चिम का केवल ग्रीन तकनीक की बुनियाद पर पर्यावरण को बेहतर बनाने का दावा गलत है इसके लिए इस्लाम के बताए रुहानी उसूलो को अपनाना होगा। प्रिंस चार्ल्स आक्सफोर्ड इस्लामिक सेंटर जिसके वह 1993 से पैटर्न भी है की 25 वीं वर्ष गाँठ के मौके पर "इस्लाम और पर्यावरण"के विषय पर बोल रहे थे अपने 50 मिनट के भाषण के बीच जिसमे मुस्लिम महिलाएँ, बुद्धिजीवी और कई देशों के राजदूत के अलावा आक्सफ़ोर्ड के मेयर जॉन गैडार्ड भी सुन रहे थे राजकुमार ने बहुत सी क़ुरआनी आयतो का हवाला देते हुए इस दौर के साइंसदानो को बताया कि पर्यावरण को सिर्फ औद्योगिकरण या आबादी ने ही नुकसान नही पहुँचाया वरन् ये इंसान के अंदर की ही गहरी रुहानी मुश्किलात की वजह से है। उन्होने कहा कि संसार को वैश्विक पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए इस्लामी रास्ते पर आना ही होगा दुनिया और मानवता को बुद्धि, समझ और रुहानी इल्म की दी गई दौलत की असल मुहाफ़िज़ इस्लामी दुनिया ही है और ये दोनो मशहूर और अनमोल उपहार इस्लाम ने ही दुनिया को दिए है । साइंसदानो को इस्लाम से पर्यावरणिय अप्रौच सीखने की ज़रूरत है । साइंस व तकनीक मे इतनी योग्यता नही है कि वह धर्म और धार्मिक शिक्षाओ से फाएदा उठाए बगैर पर्यावरण के रहस्यो पर काबू पा सके। शेल्डोनेन थिएटर मे मौजूद करीब 1000 लोगो ने प्रिंस आफ वेल्स के ऐतिहासिक भाषण के खत्म होने पर खड़े होकर तालियाँ बजाई। आक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के वाइस चाँसलर एंड्रयू हैम्लिटन ने आखिर मे मुख्य अतिथि व दूसरे मेहमानो की शुक्रिया अदा किया ।

Thursday, June 24, 2010

दुनिया को औरत की इज़्ज़त का सबक़ इस्लाम ने दिया

दुनिया को औरत की इज़्ज़त व अहतराम का सबक इस्लाम ने दिया है। हज़रत मुहम्मद स.ल.अ. ने पहली बार इंसानियत को औरतो की अज़मत से वाकिफ कराया दुनिया को सबक़ दिया कि लड़के और लड़कियो की परवरिश मे भेदभाव न करे,लड़कियो को शिक्षा देने का हुक्म दिया। माँ के कदमो के नीचे जन्नत करार दिया। जबकि पश्चिमी सभ्यता ने औरत को सिर्फ ज़िल्लत का और उपभोग का सामान बना दिया औरत को हवस और देखने की चीज़ बना दिया औरत की तरक्की का झंडा बरदार पश्चिम नाज़ुक औरत का लिहाज़ करने के बजाए औरत को मर्द बनाकर बराए नाम तरक्की देना चाहता है। जबकि इस्लाम औरत को कद्र और इज़्ज़त की निगाह से देखने के लिए कहता है। औरतो की वजह से दुनिया मे ज़्यादा बिगाड़ फैले हुए है इसलिए सुधार मे भी औरतो को ज़्यादा बड़ा किरदार अदा करने की ज़रूरत है। अल्लाह ने औरत को कुछ कर गुज़रने की ताकत ज़्यादा दी हुई है अगर औरत अपनी इस ताकत का उपयोग समाज सुधार, गलत रस्मोँ का ख़ात्मा और नैतिकता के बिगाड़ को दूर करने मे करें तो दुनिया मे शांति स्थापित होने से कोई ताकत नही रोक सकती।

Thursday, June 17, 2010

गाँधी जी और हज़रत मुहम्मद सल्ल.

गाँधी जी का कथन है। " मुहम्मद साहब (सल्ल.) रुहानी पेशवा थे ब्लकि उन की शिक्षाए को सबसे बेहतर समझता हूँ किसी रुहानी पेशवा ने ईश्वर की बादशाहत का पैग़ाम ऐसा सही और माना जाने वाला नही सुनाया जैसा पैग़म्बर ए इस्लाम मुहम्मद साहब सल्ल. ने सुनाया।"

Sunday, June 13, 2010

मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब से सवाल किया गया कि मुहब्बत ए इलाही क्या है ?जवाब में उन्होंने कहा कि मोमिन सबसे ज़्यादा मुहब्बत अल्लाह से करता है।

मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब से सवाल किया गया कि मुहब्बत ए इलाही क्या है ?जवाब में उन्होंने कहा कि मोमिन सबसे ज़्यादा मुहब्बत अल्लाह से करता है।
Greatest concern of Islam is Allah
खुद को जांचिये कि क्या आपका सुप्रीम कन्सर्न अल्लाह है ?
मौलाना ने यह भी बताया कि मेरी दरयाफ़्त ‘इज्ज़‘ है। जब तक आप अपने इज्ज़ को दरयाफ़्त न कर लें तब तक आप न तो आला दर्जे की दुआ कर सकते हैं और न ही आला दर्जे की इबादत कर सकते हैं।इज्ज़ एक गुण है जो घमण्ड का विलोम है।हक़ीक़त तो यही है कि आदमी को चाहिये कि वह अपने आपको जांचता परखता रहे ताकि बेहतरी की तरफ़ उसका सफ़र जारी रह सके।

लव जिहाद से लैंड जिहाद तक

 जिहाद से जुड़ी शब्दावली शायद कहीं खत्म हो ऐसा लगता नहीं है मुस्लिम विरोधी संगठन राजनीति में अपनी बढ़त के लालच में नए नए शब्द गढ़ते जा रहे ...